ताला खोलने का सच

0
156

पने क्या कभी सुना है कि आजाद भारत में किसी अदालत के फैसले का पालन महज 40 मिनट के भीतर हो गया हो? उस रोज अयोध्या में बहुत कुछ ऐसा हुआ, जिसने इतिहास की आंखें हैरानी से लाल कर दीं।

अयोध्या में एक फरवरी 1986 को विवादित इमारत का ताला खोलने का आदेश जिला जज देते हैं और राज्य सरकार 40 मिनट के भीतर उसे लागू करा देती है। शाम 4.40 पर अदालत का फैसला आया। 5.20 पर विवादित इमारत का ताला खुल गया।

अदालत में ताला खुलवाने की अर्जी लगाने वाले वकील उमेश चंद्र पांडेय कहते हैं, ‘हमें इस बात का अंदाजा नहीं था कि सब कुछ इतनी जल्दी हो जाएगा।’

दूरदर्शन की टीम ताला खुलने की पूरी प्रक्रिया कवर करने के लिए वहां पहले से मौजूद थी। तब दूरदर्शन के अलावा कोई और समाचार चैनल नहीं था।

इस कार्रवाई को दूरदर्शन पर उसी शाम पूरे देश में दिखाया गया। उस वक्त फैजाबाद में दूरदर्शन का केंद्र नहीं था। टीम लखनऊ से गई थी। लखनऊ से फैजाबाद जाने में तीन घंटे लगते हैं। यानी कैमरा टीम पहले से भेजी गई थी। इस पूरे घटनाक्रम की पटकथा दिल्ली में लिखी गई थी।

अयोध्या में तो सिर्फ किरदार थे। इतनी बड़ी योजना फैजाबाद में घट रही थी, पर उत्तर प्रदेश सरकार को कोई भनक नहीं थी। सिवाय मुख्यमंत्री वीरबहादुर सिंह के, जिनसे कहा गया था कि अयोध्या को लेकर वे सीधे और सिर्फ अरुण नेहरू के संपर्क में रहें।

मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद वीरबहादुर सिंह से इस मुद्दे पर मेरी लंबी वार्ता हुई थी। उनके मुताबिक पूरे मामले का संचालन अरुण नेहरू राजीव गांधी के परामर्श से खुद कर रहे थे। हां, मुझसे इतना जरूर कहा गया था कि सरकार अदालत में कोई हलफनामा न दे।

लेकिन फैजाबाद के कलेक्टर और पुलिस सुपरिटेंडेंट अदालत में हाजिर होकर यह कहें कि अगर ताला खुला तो प्रशासन को कोई एतराज नहीं होगा। वीरबहादुर सिंह ने बताया कि फैजाबाद के कमिश्नर को दिल्ली से सीधे आदेश आ रहे थे।

दिल्ली का कहना था कि इस बात के सारे उपाय किए जाएं कि ताला खोलने की अर्जी मंजूर हो। अदालत के फैसले को फौरन लागू करवाया जाए। वरना 37 साल से लटके इस मुद्दे पर सिर्फ दो रोज में फैसला हो जाना, वह भी संबंधित पक्षों को सुने बिना, यह मुमकिन था क्या?

अयोध्या में राम जन्मभूमि का ताला खुलवाने के पीछे कांग्रेस थी या भाजपा? राजीव गांधी थे या विश्व हिंदू परिषद? ये सवाल आज भी धधक रहा है। ताला कैसे खुला? उसके पीछे कौन लोग थे? और वे कौन लोग थे, जो अब तक सामने नहीं आए हैं?

क्या किसी एक गलती से देश का ध्यान हटाने के लिए तब की सरकार ने दूसरी गलती की थी? उस रोज क्या हुआ था? यह अब तक तिलिस्म की तरह है। इसकी बड़ी दिलचस्प कथा है।

उस रोज (एक फरवरी, 1986) फैजाबाद के जिला जज कृष्णमोहन पांडेय ने ताला खोलने के फैसले का आधार जिला मजिस्ट्रेट आईपी.पांडेय और एसएसपी करमवीर सिंह की उस मौखिक गवाही को बनाया, जिसमें दोनों ने कहा था कि ताला खोलने से प्रशासन को कोई एतराज नहीं है।

न ही उससे कोई कानून व्यवस्था की समस्या पैदा होगी। खास बात यह थी कि जिन उमेश चन्द्र पाण्डेय की अर्जी पर ताला खुला, वह बाबरी मुकदमे के पक्षकार नहीं थे। जो पक्षकार थे, उन्हें जज साहब ने सुना ही नहीं।

असल में राम जन्मभूमि पर ताला किसके आदेश से कब और क्यों लगाया गया? यह किसी को पता नहीं था। ऐसा कहीं कोई आदेश भी नहीं मिलता है। स्थानीय लोग कहते हैं, ताला तो 1971 में लगा।

“राम जन्मभूमि बाबरी ढांचा विवाद बहुत पुराना है। इस प्रकरण में उस समय बड़ा मोड़ आया जब एक फरवरी 1986 को न्यायालय के आदेश के बाद ताला खुला।”

1949 में तो किसी ने भी ताला नहीं लगाया था। पूरे मामले का कानूनी पहलू यह था कि यह जगह एक ‘रिसीवर’ के अधिकार में आती है। 1949 में ही अदालत ने इस संपत्ति को कुर्क करके फैजाबाद के प्रियदत्त राम को ‘रिसीवर’ बना दिया था।

रामलला का भोजन राम चबूतरे की रसोई में बनाया जाता था। इसके बाद भोग लगाने के लिए संतरी विवादित इमारत का ताला खोल देता था। 1971 में रिसीवर प्रियदत्त राम की मृत्यु हो गई। तब नए रिसीवर और निर्मोही अखाड़े के बीच विवाद खड़ा हो गया।

इस पर पुलिस ने दखल दिया और ताला लगाकर चाबी अपने पास रख ली। मौके पर तैनात संतरी बदल गया और चाबी नए संतरी को सौंप दी गई। वहां दो दरवाजे थे। एक दरवाजा भोग लगाने और प्रार्थना के लिए हमेशा खुला रहता था। लंबे समय तक यही व्यवस्था चलती रही। यानी, कुल मिलाकर यह जगह पूरी तरह कभी ताले में बंद नहीं थी।

28 जनवरी 1986 को मुंसिफ मजिस्ट्रेट फैजाबाद ताला खोलने की मांग करने वाली अर्जी को खारिज कर देते हैं। दो रोज बाद ही फैजाबाद के जिला जज की अदालत में पहले से चल रहे मुकदमा संख्या 2/1949 में उमेश चंद्र पांडेय एक दूसरी अर्जी दाखिल करते हैं।

जिला जज बेहद तेज रफ्तार से दूसरे ही रोज जिला कलेक्टर और पुलिस कप्तान को तलब कर उनसे इस सवाल पर प्रशासन की मंशा पूछते हैं। इस मामले पर हलफनामा देने के बजाय इन दोनों अफसरों ने वहीं मौखिक रूप में कहा कि ताला खोलने से कोई गड़बड़ नहीं होगी, न ही कानून और व्यवस्था की कोई समस्या खड़ी होगी।

यह फैसला जिला अफसरों के जरिए सरकार ने लिया था। दोनों अफसरों के इस बयान से जज को फैसला लेने में आसानी हुई। बाबरी मस्जिद पर मुसलमानों के कानूनी दावे का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील मुश्ताक अहमद सिद्दकी ने अदालत से अपनी बात रखने की पेशकश की।

जज ने कहा उन्हें सुना जाएगा। पर उन्हें बिना सुने ही उसी शाम 4.40 पर जज साहब फैसला सुनाते हैं। फैसले में कहा गया, ‘अपील की इजाजत दी जाती है। प्रतिवादियों को गेट संख्या ‘ओ’ और ‘पी’ पर लगे ताले तुरंत खोले जाने का निर्देश दिया जाता है।

प्रतिवादी आवेदक और उनके समुदाय को दर्शन और पूजा आदि में कोई अड़चन या बाधा नहीं डालेंगे।’ जिला जज के इस फैसले के बाद डीएम और एसएसपी उन्हें छोड़ने उनके घर जाते हैं।

फिर 40 मिनट के भीतर ही पुलिस की मौजूदगी में ताला तोड़ दिया जाता है और अंदर पूजा-पाठ, कीर्तन शुरू हो जाता है। अब जरा सरकार की मंशा देखें। अगर अदालत ने यह फैसला दे ही दिया, प्रशासन की क्या जिम्मेदारी थी? या इतना संवेदनशील फैसला सिर्फ कानून या न्यायालय के हवाले छोड़ा जा सकता था? क्या इस फैसले के पीछे सिर्फ मेरिट ही थी? या कुछ और।

भावना, आस्था और ईश्वर के रूप में एक बंदर भी था। फैजाबाद के तब के जिला जज कृष्ण मोहन पांडेय ने बाद में खुद ही यह भेद खोला। पांडेय जी साल 1991 में छपी अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, ‘जिस रोज मैं ताला खोलने का आदेश लिख रहा था, मेरी अदालत की छत पर एक काला बंदर पूरे दिन फ्लैग पोस्ट को पकड़ कर बैठा रहा।

वे लोग जो फैसला सुनने के लिए अदालत आए थे, उस बंदर को फल और मूंगफली देते रहे, पर बंदर ने कुछ नहीं खाया। चुपचाप बैठा रहा। मेरे आदेश सुनाने के बाद वह वहां से गया।

फैसले के बाद जब डीएम और एसएसपी मुझे मेरे घर पहुंचाने गए, तो मैंने उस बंदर को अपने घर के बरामदे में बैठा पाया। मुझे आश्चर्य हुआ। मैंने उसे प्रणाम किया। वह कोई दैवीय ताकत थी।’

इसी भक्ति-भावना से अभिभूत हो जज साहब ने ताला खोलने का फैसला लिखा। याचिकाकर्ता उमेशचंद्र पांडेय बताते हैं उस रात वे सो नहीं सके थे। उन्होंने सारी रात जन्मस्थान में गुजारी। दूसरे दिन सुबह वे घर जा पाए।

जज कृष्ण मोहन पांडेय से मेरी अक्सर ही मुलाकात होती रहती थी। वे लखनऊ की न्यू हैदराबाद कॉलोनी में रहते थे। सुबह की सैर के वक्त अक्सर ही मिल जाते थे। तफसील से बातें होतीं। उन्होंने मुझे इस फैसले के पीछे बंदर और दैवीय प्रेरणा की अपनी थ्योरी सविस्तार सुनाई।

ये भी बताया कि इस फैसले के रूप में दैवीय प्रेरणा के सम्मान की सोच ने उन्हें भीतर से बहुत आत्मसंतुष्टि दी। 28 मार्च, 1932 को जन्मे जिला जज कृष्ण मोहन पांडेय ने मार्च 1960 में एडिशनल मुंसिफ के तौर पर नौकरी शुरू की थी।

वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से कानून में स्नातक थे। पीसीएस (ज्यूडिशियल) परीक्षा 1959 के टॉपर थे। विभिन्न जिला अदालतों में अलग-अलग पदों पर रहते हुए 17 अगस्त, 1985 को जिला जज बने।

यह 25 जनवरी, 1986 की बात थी, जब उमेश चंद्र पांडेय ने मुंसिफ कोर्ट में याचिका दायर की। ये वही कोर्ट था जिसमें अयोध्या मामले से जुड़े टाइटिल मुकदमे की सुनवाई होती थी।

मुंसिफ जज ने 28 जनवरी, 1986 को ये फैसला दिया कि चूंकि केस से जुड़ी फाइलें हाईकोर्ट में हैं, इसलिए अगली तारीख तक (उमेश चंद्र पांडेय की याचिका को) विचाराधीन रखा जाता है। मुंसिफ कोर्ट के इस फैसले को उमेश चंद्र पांडेय ने 31 जनवरी, 1986 को डिस्ट्रक्टि जज की कोर्ट में चुनौती दी।

जिला जज के सामने जो अपील थी, उसमें राज्य सरकार, डिप्टी कमिश्नर, सिटी मजिस्ट्रेट और एसपी फैजाबाद को ही पार्टी बनाया गया था। ये लोग मुख्य केस में पार्टी नंबर 6, 7, 8 और 9 थे। चूंकि अयोध्या मामले के मुख्य केस में पार्टी नंबर 1 से 5 तक जिनके नाम थे, वे जीवित नहीं थे और उनकी जगह पर कोई और मौजूद नहीं था।

इस केस से जुड़े मोहम्मद हाशिम को भी एक फरवरी, 1986 को ही उमेश चंद्र पांडेय की अपील के बारे में पता चला। तब उन्होंने उमेश चंद्र पांडेय द्वारा दायर याचिका में पार्टी बनाए जाने के लिए याचिका दायर की, जिसका उमेश चंद्र पांडेय ने विरोध किया।

डिस्ट्रक्टि जज केएम पांडेय ने उसी दिन यानी 1 फरवरी को ही मोहम्मद हाशिम की याचिका खारिज करते हुए उमेश चंद्र पांडेय की याचिका मंजूर कर ली। अयोध्या में ताला खुलने की खबर प्रधानमंत्री राजीव गांधी को मालदीव के दौरे पर दी गई। डिनर से पहले वे अपना भाषण तैयार कर रहे थे।

उनके सहयोगी मणिशंकर अय्यर ने बताया कि मैंने उन्हें ताला खुलने की सूचना दी। उनका चेहरा भाव शून्य था। ऐसा लगता है कि उन्हें पहले से इस बात का अंदाज था। ताला खुल गया।

यह खबर जंगल में आग की तरह फैली। मुस्लिम समुदाय ठगा सा महसूस कर रहा था। पूरे राज्य में सांप्रदायिक तनाव बढ़ने लगा। मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह स्थितिप्रज्ञ थे। ऐसा लगा जैसे उन्हें कुछ पता ही नहीं था।

लेकिन उत्तर प्रदेश के राज्यपाल मो. उस्मान आरिफ आपे से बाहर हो रहे थे। वीर बहादुर सिंह जब मुख्यमंत्री पद से हट केंद्र की राजीव सरकार में संचार मंत्री बने। तब मेरी उनसे इस विषय में लंबी बात हुई।

उनका कहना था, ‘पूरे मामले की जानकारी मुझे भी नहीं दी गई थी। मैं सिर्फ इतना ही जानता था कि अरुण नेहरू इस मामले को मैनेज कर रहे हैं। अगर मुझे कुछ और मालूम रहता तो मैं ‘डैमेज कंट्रोल’ करने की कुछ कोशिश करता। इस घटना से उपजे सांप्रदायिक तनाव से निपटने की तैयारी करता। मेरे लिए तो परेशानी उस वक्त के महामहिम राज्यपाल मो. उस्मान आरिफ ही खड़ी कर रहे थे।’

दरअसल राज्यपाल मो. उस्मान आरिफ पर ढेर सारे मुस्लिम संगठन लगातार दबाव बना रहे थे कि अब वे ही कुछ करें। उन्हीं से उम्मीद है। वीर बहादुर सिंह ने मुझे बताया- ‘राज्यपाल मेरे ऊपर दबाव डाल रहे थे कि कानून व्यवस्था के नाम पर मैं निषेधाज्ञा जारी कर अदालत को सूचित करूं कि यह संभव नहीं है।

दंगे फसाद होंगे। मेरे साफ-साफ कुछ न कहने पर राज्यपाल अयोध्या जाने पर आमादा थे। मैं उन्हें लगातार टाल रहा था। हर थोड़ी देर बाद उनका फोन मेरे कार्यालय में आ रहा था।

 

बाद में मैंने उनका फोन लेना ही बंद कर दिया। मेरे सामने समस्या यह थी कि मैं महामहिम से क्या कहता, कि क्या कर रहा हूं, और अब तक क्या किया है? जब तक दिल्ली से साफ तौर पर कोई लाइन तय न हो जाती कि आगे क्या करना है? मैं क्या जवाब देता?

इसलिए मैं उन्हें हर बार यही कह रहा था कि महामहिम मैं मामले को देख रहा हूं और आपके पास आकर पूरी रिपोर्ट देता हूं। मैं उन्हें दिल्ली के रुख के बारे में भी बताता।’

वीर बहादुर सिंह ने बताया कि मैं शाम तक उन्हें टालता रहा। शाम को उनका फोन से संदेश आया कि अगर मुख्यमंत्री नहीं आ रहे हैं तो मैं स्वयं ही मुख्यमंत्री के दμतर पहुंच रहा हूं।

वीर बहादुर सिंह ने फोन पर राज्यपाल से गुजारिश की कि महामहिम अनर्थ हो जाएगा, आप प्रोटोकॉल का ध्यान रखें। मुझे खतरे में न डालें। मैं स्वयं आपके पास आ रहा हूं। मुझे पता चल गया था कि महामहिम मुस्लिम आवाम को संतुष्ट करने के लिए फैजाबाद जाना चाहते थे।

उनके वहां जाने से असाधारण समस्या पैदा होती। मामला तूल पकड़ता क्योंकि तब तक फैजाबाद में मुस्लिम नेताओं और वकीलों का धरना-प्रदर्शन शुरू हो चुका था। वीर बहादुर सिंह ने बताया कि मैंने राज्यपाल को बातचीत में उलझाकर किसी तरह फैजाबाद जाने से रोका।

पर राज्यपाल की आतुरता देख वीर बहादुर सिंह ने सावधानी बरती। अपने सचिव को इस बात के निर्देश दिए कि अगर राजभवन से सरकारी जहाज मांगा जाए तो उन्हें बताइए कि ‘जहाज मेंटेनेंस’ में है।

मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह इस हद तक सतर्कता बरत रहे थे। वीर बहादुर सिंह जमीन से जुड़े राजनेता थे। हाईकमान का इशारा समझते थे। इसलिए वे राज्यपाल से खेल रहे थे और किसी तरह समय बिता रहे थे।

वीर बहादुर सिंह को मालूम था कि हिन्दू कट्टरपंथियों को साधने के लिए यह प्रधानमंत्री का पैंतरा है। उन्हें इस बात के पर्याप्त संकेत थे।दरअसल राजीव गांधी देश में उस वक्त की सांप्रदायिक हालात के सामने जबर्दस्त दबाव में थे। 1985 में एक तलाकशुदा मुस्लिम महिला शाहबानो को गुजारा भत्ता देने का सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था।

सुप्रीम कोर्ट का कहना था, ‘बेबसी के खिलाफ प्रावधान सभी भारतीयों पर एक सा लागू होता है। कट्टरपंथियों ने इस फैसले का विरोध किया। शरीयत के बहाने इस्लाम पर खतरे की आवाज उठी। धरने-प्रदर्शन शुरू हो गए।

रूढि़वादियों ने चीत्कार किया, ‘यह तो उनके धर्म में दखल है।’ राजीव गांधी पर दबाव पड़ा कि वे कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटें। राजीव गांधी खुद फैसले नहीं कर पाते थे। वे देश की समस्याओं से बेखबर थे।

पहले राजीव गांधी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का समर्थन किया। राजीव सरकार के मंत्री आरिफ मोहम्मद खान ने संसद में इस फैसले के समर्थन में एक लंबा भाषण दिया। खान बताते हैं कि ऐसा उन्होंने प्रधानमंत्री के कहने पर किया था।

आरिफ मोहम्मद खान कहते हैं इस फैसले के समर्थन में जब उन्होंने लोकसभा में भाषण दिया तो राजीव गांधी ने उन्हें एक चिट्ठी लिखकर बढि़या भाषण देने की बधाई दी थी। बाद में कुछ मुल्लाओं के दबाव में राजीव गांधी झुक गए।

कट्टरवादी मुस्लिम जमात की गलत सलाह पर राजीव गांधी ने मुसलमानों को खुश करने के लिए मुस्लिम महिलाओं के लिए कानून बदल दिया। संसद में उन्हें अपार जनसमर्थन था।

लोक सभा में उनके पास 416 सांसद थे। एक झटके में संसद में कानून बना, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ही पलट दिया। अब इस देश में धर्म के आधार पर महिला अधिकारों पर दो कानून बन गए। हिन्दू समाज में इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई। सरकार कठघरे में खड़ी हुई। प्रधानमंत्री राजीव गांधी को जवाब देते नहीं बन रहा था।

“लंबे समय से मुकदमा लड़ रहे हाशिम की फैजाबाद के सांधु-संतों से कोई कटुता नहीं थी। राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के मुकदमे की तारीख पर वे और परमहंस रामचंद्र अक्सर
एक ही इक्के से फैजाबाद जिला अदालत जाते।”

इस मुद्दे को भाजपा ने राष्ट्रीय सवयंसेवक संघ (आरएसएस) और विश्व हिंदू परिषद् के जरिए लपक लिया। शाहबानो के मामले में सरकार मुस्लिम महिला कानून के जरिए संविधान संशोधन कर ही चुकी थी।

अब हिन्दुओं को खुश करने की बारी थी। हताश, निराश और परेशान राजीव गांधी को अयोध्या में रोशनी दिखी। अयोध्या संवेदनशील मुद्दा था। इस मुकदमे की हर गतिविधि को आईबी (खुफिया ब्यूरो) रिपोर्ट करती थी।

जैसे ही ताला खोलने की अर्जी फैजाबाद की अदालत में लगी। उसकी एक प्रति आईबी के पास भी पहुंची। आंतरिक सुरक्षा के मंत्री अरुण नेहरू थे। वे राजीव के चचेरे भाई भी थे। अरुण नेहरू का दिमाग कौंधा और उन्होंने राजीव गांधी को आइडिया दिया।

राजीव गांधी को आइडिया पसंद आया (अरुण नेहरू से बातचीत के आधार पर)। उनका मानना था कि इससे हिन्दुओं का फोकस शाहबानों से हटकर अयोध्या की तरफ मुड़ जाएगा।

इस बीच विश्व हिन्दू परिषद के जरिए देशभर में राम रथ यात्राएं शुरू हो चुकी थीं। जन्मभूमि का ताला खोलने की मांग जोर पकड़ने लगी थी। देशभर में सात रथ घूम रहे थे, जिसमें राम और सीता को सलाखों के पीछे दिखाया गया था। समूचे देश में ये रथ यात्राएं भीड़ इकट्ठा कर रही थीं।

23 अक्टूबर, 1985 को अयोध्या से सात राम जानकी रथ विभिन्न दिशाओं में रवाना किए गए। यात्रा में उमड़ने वाली भीड़ से सरकार के कान खड़े हो गए थे। 31 अक्टूबर, 1985 को उडुप्पी में दूसरी धर्म संसद का आयोजन हुआ।

इसमें फैसला हुआ था कि अगर आठ मार्च 1986 तक रामलला के मंदिर का ताला नहीं खोला गया तो 9 मार्च, 1986 से ‘ताला खोल’ आंदोलन ‘ताला तोड़’ आंदोलन में बदल जाएगा।

देश भर में घूम रहे सभी राम जानकी रथों को 8 मार्च, 1986 को अयोध्या लौटना था ताकि 9 मार्च, 1986 को ताला खोलने के बाबत कोई ठोस फैसला हो। ऐसे ‘चार्ज’ माहौल में एक अनजान वकील उमेश चंद्र पांडेय ने फैजाबाद की मुंसिफ अदालत में 21 जनवरी, 1986 को एक अर्जी लगाई कि राम जन्मस्थान का ताला खोला जाए और भक्तों को वहां जाकर पूजापाठ करने से न रोका जाए।

पांडेय कहते हैं कि उन्होंने सुन रखा था कि राम जन्मस्थान में तालाबंदी के आधिकारिक आदेश कभी नहीं दिए गए। इसलिए मैंने सोचा, अगर ऐसा है तो तालाबंदी क्यों?

ताला खोले जाने के मामले पर जिला जज के द्वारा न सुने जाने को आधार बना फैजाबाद के वकील एमए सिद्की ने हाईकोर्ट की शरण ली। उन्होंने लखनऊ पीठ में तीन फरवरी, 1986 को ही मोहम्मद हाशिम की ओर से एक अपील दायर की जिसमें ताला खोले जाने के लिए फैजाबाद के जिला जज के आदेश को चुनौती दी गई थी।

पेशे से दर्जी मोहम्मद हाशिम अंसारी 1949 से ही इस कानूनी लड़ाई में शामिल रहे। अयोध्या में ही उनकी कपड़े सिलने की दुकान थी। हाशिम ने हाईकोर्ट से कहा कि उन्होंने 1935 में विवादित इमारत में आखिरी बार नमाज पढ़ी थी। हाशिम अब दुनिया में नहीं रहे। पर निजी तौर पर बहुत भले आदमी थे। अयोध्या के संत समाज में वे लोकप्रिय थे।

लंबे समय से मुकदमा लड़ रहे हाशिम की फैजाबाद के सांधु-संतों से कोई कटुता नहीं थी। राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के मुकदमे की तारीख पर वे और परमहंस रामचंद्र अक्सर एक ही इक्के से फैजाबाद जिला अदालत जाते। हाशिम की इस अर्जी पर हाई कोर्ट ने यथस्थिति बनाए रखने का आदेश दिया।

ताला खुलने के छह रोज बाद छह फरवरी 1986 को बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का जन्म हुआ। लखनऊ में मुस्लिम नेताओं की एक सभा में मौलाना मुज्जफ्फर हुसैन किछोछवी की सदारत में एक्शन कमेटी बनी।

रामपुर के मोहम्मद आजम खां और लखनऊ के जफरयाब जिलानी इसके संयोजक बने। उधर दिल्ली में ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिसे मुशावरात ने इसे राष्ट्रीय स्तर पर उठाकर 14 फरवरी को सारे देश में शोक दिवस मनाया।

राजीव गांधी से इसके नेता मिले। पूर्व आईएफएस अधिकारी सैय्यद शहाबुद्दीन के नेतृत्व में एक सेंट्रल एक्शन कमेटी बनी। सैय्यद शहाबुद्दीन के नेतृत्व में मुस्लिम सांसद राजीव गांधी से मिले।

ताला खुलने के बाद लोकसभा और राज्यसभा के सभी 41 मुस्लिम सांसदों ने प्रधानमंत्री राजीव गांधी को तीन मार्च, 1986 को चिट्ठी लिखी। चिट्ठी में मांग की गई कि प्रधानमंत्री फौरन मामले में दखल दें। अयोध्या में जो हुआ, उसे रद्द करते हुए बाबरी मस्जिद को मुस्लिम समुदाय को सौंपें।

देशभर में विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हुआ। मामला बढ़ता देख विश्व हिन्दू परिषद फिर लड़ाई में कूदी। 19, 20, 21 अप्रैल को अयोध्या में ‘राम जन्मभूमि महोत्सव’ का आयोजन था। 21 अप्रैल को राम नवमी थी।

बिना किसी आह्वान के वहां लाखों लोग इकट्ठा हो गए। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी ने भी 20 अप्रैल को फैजाबाद में मुस्लिम सम्मेलन रखा। टकराव का अंदेशा बना। तनाव बढ़ा। सरकार ने मुसलमानों की रैली पर लोक लगाई। फैजाबाद की टाटशाह मस्जिद से जुलूस निकला।

पुलिस ने बल प्रयोग कर रैली नाकाम की। दूसरी तरफ देश के अलग-अलग हिस्सों में राम-जानकी रथ घूम रहे थे। इससे जगह-जगह सांप्रदायिक तनाव बढ़ रहा था। सरकार ने 11 जून, 1986 को इन रथों पर पाबंदी लगा दी। पांबदी देख विहिप ने रथ-यात्रा स्थगित कर दी। इससे सीधा टकराव तो टला, पर दोनों तरफ से जोर आजमाइश जारी रही।

प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अयोध्या मसले के हल के लिए अपने कैबिनेट में एक ‘ग्रुप ऑफ मिनिस्टर’ (मंत्री समूह) का गठन किया। इसके अध्यक्ष विदेशी मंत्री पी.वी. नरसिंह राव बनाए गए।

यह दूसरी बात है कि नरसिंह राव इसे छह दिसंबर की तार्किक परिणति तक ले गए। केंद्रीय गृहमंत्री बूटा सिंह ने आठ मई, 1987 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री से कहा कि मामले के हल के लिए वे समयबद्ध और चरणबद्ध योजना केंद्र सरकार को भेजें।

वहीं ताला खुलने की आकस्मिक घटना से विश्व हिन्दू परिषद् को भी धक्का लगा। आंदोलन उसके हाथ से फिसलता नजर आया। नेतृत्व के सूत्र फिर से पकड़ने के लिए विहिप ने अपना रुख और कड़ा किया।

जून में उसने विवादित स्थल पर मंदिर निर्माण की नई मांग रखी। विहिप को इस आंदोलन से अलग-थलग करने की कांग्रेसी कोशिशें तेज हुई। इस काम में मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह को लगाया गया।

वीर बहादुर सिंह गोरखपुर के रहने वाले थे। गोरखपीठ के प्रमुख महंत अवेद्यनाथ से उनका स्थानीय और जातीय घरापा था। महंतजी मंदिर आंदोलन के मुखिया थे। वीर बहादुर सिंह के तब सुरक्षाधिकारी देवेंद्र बहादुर राय थे, जो बाद में फैजाबाद के एसएसपी बने।

छह दिसंबर, 1992 में उन्हीं के एसएसपी फैजाबाद रहते ढांचा गिरा था। बाद में राय नौकरी से इस्तीफा देकर सुल्तानपुर से भाजपा के सांसद भी बने। देवेंद्र बहादुर राय बताते हैं, ‘एक रोज वीर बहादुर सिंह ने मुझे बुलाकर पूछा-आप गाड़ी चला लेते हैं।

मैंने कहा-हां, तो वे बोले मेरी गाड़ी, ड्राइवर, सुरक्षा, सचिव सबको छुट्टी दे दीजिए। मुझे कहीं जाना है। आपके साथ आपकी गाड़ी में चलूंगा। उस रात वीर बहादुर सिंह एक रिटायर्ड इनकम टैक्स अफसर मोहन सिंह के लखनऊ में महानगर घर पर चुपचाप गए।

मोहन सिंह हमें एक कमरे में ले गए, वहां रामजन्मभूमि मुक्ति यज्ञ समिति के अध्यक्ष महंत अवेद्यनाथ पहले से बैठे थे। हमें कमरे में पहुंचा मोहन सिंह वहां से चले गए। अब हम तीन ही लोग वहां थे।

वीर बहादुर सिंह ने कहना शुरू किया। राजीव जी चाहते हैं सोमनाथ की तर्ज पर अयोध्या में भव्य राम मंदिर बने। लेकिन इसे केंद्र सरकार बनाएगी। इसमें सिर्फ तीन शर्त हैं। एक, मंदिर केंद्र सरकार अपने खर्चे से बनाएगी।

दो, भाजपा से कोई मतलब नहीं होगा और तीन, विवादित भवन गिराया नहीं जाएगा। चारों तरफ खंभों पर एक छत पड़ेगी। उसकी छत पर भव्य मंदिर बनेगा। नीचे ढांचा जस का तस खड़ा रहेगा। प्लान यह है कि विवादित ढांचा बिना मरम्मत के कुछ दिन में खुद ही गिर जाएगा।

फिर केवल वहां राम जन्मभूमि मंदिर रहेगा। वीर बहादुर सिंह के इस प्रस्ताव से अवेद्यनाथ हंसे।  उन्होने कहा कि इससे भाजपा और विहिप को क्या फायदा होगा? राजनैतिक फायदा कांग्रेस को होगा।

फिर बात इस तरह खत्म हुई कि अवेद्यनाथ जी विहिप के दूसरे नेताओं से बात कर बताएंगे। लेकिन इस मुद्दे पर उन्होंने आगे कोई बात नहीं की। फायदे-नुकसान के चक्कर में यह मौका भी चला गया।

ताला खुलने का पूरा घटनाक्रम ही इस बात की गवाही देता है कि राजीव गांधी किसी भी तरह मंदिर बनाने के लिए नेपथ्य से प्रयासरत थे। वजह थी कि लगातार धर्म संसद, संत सम्मेलन, रथयात्रा आदि से देश में सांप्रदायिक तनाव का उभार बढ़ रहा था।

देश में इस तनाव की जमीन पहले से लगातार मजबूत हो रही थी और ये राजनीतिक तौर पर उनके लिए खासा नुकसानदायक प्रतीत हो रहा था। यह अलग बात है कि राजीव का ऐतिहासिक दांव कांग्रेस की ऐतिहासिक भूल बन गया।

पाठक की प्रतिक्रिया

Please enter your comment!
Please enter your name here