सुमित्रानंदन पंत का कविता संसार

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पंतजी के काव्य में जो पंक्तियां मुझे सबसे अधिक प्रिय रही हैं, वे हैं: ”नीरव संध्या में प्रशांत/डूबा है सारा ग्राम प्रान्त/पत्रों के आनन से अध पर सो गया निखिल वन का मर्मर,/ज्यों वीणा के तारों में स्वर!”

‘एक तारा’ शीर्षक यह कविता समूची भी कई बार पढ़ी होगी और, न जाने कितनी बार किसी सांझ को, सूर्यास्त को, रेल-बस-कार आदि में बैठे हुए, ये याद आई है, वन जब कोई वनांचल, सघन हरियाली का कोई क्षेत्र, या खेतों के बीच हो।

किसी गांव के घर-झोपड़े झांकते हुए दिखाई पड़े हैं। किसी यात्रा में। एक संगीतमयता, स्वर-सौंदर्य, और ध्वनियों की मधुरता, पंत जी के यहां प्राय: हर कविता में मिलती है।

वह विभिन्न शब्दों को कुछ इस तरह आसपास रखते हैं, इस तरह आपस में ‘बजा’ देते हैं, किन्हीं वाद्य यंत्रों की तरह आप सहज ही उनके आंके हुए किसी हृदय/बिंब में डूब से जाते हैं। और उसके मर्म को एक संवेदित ढंग से अनुभव करते हैं।

उनका यह काव्य गुण उनकी ‘झंझा में नीम कविता में भी अचूक ढंग से विंधा हुआ है:’ ” सद् सद् मर् मर रेशम के-से स्वर भर,  घने नीम दल लम्बे, पतले, चंचल, स्वसन-स्पर्श से रोम हर्ष से हिल-हिल उठते प्रतिपल।”

उनकी कविता भी तो हमें एक ‘रोमहर्ष’ से ही उल्लसित करती हैं। वे प्रकृति के कवि हैं। यह बात बार-बार कई तरह से दुहराई गई  है। और यह कथन निर्विवाद सा है। उनकी कविता में उतरने की यह एक ‘कुंजी’ भी है। पर, बात केवल इतनी नहीं है।

वे दरअसल प्रकृति के उपादानों के सूक्ष्म विवरणों के कवि भी हैं,और अपनी कल्पनामयी दृष्टि से वे ऐसा बहुत कुछ रचते हैं कि आप थोड़ी देर के लिए उनकी ‘सूझ’ के प्रति कुछ अचंभित होते हैं। और प्रकृति से, उसके उपादानों से, एक गहन-गंभीर-जुड़ाव महसूस करने लगते हैं।

“उनकी कविता भी तो हमें एक ‘रोमहर्ष’ से ही उल्लसित करती हैं। वे प्रकृति के कवि हैं। यह बात बार-बार कई तरह से दुहरायी गयी है।”

आपके भीतर बसे हुए कई प्रकृति हृदय और विंब जाग से उठते हैं। प्रकृतिमय लगने लगती है उनकी कविता सचमुच। वहां फूल हैं। वृक्ष हैं। वृक्षों की छाया है। पक्षी हैं। बादल हैं। हवा है। झंझा है। चांदनी रात है। धूप के टुकड़े हैं। मंजरित आम्रवन हैं।

बासों के झुरमुट हैं। मधुछत्र है। बिहग बालिका है। बाल विहंगनि  है। तृण हैं। मारूत के फूल हैं। सरिताएं हैं। ‘बादल’ कविता की ये पंक्तियां देखिये : ”काल चक्र-से चढ़ते-गिरते पल में जलधर, फिर चलधार, कभी हवा में महल बनाकर, सेतु बांधकर कभी अपार, हम विलीन हो जाते सहसा विभव भूमि ही-से निस्तार!’

नग्न गगन की शाखाओं में फैल मकड़ी का सा जाल, अम्बर के उड़ते पतंग को उलझा लेते हम तत्काल, फिर अनन्त उर की करुणा से त्वरित द्रवित होकर, उत्ताल आलप में मूर्च्छित कलियों को  जाग्रत करते हिम जल डाल!”

इसमें बादल को कई रूपों में, कई तरह से, कई कल्पनाओं के सहारे सोचा देखा गया है, स्वप्निल सी आंखों से, और उसके कुल रूप मर्म को कई तरह से उकेर कर मानों हमारे साथ कर दिया गया है। तो यह जो प्रकृति के उपादानों को ‘साथ’ कर देने की क्रिया है, उसे पंतजी की कविता निश्चय ही अनोखे ढंग से संभव करती है।

कभी कभी लगता है पंत जी की कविता को ‘छायावाद-रहस्यवाद’ के घेरे से बाहर करके देखा सोचा जाना चाहिए। और उसे आस्वाद को उसी के स्वप्नों और यथार्थ के जरिए ग्रहण किया जाना चाहिए।

वर्षों पूर्व, शांति प्रिय द्विवेदी ने पंतजी पर पहली ही किताब, ‘ज्योति विहग’ में उनकी कविता को उनके जीवन को भी, गैर-अकादमिक ढंग से भी देखा था, और उसमें उतरने का एक सरस, और मर्मभरा यत्न किया था। वह सचमुच एक और तरह का आकलन था, जो अब बहुत कुछ भुला दिया गया था।

पंतजी के बारे में, उनकी कविता के बारे में, शांतिप्रिय द्विवेद्वी ने निश्चय ही कुछ मर्मभर विचार व्यक्त किये हैं। एक जगह वह लिखते हैं :”भावों की तरह विचारों को भी पंत जी सांकेतिक (प्रतीक) शब्दों में व्यक्त करते हैं।

अंतश्चेतना से विच्छिन्न भूजीवन को असंगठन या माया कहते हैं। बहिरंतर के सम्मिलित जीवन को संगठन, प्रकाश या सत्य कहते हैं। इसी तरह समतल और उर्घ्व  तल भी उनके अर्थगर्भित शब्द हैं, जिन्हें कहीं ‘धरा शिखर’ और कहीं भू-जीवन (बहिर्जीवन) और अंतर्जीवन में प्रयुक्त करते हैं।

इन दोनों का संगठन अथवा संयोजन ‘संस्कृति’ से होता है।”  बाहर-भीतर का यह सामंजस्य और द्वंद्व दुनिया भर के कवियों में किसी न किसी रूप में रास्ता ही है, पर, इसमें संदेह नहीं कि ‘अंतश्चेतना’ और ‘बहिर्जीवन’ की ओर पंतजी का ध्यान हमेशा ही विशिष्ट प्रकार से रहा।

उन्होंने समय समय पर अपनी काव्य-प्रवृत्तियों के बारे में भी लिखा है। अपने प्रकृति प्रेम को जांचा है, और फिर उस ‘प्रेम’ के विरोध में भी लिखा है। लेकिन एक बार फिर याद कर लें कि वह स्वयं प्रकति के संबंध में अपनी आलोचनात्मक दृष्टि से जो कुछ भी कहते रहे हों, सहारा उन्हीं ने हमेशा प्रकृति उपादानों से ही लिया है।

इस मामले में इतना ओर कहा जा सकता है कि जब पंतजी अरविंद दर्शन से प्रभावित हुए तो प्रकृति की वाणी को ‘सस्वर’ उपस्थित करना उन्होंने छोड़ दिया। मसलन पंतजी ने प्रकृति को जिस ‘सस्वर’ रूप में पहले देखा था जैसे कि ‘संध्या का झुरमुट’ में- ”बांसों का झुरमुट – संध्या का झुटपुट- हैं चहक रहीं चिडि़यां टी-वी-टी- टुट्-टुट।”

वह ‘सस्वरता’ उनके परवर्ती काव्य में ऐसी संक्षिप्त और उत्कृष्टता के साथ नहीं है। बरसों-बरस पंतजी ने प्राकृतिक उपादानों के माध्यम से प्रकृति के कई ऐसे हृदय चित्र रचे थे, जहां प्रकृति अत्यंत सौंदर्यमयी, ताजगी भरी- जैसे कि कोई कोंपल होती है- और मुग्धकारी लगती हैं।

जहां उसके स्वर, उसके ‘बोल’ भी हम कई रूपों में सुन पाते हैं, और वे हमें बहुत लुभाते हैं। सच पूछें तो उनकी कविता का यही रूप मुझे, बहुतेरे औरों की तरह आज भी प्रिय हैं। उसमें मैं एक और चीज देख पाता हूं; हिंदी-खड़ी बोली को एक स्वर-संपदा से भी चैतन्य कर देने की शक्ति वहां है।

मुझे कई बार यह लगा है कि फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ के गद्य में, शब्दों को ‘सस्वर’ रखने का जो उपक्रम है, उसकी एक प्रेरक शक्ति सुमित्रानंदन पंत की कविता है। अचरज नहीं कि पंत जी, ‘रेणु’ के प्रिय कवियों में रहे हैं।

‘मैला आंचल’ के प्रारंभ में ‘रेणु’ ने पंत जी की कविता की ये पंक्तियां रखी थीं- प्रथम संस्करण में ही – ”भारत माता ग्राम वासिनी! खेतों में फैला है श्यामल धूल भरा मैला सा आंचल गंगा यमुना में आंसू जल मिट्टी की प्रतिमा उदासिनी !”

ग्राम पंत जी के आरंभिक काव्य में, और बाद में भी, बहुत है। उनके यहां ‘ग्राम वधू’ जैसी कविता भी हैं, जिसमें विदा होती ग्राम वधू को विदा करने के लिए परिजन स्टेशन के प्लेटफार्म में इकट्ठा हैं।

कुछ पंक्तियां देखिये : जाती ग्राम वधू पति के घर! भीड़ लग गई लो स्टेशन पर, सुन यात्री ऊंचा रोदन स्वर झांक रहे खिड़की से बाहर, जाती ग्राम वधू पति के घर! लो अब गाड़ी चल दी भर-भर, बतलाती पत्नी पति से हंसकर  अस्थिर डिब्बे के नारी नर, जाती ग्राम वधू पति के घर!

‘स्वच्छंद'(सुमित्रानंदन पंत की कविताओं का संचयन: प्रमुख संपादक, अशोक वाजपेयी, संपादक, अपूर्वानंद, डॉ. प्रभात रंजन, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण, 2000) की भूमिका ‘पंत पथ पर’, अशोक वाजपेयी ने याद किया है: ‘अज्ञेय ने पंत की षष्ठि पूर्ति पर हिन्दी प्रकृति-काव्य का प्रख्यात संचयन ‘रुपाम्बरा’ संपादित-प्रकाशित कर उन्हें भेंट किया था।

जाहिर है यह हिंदी के प्रकृति काव्य से पंत की शीर्ष स्थानीयता का एक कवि जनोचित स्वीकार था। उन्हीं दिनों नरेश मेहता ओर श्रीकांत वर्मा द्वारा संपादित पत्रिका ‘कृति’ ने गजानन माधव मुक्तिबोध और नामवर सिंह के निबंध विशेष रूप से प्रकाशित कर उन्हें एक और तरह की आलोचनात्मक प्रणति दी थी।

चार दशक बीत जाने के बाद यह स्वीकार करने का अवसर है कि न सिर्फ हिंदी प्रकृति काव्य में बल्कि समूचे आधुनिक काव्य में पंत की गौरवस्थानीयता असंदिग्ध है और उसे स्पष्ट किया जाना चाहिए। हिंदी में आधुनिकता का इतिहास बिना पंत के अवदान के लिखना संभव नहीं है।’

“जिस वर्ष उनको ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला, उनके सम्मान में यह कविता पाठ आई.टी.ओ. (दिल्ली) के एक बड़े सभागार में आयेाजित हुआ था। नागार्जुन जी, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना,रघुवीर सहाय,अजित कुमार, श्रीकांत वर्मा आदि थे।”

जाहिर है कि वर्ष 2000 में लिखी गई ये पंक्तियां आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। हां, पंत के प्रकृति काव्य की ओर बार-बार लौटा जाएगा। बार-बार लौटा जाना चाहिए। पंत के उत्कर्ष के दिनों से हिंदी को बरतने के ढंग में, खासा बदलाव आया है।

‘मीषा बहता नीर’ के साथ या स्वाभाविक भी हैं, पर, सच पूछें तो पंत की भाषा के प्रति हमेशा एक आकर्षण बना रहने वाला है। इसे फिर दुहरा लें कि वहां शब्द सौंदर्य भी, और ‘स्वर सौंदर्य’ भी।

यह लेख पंत जी की प्रणति स्वरूप ही लिखा गया है: मुख्यत: उनके प्रकृति काव्य को ध्यान में रखकर ही। और इसे इसी रूप में देखा-पढ़ा जाना चाहिए। अंत में इतना और: सुमित्रा नंदन पंत को एक बार देखने का, उनके निकट बैठने का, और उनकी उपस्थिति में कविता पढ़ने का सौभाग्य मिला था।

जिस वर्ष उनको ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला, उनके सम्मान में यह कविता पाठ आई.टी.ओ. (दिल्ली) के एक बड़े सभागार में आयेाजित हुआ था। नागार्जुन जी, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना,रघुवीर सहाय,अजित कुमार, श्रीकांत वर्मा आदि थे।

कविता पढ़ने वालों में मैं सबसे युवा था। पंतजी के ठीक पीछे बैठा था। इस कविता पाठ की एक रिपोर्ट ‘धर्मयुग’ के लिए कवियत्री इंदु जैन ने लिखी थी, जो सचित्र प्रकाशित हुई थी।

उसकी कतरन मैंने बहुत दिनों तक संभाल कर रखी थी, फिर वह न जाने इतने वर्षों के कागजों किताबों में कहां छिप गयी! हां, उस पाठ की जब तब याद आती है।

पाठ की समाप्ति पर जाहिर है पंत जी को बहुतेरे लोगों ने घेर लिया था। तो, उनसे बातचीत का संक्षिप्त अवसर भी नहीं आया। पर, उनकी कविताएं पढ़ता हूं। जो पंक्तियां कंठस्थ हैं, उन्हें मन ही मन दुहराता हूं। और ‘प्रकृति’ से ‘जुड़ाव’ के एक गहरे आनंद का अनुभव करता हूं।

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