स्वर और राग की देवी

ज सुब्बालक्ष्मी होतीं तो 101 साल पूरे कर रही होतीं। सच कहें तो भारतीय संगीत और सुब्बालक्ष्मी एक दूसरे की पर्याय हैं। वे उन दो-चार लोगों में रही हैं, जिन्होंने भारत के शास्त्रीय संगीत से दुनिया का परिचय कराया।

कर्नाटक संगीत शैली को उन्होंने जो ऊंचाई दी है, उसके क्या कहने हैं! सुब्बालक्ष्मी को सुनने वाले बताते हैं, ‘उनका संगीत खुशी और शांति से सराबोर करने वाला है।’ ऐसी थीं- एमएस. सुब्बालक्ष्मी।

आईजीएनसीए में लगी प्रदर्शनी में सुब्बालक्ष्मी का प्रारंभिक जीवन, उनके जीवन को प्रभावित करने वाले खास लोग, उनका सिनेमाई सफर, उनके प्रमुख गीत, स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान, लोक सेवा में उनके योगदान की झलक आदि को व्यवस्थित और खूबसूरत तरीके से दिखाया गया है।

कोई उन्हें सुब्बुलक्ष्मी पुकारता है, तो कोई एमएस. अम्मा। कहते हैं- संगीत के उस्ताद बड़े गुलाम अली खान उन्हें ‘शुद्ध स्वरों की देवी’ कहा करते थे। बात 1926 की है, जब उन्होंने अपना पहला गीत रिकॉर्ड कराया था। तब वे महज 10 साल की थीं। संगीत के जानकार उनके स्वर के हर उतार चढ़ाव में छिपी अनूठी कला को देखते, समझते और सीखते रहे हैं, जहां कोई दोहराव नहीं है। हमेशा नूतन लय निकलते थे।

वैसे तो इन बातों को आम श्रोता नहीं समझ पाता है, लेकिन वह उनके संगीत में ऐसे डूबता है कि पूछिए मत। गायक और लेखिका सविता नरसिम्हन ने एक जगह बहुत सही कहा है- ‘एमएस. सुब्बालक्ष्मी का संगीत और जीवन दो अलग-अलग चीजें नहीं रही हैं। उनके मन में किसी तरह की कोई सीमा नहीं थी। वे केवल स्वर और राग थीं।’

ऐसी सुब्बालक्ष्मी की स्मृति में इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र ने ‘कुराई ओनरुम इलाई एमएस: लाइफ इन म्यूजिक’ विषय पर एक प्रदर्शनी आयोजित की है। प्रदर्शनी का उद्घाटन उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने 19 सितंबर को किया है। इस अवसर पर उन्होंने सुब्बालक्ष्मी पर स्मारक सिक्का भी जारी किया।

प्रदर्शनी का शीर्षक राजाजी द्वारा रचित एक प्रसिद्ध गीत है, जिसे सुब्बालक्ष्मी ने ही आवाज दी थी। गीत में कहा गया है- ‘उन्होंने ईश्वर से और अपने जीवन से कोई शिकायत नहीं है।’ प्रदर्शनी में सुब्बालक्ष्मी का प्रारंभिक जीवन, उनके जीवन को प्रभावित करने वाले खास लोग, उनका सिनेमाई सफर, उनके प्रमुख गीत, स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान, लोक सेवा में उनके योगदान की झलक आदि को व्यवस्थित और खूबसूरत तरीके से दिखाया गया है।

यहां सुब्बालक्ष्मी की 50 से भी अधिक तस्वीरें लगी हैं। तस्वीरें बताती हैं कि संगीत और सुब्बालक्ष्मी एक दूसरे के लिए बनी थीं। प्रदर्शनी का एक कोना उनकी सफलता और विश्व ख्याति को भी दर्शाता है।

‘डॉ. एमएस. सुब्बालक्ष्मी ने महात्मा गांधी से लेकर आम आदमी तक को अपने संगीत से मंत्रमुग्ध किया था। संगीत की समृद्ध विरासत ही भारत को पारिभाषित करती है जो धर्म, क्षेत्र, जाति और समुदाय के विभेद से परे होकर एकता की भूमिका निभाती है। ऐसे सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना हमारा कर्तव्य है जो हमें पूर्वजों द्वारा प्राप्त हुए हैं। हमें ऐसी विरासत भावी पीढ़ी को देनी चाहिए।’

— वेंकैया नायडू, उपराष्ट्रपति

सुब्बालक्ष्मी के साथ करीब डेढ़ दशक तक मंच पर गायन कर चुकी गौरी रामनारायण एक जगह कहती हैं, ‘वे अपने पति पी. सदाशिवम से गहरे प्रभावित थीं, जो एक स्वतंत्रता सेनानी थे। उनका झुकाव भी देशभक्ति की ओर हो गया। उस समय देशभक्ति का मतलब देश की भलाई और लोगों के विकास के लिए खुद को समर्पित कर देना था।’

कहते हैं कि उन्होंने अपनी सारी कमाई को परोपकार के कामों में लगा दिया। न केवल मंदिरों को पैसा दिए, बल्कि शंकर नेत्रालय और कस्तूरबा स्मृति कोष को भी दान दिया। उन्होंने संगीत का प्रयोग देश की सेवा के लिए किया, जबकि कभी इसे सेवा नहीं माना। वे असाधारण गुणी और उदात्त भाव वाली महिला थीं।

एमएस. सुब्बालक्ष्मी को उनके जीवनकाल में 30 पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 1998 में वे भारत रत्न से सम्मानित हुईं। डाक विभाग ने 10 दिसंबर, 2005 को उनके नाम डाक टिकट जारी किया था। वैसे तो सुब्बालक्ष्मी को आर्थिक संकट से जूझना पड़ा था, लेकिन वे सामाजिक सरोकार के लिए कार्यक्रम करती रहीं। 1936 से 1997 के बीच उन्होंने ऐसे 242 कार्यक्रम किए थे। 

भारतीय संगीत के क्षेत्र में सुब्बालक्ष्मी पहली शख्सियत थीं, जिन्हें सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। संयुक्त राष्ट्र ने सुब्बालक्ष्मी के सम्मान में 1.20 डॉलर मूल्य का डाक टिकट जारी किया था। वे पहली भारतीय संगीतज्ञ रहीं, जिन्हें संयुक्त राष्ट्र  महासभा में अपना कार्यक्रम प्रस्तु्त करने का अवसर मिला था। 

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने कहा, ‘डॉ. एमएस. सुब्बालक्ष्मी ने महात्मा गांधी से लेकर आम आदमी तक को अपने संगीत से मंत्रमुग्ध किया था।’ फिर वे बोले, ‘संगीत की समृद्ध विरासत ही भारत को पारिभाषित करती है जो धर्म, क्षेत्र, जाति और समुदाय के विभेद से परे होकर एकता की भूमिका निभाती है। ऐसे सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना हमारा कर्तव्य है जो हमें पूर्वजों द्वारा प्राप्त हुए हैं। हमें ऐसी विरासत भावी पीढ़ी को देनी चाहिए।’

सुब्बालक्ष्मी की हिन्दू धर्म में गहरी आस्था थी। वे रोजाना अपने पूजा घर में प्रार्थना करती थीं। मंदिर जाना उनके स्वभाव में शामिल था। कांची मठ से तो उनका गहरा लगाव था। किसी विशेष कार्यक्रमों में जाना होता तो कांची मठ आशीर्वाद लेने जरूर जातीं।

जब उन्होंने कर्नाटक संगीत क्षेत्र में कदम रखा, तब वहां पुरुष ब्राह्मणों का वर्चस्व था, लेकिन अपनी प्रतिभा के बल पर सुब्बालक्ष्मी ने वह स्थान प्राप्त किया, जिसे पहले किसी ने हासिल नहीं किया था। किशोरी अमोनकर उन्हें  ‘आठवां सुर’ कहती हैं। सरोजिनी नायडू तो उन्हें ‘भारत की स्वर-कोकिला’ पुकारती थीं।

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मौके से रिपोर्टिंग ब्रजेश की दिलचस्पी का विषय है। शुरुआती दिनों में ब्रजेश ‘भारतीय पक्ष’ पत्रिका से बतौर सहायक संपादक जुड़े रहे। ‘इंडो एशियन न्यूज एजेंसी’ की हिन्दी सेवा के चुने हुए शुरुआती सदस्यों में रहे। ‘प्रथम प्रवक्त’ में विशेष संवाददाता के तौर पर भी काम किया।

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