हिन्द महासागर से प्रशांत महासागर तक

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फ्रांस के राष्ट्रपति एमानुएल मैक्रॉन की भारत यात्रा विश्व राजनीति में भारत की बढ़ती पहुंच का एक और अवसर साबित हुई।

घरेलू राजनीति में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस फ्रांस से युद्धक विमान राफेल की खरीद पर एक घोटाले का ‘आविष्कार’ करने में व्यस्त है, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक महासागर से दूसरे महासागर तक देश की रणनीतिक उपस्थिति को सुनिश्चित करने में लगे हैं।

सैन्य और रणनीतिक दृष्टि से भारत का प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने के प्रयास के साथ ही मोदी का मुख्य ध्यान द्विपक्षीय संबंधों को आर्थिक दृष्टि से एक दूसरे के लिए लाभप्रद बनाना भी है।

विश्व राजनीति में अमेरिका के घटते असर के मद्देनजर भारत और फ्रांस के बीच मजबूत संबंध दुनिया में शान्ति और स्थायित्व के लिए बहुत आवश्यक बन गए हैं।

पिछले वर्षों में इन संबंधों को खास महत्व नहीं दिया गया। लेकिन फ्रांस में परंपरागत वामपंथ और दक्षिणपंथ की राजनीति को नकार कर सत्ता में आए 40 वर्षीय  मैक्रॉन ने निकट सहयोग को नई गति और दिशा दी है।

राफेल युद्धक विमान समझौता मैक्रॉन के राष्ट्रपति बनने के पहले ही हो गया था।

लेकिन इस सौदे के ब्योरे से वह भलीभांति वाकिफ थे। सौदे को लेकर विपक्ष द्वारा उठाई जा रही आपत्तियां कितनी निराधार हैं इसका एक प्रमाण मैक्रॉन का यह कथन है, ‘यह सौदा भारत और फ्रांस दोनों के लिए ‘विन-विन’ स्थिति है।’

उन्होंने कहा कि वह इस सौदे के लिए हुए विचार-विमर्श में शामिल नहीं थे। लेकिन उनका मानना है कि इस युद्धक विमानों का काफी हद तक निर्माण भारत में होगा जिससे घरेलू उद्योग और श्रमिकों के हित सुरक्षित होंगे।

उल्लेखनीय है कि मोदी सरकार ने पिछली मनमोहन सरकार के फैसले को पलटते हुए 126 विमानों की बजाय केवल 36 विमान खरीदने का ही फैसला किया था।

“सैन्य संबंधों की संवेदना को महसूस करते हुए दोनों देशों ने एक गोपनीयता समझौता किया जिसमें सूचनाओं को गुप्त रखने का प्रावधान है।”

मैक्रॉन का यह कथन भी मोदी सरकार के लिए संतोष का विषय है कि राफेल जैसे सौदे के सभी तथ्यों को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता क्योंकि इसमें बहुत संवेदनशील व्यापारिक और सैन्य पहलू जुड़े हैं।

उन्होंने कहा कि रक्षा खरीद  के मामलों में किसी देश के सामने बहुत से विक्रेता होते हैं। इस प्रतिस्पर्द्धा में कोई नहीं चाहता कि उसके उत्पाद का ब्योरा दूसरे के पास पहुंचे। व्यापारिक पहलू के साथ ही रक्षा क्षमता का सवाल भी है।

इसी दृष्टि से रक्षामंत्री  निर्मला सीतारमण और वित्तमंत्री अरुण जेटली ने संसद में कहा था कि सरकार युद्धक विमानों के बारे में कोई ऐसी जानकारी नहीं दे सकती जिससे दुश्मन रक्षा प्रणाली की क्षमता का अनुमान लगा सकें।

द्विपक्षीय वार्ता के बाद दोनों देशों के बीच जो समझौते हुए, उसमें गोपनीयता समझौता भी है। सैन्य संबंधों की संवेदना को महसूस करते हुए दोनों देशों ने एक गोपनीयता समझौता  किया जिसमें सूचनाओं को गुप्त रखने का प्रावधान है।

इससे यह भी जाहिर होता है कि दोनों देशों के रणनीतिक संबंध उससे अधिक गहरे हैं जितने कि वह सामने दिखाई दे रहे हैं।प्रधानमंत्री मोदी ने कूटनीति में ‘गले लगने’ का जो सिलसिला शुरू किया है वह मैक्रॉन की यात्रा के दौरान भी सामने आया।

मोदी ने उस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का भी उल्लेख किया जिसमें दोनों देशों के घटनाक्रम और बौद्धिक प्रयासों ने एक दूसरे को समान रूप से प्रभावित किया।

मोदी ने मेहमान नेता को संबोधित करते हुए कहा, ‘आप और मैं यहां साथ-साथ खड़े हैं। हम सिर्फ दो सशक्त स्वतंत्र देशों व दो विविधतापूर्ण लोकतंत्रों के ही नेता नहीं हैं।

हम दो समृद्ध और समर्थ विरासतों के उत्तराधिकारी हैं। आज हमारी यह मुलाकात सिर्फ दो देशों के नेताओं की मुलाकात ही नहीं, दो समान विचारवाली सभ्यताओं और उनकी समग्र धरोहरों का समागम है, संगम है।

हमारी रणनीतिक साझेदारी  भले ही 20 साल पुरानी हो, हमारे देशों और हमारी सभ्यताओं की आध्यात्मिक साझेदारी सदियों लंबी है।

“राफेल जैसे सौदे के सभी तथ्यों को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता क्योंकि इसमें बहुत संवेदनशील व्यापारिक और सैन्य पहलू जुड़े हैं।”

18वीं शताब्दी से लेकर आज तक, पंचतंत्र की कहानियों के जरिये, वेद, उपनिषद, महाकाव्यों, श्री रामकृष्ण और श्री अरबिंद जैसे महापुरुषों के जरिये, फ्रांसीसी विचारकों ने भारत की आत्मा में झांककर देखा है।

वॉल्टेयर, विक्टर ह्यूगो, रोमां रोलां, रेने दौमाल और आंद्रे मलरो जैसे असंख्य युगप्रवर्तकों ने भारत के दर्शन में अपनी विचाराधाराओं को पूरक और प्रेरक पाया है।’

भारत और फ्रांस के बीच की आध्यात्मिक साझेदारी को उजागर करने लिए राष्ट्रपति  मैक्रॉन के कार्यक्रम में देश की सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी की यात्रा को शामिल किया गया है।

इस यात्रा के बारे में मोदी ने कहा, ‘वाराणसी में आपको भारत की उस प्राचीन और साथ ही चिर नवीन आत्मा का अनुभव होगा जिसकी तरलता ने भारत की सभ्यता को सींचा है। जिसने फ्रांस के अनेक विचारकों, साहित्यकारों और कलाकरों को प्रेरित भी किया है।’

यहां यह उल्लेखनीय है कि शास्त्रीय नर्तक उदयशंकर करीब एक सदी पहले वाराणसी से पेरिस गए थे जहां उन्होंने पश्चिमी कला प्रेमियों को भारत की संगीत-नृत्य परंपरा से अवगत कराया था।

इस यात्रा के बाद उनके छोटे भाई रविशंकर ने भारतीय संगीत विशेषकर सितार को दुनिया में प्रतिष्ठित किया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने वर्ष 1789 की  युगांतकारी ‘फ्रांसीसी क्रांति’ और उसके तीन प्रमुख संदेशों का भी उल्लेख किया।

उन्होंने  कहा, ‘यह संयोग मात्र नहीं है कि स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की गूंज फ्रांस में ही नहीं, भारत के संविधान में भी दर्ज है। दोनों देशों कासमाज इन मूल्यों की नींव पर खड़ा है। इन मूल्यों के लिए हमारे वीर सेनानियों ने दो विश्व युद्धों में अपनी कुर्बानियां दी हैं।’

भारत और फ्रांस ने रक्षा सहयोग में व्यापकता और गहराई लाने के उद्देश्य से आवागमन  सुविधा संबंधी महत्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसके तहत दोनों देशों के सैन्य बल एक दूसरे की आवागमन संबंधी सैन्य सुविधाओं का उपयोग कर सकेंगे।

भारतीय नौसेना के जहाज फ्रांस के नौसैनिक अड्डों का उपयोग कर सकेंगे। वहीं भारत भी उसे ऐसी ही सुविधा मुहैया करेगा। हिन्द महासागर से लेकर प्रशांत सागर तक भारतीय नौसेना की सक्रियता के लिहाज से यह समझौता दूरगामी असर वाला सिद्ध होगा।

इस समुद्री क्षेत्र में चीन की बढ़ती मौजूदगी का मुकाबला करने में भारत सक्षम हो सकेगा। भारत का हजारों किलोमीटर लंबा समुद्र तट है तथा फ्रांस भी हिंद महासागर और प्रशांत महासागर में अपनी मौजूदगी रखता है।

ऐसे में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में नौवहन को निर्बाध बनाये रखने में दोनों के समान हित  हैं। वास्तव में भारत और फ्रांस ने निर्बाध नौवहन के पक्ष में जो ऐलान किया है वह चीन के लिए स्पष्ट संकेत है।

जेहादी आतंकवाद भारत और फ्रांस के लिए सामान चिंता का विषय है। फ्रांस में किसी यूरोपीय देश की तुलना में अधिक मुस्लिम रहते हैं और उनमें धार्मिक कट्टरता के प्रति रुझान सरकार की चिंता विषय है।

सीरिया में राष्ट्रपति बशर अल असद के खिलाफ सुन्नी कट्टरपंथियों का जेहाद अब दम तोड़ने की कगार पर है। लेकिन भारत सहित विभिन्न देशों  में यह चिंता है कि जेहादियों का रुख अब कहीं उनकी तरफ न हो जाये।

फ्रांस के राष्ट्रपति एमानुएल मैक्रॉन ने इस संदर्भ में कहा कि भारत और फ्रांस को मिलकर ऐसे प्रयास करने चाहिए जिससे इराक और सीरिया में सक्रिय जेहादी उनके देशों में नहीं आ सकें।

भारत और फ्रांस को आतंकवाद विरोधी प्रयासों में तालमेल और खुफिया सूचनाओं के आदान प्रदान में निकट सहयोग करना चाहिए।

मैक्रॉन और मोदी जेहादी आतंकवाद का सख्ती से मुकाबला करने के पक्षधर हैं। साथ ही वे इस लड़ाई को किसी मजहब विशेष से नहीं जोड़ने पर भी जोर देते हैं।

मोदी के बारे में भारत के बाहर फैलाई गयी भ्रांतियों से मैक्रॉन सहमत नहीं हैं। उन्होंने कहा, ‘भारत में मुसलमानों की संख्या दुनिया के देशों में दूसरे नंबर पर है। प्रधानमंत्री मोदी मुस्लिम विरोधी हो ही नहीं सकते। उनकी सरकार में मुस्लिम मंत्री भी शामिल हैं।’

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