होनुलुलु हिंदी रत्न

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सुबह देर से आंख खुली। सिरहाने रखे मोबाइल पर एक ही नंबर के छह मिस्ड कॉल पड़े थे। कोई अनजाना नंबर था, लेकिन इतने सारे मिस्ड कॉल!

थोड़ा घबराते और चकराते हुए मैंने री-डायल किया। उधर से ‘वंदे मातरम’ का बहुत सुरीला रिंग टोन सुनाई दिया। उसके बाद आई एक जानी-पहचानी कर्कश सी आवाज—’क्या गुरु कहां गायब हो गए हो आजकल?’ मैं फौरन पहचान गया—’अरे कामरेड कमल नया नंबर और ये रिंगटोन..चक्कर क्या है?’

‘कॉल ड्रॉप से परेशान था, इसलिए एक और नंबर लिया है’—उन्होंने जवाब दिया। लेकिन आपका पुराना कॉलर ट्यून तो—हमें इंकलाब चाहिए वाला था.. ये इंकलाब से अचानक वंदे-मातरम? पुराना रिंगटोन भी मौजूद है, दूसरे फोन में। वंदे मातरम भी इंकलाब का ही तराना था। ये किस किताब में लिखा है कि मैं वंदे-मातरम नहीं गा सकता- उन्होंने जवाब दिया।

बिल्कुल गा सकते हैं, गाना भी चाहिए। लेकिन ये ह्रदय परिवर्तन अचानक क्यों कामरेड? यार बात-बात में कामरेड मत कहा करो। दोस्तों ने प्यार से नाम रख दिया था। मैं जनवादी रुझान वाला बुद्धिजीवी हूं। किसी लेफ्ट पार्टी का कार्ड होल्डर नहीं, दोनों में बहुत फर्क है। .. और आजकल आप राष्ट्रवादी हैं—मैंने पूछा।

हर सच्चे हिंदुस्तानी को राष्ट्रवादी होना चाहिए। अच्छा बकवास की बातें छोड़ो, मैंने यह बताने के लिए फोन किया है कि आज शाम पांच बजे तुम्हें इंडिया इंटरनेशनल सेंटर आना है। लेकिन किस खुशी में— मैंने पूछा? दाल-रोटी के चक्कर में तुम आजकल किसी चीज की खबर नहीं रखते। फेसबुक नहीं देखा, मुझे होनुलुलु हिंदी रत्न सम्मान के लिए चुना गया है। 400 से ज्यादा लोग लाइक कर चुके हैं, अब तक मेरे पोस्ट को। अच्छा शाम को आना जरूर, अभी जल्दी में हूं, शाम को मिलता हूं—मित्रवर ने फोन काट दिया..

हिंदी के रचनाकारों को भले ही भारत में कोई पढ़े या ना पढ़े, लेकिन अब वो ग्लोबल हो रहे हैं। पिछले दिनों मेरे एक मित्र को सुरीनाम में हिंदी का कोई बड़ा अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिला है।

मैं बहुत देर तक चकित रहा। मैं भी एक समय तक होनुलुलु को लिलिपुट या ब्रैडिंगगार्ड जैसी कोई काल्पनिक जगह मानता था। गूगल करने पर पता चलता है कि होनुलुलु उसी तरह वास्तविक है, जिस तरह माली का शहर टिंबकटू और अपने झारखंड का झुमरी तिलैया।

होनुलुलु अमेरिका के हवाई प्रांत की राजधानी है, बहुत ही खूबसूरत जगह और एक माना हुआ टूरिस्ट स्पॉट है। लेकिन मैं समझ नहीं पा रहा था कि होनुलुलु में भला हिंदी का क्या काम?  मान लो अगर हिंदी किसी तरह होनुलुलु पहुंच भी गई तो फिर भला मेरे मित्र का वहां क्या काम?

वैसे ये सच है कि हिंदी के रचनाकारों को भले ही भारत में कोई पढ़े या ना पढ़े, लेकिन अब वो ग्लोबल हो रहे हैं। पिछले दिनों मेरे एक मित्र को सुरीनाम में हिंदी का कोई बड़ा अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिला है। इंग्लैंड, कनाडा, फिजी और ऑस्ट्रेलिया से भी हिंदी लेखकों को सम्मान दिये जाने की खबरें आती रही हैं। हिंदी के पुरस्कार और सम्मान आजकल विदेशों के रास्ते भारत उसी तरह आ रहे हैं, जिस तरह मॉरीशस रूट से फॉरेन इनवेस्टमेंट आता है।

शायद हमारे पूर्वज इसी दिन के लिए कह गये थे—जहां ना पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि। लेकिन हिंदी का कोई कवि एक दिन होनुलुलु हिंदी रत्न कहलाएगा इसकी कल्पना हमारे पूर्वजों ने भी कभी नहीं की होगी। यह उपलब्धि नील ऑमस्ट्रांग के चांद पर पहुंचने से भी बड़ी है।

राष्ट्रवादी कवि, शायर और आलोचक कमलनयन शर्मा उर्फ कामरेड कमल की इसी उपलब्धि को सेलिब्रेट करने मैं भारतीय परंपरा के हिसाब से करीब घंटा भर की देरी से इंडिया इंटरनेशनल सेंटर पहुंचा। वहां नजारा मेरी कल्पना से कुछ अलग था। मंच गरिमामय उपस्थिति वाले करीब आधा दर्जन बुजुर्गों से शोभायमान था। कामरेड कमल कहीं नजर नहीं आए।

Hindi Writer_

हिंदी की गतिविधियों की दृष्टि से होनुलुलु का अमेरिका में वही स्थान है, जो एक जमाने में भारत में इलाहाबाद का हुआ करता था। होनुलुलु हिंदी मंच ने हिंदी लेखन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए होनुलुलु हिंदी रत्न सम्मान शुरू करने का फैसला किया है। पहला पुरस्कार भारत के युवा कवि कमलनयन शर्मा को दिया जाएगा।

थोड़ी देर बाद मैंने उन्हें इधर से उधर भागते देखा तो अंदाजा हुआ कि उनकी भूमिका मंच पर नहीं, बल्कि आयोजन समिति में है। कार्यक्रम एक ऐसे एनआरआई हिंदी सेवी को सम्मानित किये जाने का था, जिन्होंने उत्तरी अमेरिका में हिंदी के प्रचार-प्रसार में उल्लेखनीय योगदान दिया था। उनका नाम रामदयाल श्रीवास्तव था, लेकिन नॉर्थ अमेरिका के हिंदी प्रेमी उन्हें उनके लेखकीय उपनाम धूमकेतु से पहचानते थे।

मंच पर मौजूद सभी विद्वान उनकी शान में जिस तरह कसीदे पढ़ रहे थे, वह सुनकर मुझे ग्लानि हो रही थी कि हिंदी समाज के महापुरुषों के बारे में मेरी जानकारी इतनी कम क्यों है। आखिर में धूमकेतु जी के बोलने की बारी आई। अपने भाषण के अंत में धूमकेतु जी ने एक बड़ी घोषणा की।

उन्होंने बताया कि हिंदी की गतिविधियों की दृष्टि से होनुलुलु का अमेरिका में वही स्थान है, जो एक जमाने में भारत में इलाहाबाद का हुआ करता था। होनुलुलु हिंदी मंच ने हिंदी लेखन के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए होनुलुलु हिंदी रत्न सम्मान शुरू करने का फैसला किया है। पहला पुरस्कार भारत के युवा कवि कमलनयन शर्मा को दिया जाएगा। इंटरनेट पर उनकी रचनाएं पढ़कर निर्णायक मंडल ही नहीं अपितु होनुलुलु का पूरा हिंदी समाज रोमांचित है। पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा।

हिंदी की दुनिया में हंगामा मच गया। दिल्ली के ज्यादातर अखबारों में पांचवें-छठे पेज पर सिंगल कॉलम खबर भी आ गई। फेसबुक कमलनयन शर्मा की तारीफों से पट गया। फिर ईर्ष्यालुओं की मंडली सक्रिय हुई। इस बात पर बहस चलाई गई कि कमलनयन पुरस्कार पाने योग्य व्यक्ति हैं या नहीं। बहुत सारे लोगों ने उन्हें मतलबी, जुगाड़ू और रातों-रात विचारधारा बदलने वाला आदमी बताया।

अब तो इज्जत बचाने का एक ही रास्ता, अमेरिका अगर ईरान या सीरिया पर हमला बोल दे तो मैं विरोध स्वरूप पुरस्कार लेने से इनकार कर दूंगा। लेकिन कमबख्त ये भी तो होता हुआ नहीं दिख रहा।– कामरेड कमलनयन

सोशल मीडिया में कमलनयन के समर्थन और विरोध में कई दिनों तक कागद कारे होते रहे। धीरे-धीरे बात पुरानी पड़ने लगी। कई महीने बाद एक दिन अचानक वो मुझे मॉल में टकरा गए। मैंने छूटते ही पूछ लिया— कैसी रही थी, होनुलुलु की यात्रा। कामरेड कमलनयन भड़क गए— जले पर नमक मत छिड़को। फिर गुस्से पर काबू करते हुए मुझे किनारे ले गए और बोले—यार बड़ी ट्रेजेडी हो गई। धूमकेतु जी ने यहां से जाते वक्त कहा था कि हफ्ते भर में कार्यक्रम की तारीख तय करके बता देंगे और आपको आने-जाने का टिकट भी भेज देंगे। मै इंतजार कर ही रहा था कि अचानक फेसबुक से पता चला कि मुझे होनुलुलु बुलाने वाले को भगवान ने अपने पास बुला लिया है। मैंने बड़ी मुश्किल से उनके बेटे से संपर्क किया और होनुलुलु हिंदी मंच संस्था के बारे में पूछा। उन्होंने कहा कि मेरे पिताजी ही अपने आप में संस्था स्वरूप थे। मैं किसी और संस्था-वंस्था के बारे में नहीं जानता।

मैंने सांत्वना में कामरेड कमल के कंधे पर हाथ रखा। वे थोड़ा और भावुक हुए— लगता है मैं बुड्ढे का पिछले जन्म का कर्जदार था। फोकट में इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में मेरे 30 हजार खर्च हो गए। अब नाक कटेगी वो अलग। दुनिया को कैसे बताउंगा पुरस्कार इसलिए नहीं मिल सकता, क्योंकि देने वाला मर गया।

मैंने कहा— फिर क्या करेंगे आप?  कामरेड कमलनयन बोले-  अब तो इज्जत बचाने का एक ही रास्ता, अमेरिका अगर ईरान या सीरिया पर हमला बोल दे तो मैं विरोध स्वरूप पुरस्कार लेने से इनकार कर दूंगा। लेकिन कमबख्त ये भी तो होता हुआ नहीं दिख रहा। कमलनयन ने मुझसे वादा लिया कि ये सब मैं किसी से नहीं कहूंगा। लेकिन आप भी जानते हैं, ऐसी कहानियां कौन पचा सकता है, भला?.

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