आध्यात्मिक संस्कृति का आदर्शलोक

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भारत के सांस्कृतिक मूल्यों में ‘सर्व’ को समाहित कर लेने की प्रवृत्ति मूल तत्व के रूप में विद्यमान है। दुनिया की तमाम सांस्कृतिक विविधताओं को स्वीकार करते हुए उन्हें स्व में समाहित कर लेने की इच्छा शक्ति का उद्देश्य हमें उस मार्ग पर ले जाता है।

जहां के सांस्कृतिक विकास में न जाति की दीवार दिखती है, न सम्प्रदाय का भेद नजर आता है, और न ही संस्कृति में विषमता-बोध होता है।

भारतीय संस्कृति के इन मूल्यों को किसी एक बसावट में तलाशने का प्रयास हमें तामिलनाडु के चेन्नई से 150 किलोमीटर (पांडिचेरी) दूरी पर स्थित ‘ओरोविल’ शहर की ओर ले जाता है।

ओरोविल एक किस्म की प्रायोगिक बसावट है जहां रहने वाले लोगों के रहन-सहन और जीवन-मूल्यों में अध्यात्म और संस्कृति की उस पराकाष्ठा के दर्शन होते हैं जिन्हें आमतौर आदर्श समाज के कल्पनालोक में जाकर दुनिया देखती है। इस शहर की स्थापना 1968 में ‘माँ’ द्वारा की गई थी। माँ का जुड़ाव श्री अरविंदो स्प्रिचुअल संस्थान से पहली बार 1914 में तब हुआ था जब वे श्री अरविंदो स्प्रिचुअल रिट्रीट में पांडिचेरी आईं।

हालांकि इसके बाद वो कुछ समय के लिए जापान चली गईं लेकिन फिर 1920 में वापस पांडिचेरी आ गईं और श्री अरविंदो स्प्रिचुअल संस्थान से जुड़कर जनसेवा के कार्य करने लगीं।

वर्ष 1926 में जब श्री अरविंदो गहन साधनालीन हो गए तो संस्थान के दैनिक कार्यों का दायित्व माँ के पास आ गया।  

इसके बाद संस्थान को संचालित करने के साथ-साथ लगातार जनसेवा कार्यों को करते हुए माँ ने एक ऐसे शहर रूपी बसावट की कल्पना की जो अद्वितीय हो, अनोखा हो और सांसारिकता के अवगुणों से मुक्त मानवता को समर्पित हो।

“ओरोविल को ‘भोर का शहर’ कहा जाता है। इसकी स्थापना के मूल में मानवतावाद की अवधारणा के जिन बिन्दुओं को रेखांकित किया गया है, वह विश्व को कई समस्याओं के
समाधान का रास्ता दिखा सकता है।”

वर्ष 1954 में ‘ए ड्रीम’ शीर्षक से छपे एक संक्षिप्त नोट में माँ ने अपनी कल्पना के उस शहर पर विचार व्यक्त किया था जिसको काफी हद तक आगे चलकर 1968 में उन्होंने मूर्त रूप दिया।

उन्होंने लिखा था कि इस धरती पर कोई ऐसी जगह भी होनी चाहिए जिसे कोई भी राष्ट्र अपनी सम्पति के दावे के रूप में न देखे। एक स्थान जहां मनुष्य अपनी इच्छा से मनुष्यता का भाव लिए विश्व के नागरिक सदस्य के रूप में स्वतंत्रतापूर्वक निवास कर सके।

एक सामंजस्यपूर्ण शान्ति स्थल जहां बच्चों के विकास और उनके आत्मबोध में बिना किसी अवरोध के विकास की धारा प्रवाहित हो, एक ऐसा स्थान जहां मानव संबंधों का आधार स्पर्धा न होकर मानवीय मूल्यों पर टिकी संवेदनाएं हों।

माँ ने जिस शहर अथवा बसावट की कल्पना की थी, वह कोई ऐसा आदर्श लोक नहीं था जिसको व्यावहारिकता के धरातल पर उतारा नहीं जा सके।

अत: उन्होंने 1968 में ‘भोर का शहर’ अर्थात ‘सिटी ऑफ डॉन’ कहे जाने वाले ओरोविल की स्थापना को व्यावहारिक रूप दे ही दिया। भारत की प्राचीनता को अपने वर्तमान में समेटे ओरोविल ने अपनी स्थापना के साथ ही इतिहास के हजारों वर्षों की पुरानी यात्रा को वर्तमान के पटल पर प्रस्तुत किया है।

विश्व को मानवता का पाठ पढ़ाने की सांस्कृतिक सम्पन्नता वाला भारत, 1968 में एक ऐसे शहर का गवाह बन चुका था जिसे वास्तविक रूप में ‘मानवता का शहर’ कहा गया।

ओरोविल शहर कुछ अच्छा करने, कुछ अच्छा सोचने और कुछ अच्छे लक्ष्यों को प्राप्त करने की जिजीविषा रखने वाले लोगों को एक प्रायोगिक रहन-सहन की जगह उपलब्ध कराने तक सीमित न होकर भविष्य के भारत में प्राचीनता का आत्मबोध कराने का प्रत्यक्ष उदाहरण भी बना है।

माँ ने 1968 में ओरोविल की स्थापना के समय एकत्रित 100 से ज्यादा राष्ट्रों के प्रतिनिधियों के सम्मेलन में ओरोविल की स्थापना को अपने जीवन-दर्शन के सिद्धांतों के आधार पर समझाते हुए चार-सूत्रीय घोषणाएं की थीं।

सर्वप्रथम उन्होंने कहा था कि ओरोविल किसी व्यक्ति विशेष का नहीं है और इस पर किसी व्यक्ति विशेष का दावा भी नहीं होगा। समग्रता में ओरोविल का विस्तार समूची मानवता के लिए समर्पित है।

उन्होंने यह भी कहा था कि ओरोविल में रहने वाले व्यक्ति को अपनी पूर्ण चेतना के साथ सेवा भाव को जागृत करके समर्पित रहना होगा। माँ द्वारा इस प्रथम सूत्र में प्रस्तुत उनके विचार ओरोविल की सार्वभौमिकता को स्पष्ट करते हैं।

माँ के शब्दों में ओरोविल को लेकर एक ऐसी आकांक्षा के दर्शन होते हैं मानों वे ओरोविल को मानवतावादी सभ्यता दृष्टि सबसे आजाद शहर के रूप में स्थापित करना चाहती हों।

दूसरे सूत्र के रूप में माँ ने सतत शिक्षा, निरंतर प्रगति एवं सनातन यौवन के विकासमूलक तत्वों को सम्मेलन में उपस्थित प्रतिनिधियों के समक्ष प्रस्तुत किया था।

चूँकि श्री अरविन्द के दर्शन में शिक्षा के मूल्यों पर विशेष चिन्तन नजर आता है, अत: ओरोविल को शिक्षा के उस केंद्र के रूप में स्थापित करने का विचार माँ को श्री अरविन्द के विचार-दर्शन से मिला होगा। जब वे सतत शिक्षा और निरंतर प्रगति की बात करती हैं तो इसमें भारतीय शिक्षा प्रणाली के युगानुकुल स्वरूप का बोध होता है।

वे प्राचीनता की बुनियाद को मजबूत करते हुए उसे निरंतर युगानुकुल प्रगति की ओर ले जाने की पक्षधर नजर आती हैं।

ओरोविल की स्थापना की घोषणा में तीसरे सूत्र के रूप में माँ ने भूत और भविष्य के बीच एक सेतु के रूप में कार्य करने की इच्छा शक्ति की बात भी कही थी।

“ओरोविल की स्थापना के 50 वर्ष पूरे हो रहे हैं। इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शामिल होंगे। भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति प्रधानमंत्री मोदी की समझ
और समर्पण को लेकर संदेह नहीं किया जा सकता है।”

उनके इस दूरगामी चिन्तन में भविष्य के भारत की चिंता भी नजर आती है। ऐसा लगता है कि माँ को प्राचीनता का बोध है और वे भविष्य को भारत की प्राचीनता से जोड़ते हुए आगे ले जाने का प्रयास कर रही हों।

अपने तीसरे कथ्य में माँ जिस सेतु से भूत और भविष्य को जोड़ने की बात करती नजर आ रही हैं, वह भारत के प्राचीनतम मूल्यों को वर्तमान संदर्भों में अमूल्य जरूरत की तरह अनिवार्य तत्व रूप में प्रस्तुत करता है।

अपने चौथे सूत्र में माँ ने ओरोविल को मानवीय एकता के लिए शोध स्थली की कल्पना के साथ प्रस्तुत किया था।

चूंकि ओरोविल की पूर्ण संकल्पना का उद्देश्य मानव मूल्यों के उत्थान एवं मानवतावाद की प्रतिष्ठा के लिए था, अत: माँ ने इसके विकास के वैज्ञानिक मानदंडों को समाहित करते हुए इस अनुसन्धान योजना को रखा था।

अगर देखें तो माँ ने जिन विषयों को लेकर ओरोविल की स्थापना की थी, वे व्यावहारिकता के करीब थे। इसी कारण से आज पचास साल के बाद सफलतापूर्वक निरंतर प्रगति के साथ आगे बढ़ रहे हैं।

ओरोविल के भौगोलिक परिवेश की अगर बात करें तो यह मंदिरों का शहर है, मगर यहां मंदिरों में भेद नहीं है। यहां के मंदिर योग की केंद्र स्थली हैं। योग भारत की प्राचीनतम आरोग्य प्रणाली का अहम हिस्सा है।

भारतीय प्राचीनता और वर्तमान के बीच लंबे कालखंडों में जो खाई बनी, उसने हमारे अतीत के मूल्यों को हमारे वर्तमान के मूल से भी नष्ट किया। लेकिन ओरोविल के मंदिर जब योग के केंद्र स्थली के रूप में एक प्रायोगिक अवधारणा को आदर्श रूप में शेष के भारत के सामने प्रस्तुत करते हैं तो इससे भारत के वर्तमान को उसके अतीत का आत्मबोध करने की प्रेरणा प्राप्त होती है।

आज योग दुनिया के 170 से अधिक देशों में स्वीकार्य है और संयुक्त राष्ट्र संघ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों के फलस्वरूप 21 जून को आम सहमति से अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया है तो इसे भारत के अतीत के वर्तमान पुनर्स्थापन के रूप में देखा जाना चाहिए।

अगर ओरोविल की स्थापना के समय माँ द्वारा प्रस्तुत किये गए तीसरे सूत्र की बात करें तो उसमें जिस सेतु से भूत और भविष्य को जोड़ने की कल्पना माँ ने रखी थी, योग की वर्तमान उपलब्धियों को उस कल्पना के आलोक में देखा जा सकता है।

हमने अपनी प्राचीनता का आत्मबोध किया, उसे दुनिया को समझाया, फिर दुनिया ने उसे स्वीकार किया और आज योग अन्तरराष्ट्रीय पटल पर ख्यातिलब्ध हुआ है।

इस कार्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का योगदान अहम रहा है। अब एक ऐसा अवसर आया है जब ओरोविल की स्थापना के स्थापना के 50 वर्ष पूरे हो रहे हैं। इस अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शामिल होंगे।

मूल्यों के प्रति मोदी की समझ और समर्पण को लेकर संदेह नहीं किया जा सकता है। ऐसे में ओरोविल की स्थापना के मूल में मानवतावाद की अवधारणा के जिन बिन्दुओं को रेखांकित किया गया है, वह विश्व को कई समस्याओं के समाधान का रास्ता दिखा सकता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वहां जाना और इस अवसर पर कार्यक्रम में शामिल होना इस दृष्टि से भी अहम है। मां ने जिस शहर अथवा बसावट की कल्पना की थी, वह कोई ऐसा आदर्श लोक नहीं था जिसको व्यावहारिकता के धरातल पर उतारा नहीं जा सके।

उन्होंने 1968 में ‘भोर का शहर’ अर्थात ‘सिटी ऑफ डॉन’ कहे जाने वाले ओरोविल की स्थापना को व्यावहारिक रूप दे ही दिया।

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