सीमाओं से परे और समय से आगे

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जदूर हितों के पोषक और सामाजिक असमानता व सांप्रदायिकता के खिलाफ आवाज उठाने वाले बलराज साहनी को पूरी जिंदगी अभिनय के लिए किसी भी तरह का सम्मान नहीं मिला।

अपेक्षाकृत बड़ी उम्र में अभिनय के क्षेत्र में आने की वजह से उन्हें आमतौर पर नायक की भूमिका के उपयुक्त नहीं माना गया। करीब 26 साल के करिअर में चालीस से ज्यादा फिल्में उनके नाम दर्ज नहीं हैं।

लेकिन जब भी अभिनय कौशल के विभिन्न आयामों व मापदंडों की बात होती है तो बलराज साहनी का नाम सबसे पहले लिया जाता है। फिल्म चाहे पूरी तरह व्यावसायिक हो या कलात्मक हर फिल्म में बलराज साहनी का एक नया रूप देखने को मिला।

ग्लैमर और चकाचौंध से भरी फिल्मी दुनिया में सहजता व सरलता से रहते हुए, कभी किसी खींचतान और विवाद में उलझे बिना बलराज साहनी ने अपना 26 साल का फिल्मी जीवन पूरी गरिमा से बिताया।

“बलराज साहनी ने व्यावसायिक फिल्मों में भी लोहा मनवाया। साहनी फिल्मों के नव यथार्थवाद के पोषक ही नहीं थे वरन उन्हें यथार्थ से जुड़ी फिल्मों का समर्थ कलाकार मानना उनकी प्रतिभा का सही मूल्यांकन नहीं है।”

वे जिस समय फिल्मों में आए सहज अभिनय का झंडा लेकर सिर्फ मोतीलाल चल रहे थे। बाकी सभी का अभिनय रंगमंचीय नाटकीयता से प्रभावित था।

सबके अपने खास मैनरिज्म बन गए थे और उस पिंजरे से बाहर निकलने की उनमें हिम्मत नहीं थी। बलराज साहनी ने अभिनय को सामाजिक प्रतिबद्धता से जोड़ा और लगभग हर फिल्म में नैतिक मूल्यों की वकालत की।

वामपंथी विचारधारा के होने की वजह से उन्होंने कुछ फिल्मों में समाज के दबे कुचले वर्ग का प्रतिनिधित्व किया और कुछ में शोषण और अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाई।

ऐसी फिल्मों में उनका आक्रोश ऐसी शिद्दत से उभरा कि उन्हें भारतीय सिनेमा का अगर पहला एंग्रीमैन माना जाए तो गलत नहीं होगा। ‘हम लोग’ (1951) व ‘धरती के लाल’ (1952) में बलराज साहनी ने सामाजिक अन्याय से लड़ने वाले युवक की भूमिका की।

ख्वाजा अहमद अब्बास की फिल्म ‘गर्म कोट’ एक निम्न वर्गीय मध्यम परिवार की मार्मिक कहानी थी।

नया कोट बनवाने की चाहत में परिवार के मुखिया को किस जद्दोजहद से गुजरना पड़ता है, यह फिल्म में दिखाया गया था और इसमें बलराज साहनी ने पात्र की पीड़ा और बेबसी को जिया था।

विमल राय की 1953 में बनी ‘दो बीघा जमीन’ बलराज साहनी के करिअर में मील का पत्थर बनी फिल्मों में एक थी। फिल्म में बलराज साहनी ने एक किसान शंभू महतो की भूमिका की थी।

“बलराज साहनी अकेले ऐसे अभिनेता थे जिन्होंने ख्याति व पैसे को कभी महत्व नहीं दिया।”

शंभू की दो बीघा जमीन महाजन के पास गिरवी पड़ी थी। उसे छुड़ाने के लिए वह पैसा कमाने कोलकाता जाता है और वहां का पारंपरिक रिक्शा खींचता है।

पैसा-पैसा जोड़ कर वह गांव लौटता है तो पाता है कि उसकी जमीन पर फैक्टरी बन गई है। रिक्शा खींचने का अभ्यास करने के लिए शूटिंग शुरू होने से पहले कोलकाता गए।

हाथ रिक्शा पर बेटे परीक्षित व बेटी शबनम को बैठा कर उन्होंने कई दिन रिक्शा खींचा। फिल्म में मन्ना डे व लता मंगेशकर का गाया गीत- ‘अपनी कहानी छोड़ जा, कुछ तो कहानी छोड़ जा, कौन कहे इस ओर तू फिर आए न आए’ बेहद लोकप्रिय हुआ।

‘दो बीघा जमीन’ को कान फिल्म समारोह में ही नहीं कार्लोवी वैरी फिल्म समारोह में भी अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। बाद में फिल्म को राष्ट्रीय व फिल्म फेयर पुरस्कार भी मिले लेकिन बलराज साहनी किसी भी सम्मान से वंचित रह गए।

एक मई 1913 को जन्में बलराज साहनी ने अभिनय सफर की शुरुआत पत्नी दमयंती के साथ इंडियन पीपुल्स थिएटर (इप्टा) की फिल्म ‘धरती के लाल’ से की।

‘दो बीघा जमीन’ से उन्हें जो पहचान मिली उसे उन्होंने 1955 में बनी ‘सीमा’ व ‘गर्म कोट’, 1957 की ‘सोने की चिडि़या’, 1958 की ‘हीरा मोती’,1960 की ‘अनुराधा’ व 1961 की फिल्म ‘काबुली बाला’ में गजब की विविधता दी।

गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की लघु कहानी पर बनी ‘काबुली वाला’ में बलराज साहनी ने एक सहृदय पठान की भूमिका की थी। उन पर फिल्माया गया मन्ना डे का गीत- ‘ए मेरे प्यारे वतन, ए मेरे उजड़े चमन तुझ पे दिल कुर्बान’काफी लोकप्रिय हुआ।

व्यावसायिक फिल्मों में भी लोहा मनवाया। बलराज साहनी फिल्मों के नव यथार्थवाद के पोषक ही नहीं थे। उन्हें यथार्थ से जुड़ी फिल्मों का समर्थ कलाकार मानना उनकी प्रतिभा का सही मूल्यांकन नहीं है।

उन्होंने व्यावसायिक फिल्मों में भी अपनी गहरी छाप छोड़ी और साबित कर दिया कि सच्चा कलाकार किसी भी सांचे में फिट हो सकता है। विडंबना यह रही कि व्यावसायिक फिल्म निर्माताओं ने बलराज साहनी की बेजोड़ अभिनय क्षमता का उपयुक्त इस्तेमाल नहीं किया।

सितारों वाले नाज नखरे वे दिखाते नहीं थे। किसी के पास काम मांगने जाते नहीं थे। परिवार की जिम्मेदारी निभाने के लिए उन्होंने कुछ ऐसी फिल्में की जिनसे वे सहमत नहीं थे।

महत्वहीन भूमिकाओं को भी बलराज साहनी ने पूरी जीवंतता से निभाया।  व ‘पराया धन। ज्यादा उल्लेखनीय रही- ‘अनपढ़’ (1961) जिसमें बलराज साहनी ने ऐसे पिता की भूमिका की थी जो लाड़ प्यार में अपनी बेटी को पढ़ाता-लिखाता नहीं और बाद में अपनी गलती पर पश्चाताप करता है।

चेतन आनंद की भारत -चीन की युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी ‘हकीकत’ में उन्होंने ऐसे कमांडर की भूमिका की जो हार सामने देख कर भी जवानों में उत्साह का संचार करता है।

फिल्म का  गीत- ‘कर चले हम फिदा जान- ओ तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियों’ ने देश के टूटे मनोबल पर मरहम लगाया।  पूरे व्यक्तित्व में उभार लिए।

‘वक्त’ में तकदीर से ज्यादा तकदीर पर भरोसा करने वाले लालाजी के उनके किरदार को लोग आज भी नहीं भूल पाए हैं। बलराज साहनी अकेले ऐसे अभिनेता थे जिन्होंने ख्याति व पैसे को कभी महत्व नहीं दिया।

कुछ समय पिता के कारोबार में हाथ बंटाया। लेकिन वहां उनका मन नहीं लगा और पत्नी दमयंती के साथ वे साहित्यिक रुचि पूरी करने के लिए बाहर निकल गए।

बीबीसी में कुछ समय अनाउंसर रहे। शांति निकेतन में अध्ययन कार्य किया और फिर मुंबई में ‘इप्टा’ से जुड़ गए। 1947 में दमयंती का निधन हो गया।

काफी बाद में बलराज साहनी ने स्वीकार किया कि अपने से ज्यादा प्रतिभाशाली दमयंती से उन्हें ईर्ष्या होने लगी थी। दमयंती से बलराज साहनी के एक बेटा परीक्षित व बेटी शबनम हुए।

बाद में उन्होंने संतोष से दूसरी शादी की जिससे बेटी सनोवर हुई। बलराज साहनी की साहित्यिक लेखन में काफी रुचि थी।

उन्होंने पंजाबी में अपनी रूस व पाकिस्तान यात्रा का वृतांत तो लिखा लेकिन कहानियां व उपन्यास लिखने की उनकी चाहत अधूरी रह गई।

ख्वाजा अहमद अब्बास के निर्देशन में बनी ‘धरती के लाल’ से शुरू हुआ उनका फिल्म सफर 1973 में कलात्मक फिल्म एमएस सथ्यू की ‘गर्म हवा’ पर खत्म हुआ।

फिल्म इस्मत चुगताई की कहानी पर आधारित थी और उसकी पटकथा कैफी आजमी ने लिखी थी। उन दिनों बेटी शबनम के असामयिक निधन से बलराज साहनी बेहद व्यथित थे।

फिल्म में चेतन आनंद की भारत -चीन की युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी ‘हकीकत’ में उन्होंने ऐसे कमांडर की भूमिका की जो हार सामने देख कर भी जवानों में उत्साह का संचार करता है।

उन्होंने सलीम मिर्जा नाम के ऐसे व्यक्ति की भूमिका की थी जो विभाजन के बाद अपने सभी रिश्तेदारों के पाकिस्तान चले जाने के बावजूद भारत में ही रहना पसंद करता है।

सांप्रदायिक भेदभाव से आहत होकर वह पाकिस्तान जाने का मन बना लेता है लेकिन आखिर में फैसला करता है कि वह भारत में ही रह कर अन्य लोगों की तरह संघर्ष करेगा। ‘गर्म हवा’ में काम करने का बलराज साहनी ने एक पैसा भी नहीं लिया।

बौद्धिक और साहित्यिक पृष्ठभूमि की वजह से अपने फिल्मी सफर में उनका किसी से विवाद नहीं हुआ। ‘फुटपाथ’ फिल्म की शूटिंग के दौरान दिलीप कुमार ने बलराज साहनी पर आपत्तिजनक टिप्पणी कर दी।

लोगों ने उन्हें भड़काना चाहा लेकिन बलराज साहनी ने बुरा नहीं माना और हर मौके पर दिलीप कुमार की तारीफ ही की। बलराज साहनी पर गाने कम ही फिल्माए गए।

1965 में बनी ‘वक्त’ में उन पर फिल्माया गया गीत- ‘ए मेरी जोहरा जबीं तुझे मालूम नहीं …मैं जवां’ आज भी लोकप्रिय है। निजी जीवन में बलराज साहनी को गाना बहुत पसंद था। अक्सर वे रवींद्र संगीत गाया करते थे।

आपदाओं के समय लोगों की मदद करने वे हमेशा दौड़ पड़ते थे चाहे भिवंडी का सांप्रदायिक दंगा हो या बांग्लादेश में बाढ़ का कहर।

बलराज साहनी ने एक बार भीष्म साहनी से कहा कि वे अभिनय छोड़ कर साहित्य के क्षेत्र में कुछ करना चाहते हैं।

उन्होंने फिल्में कम कर दीं और पंजाब में एक छोटा घर ले लिया। उसकी मरम्मत करा कर उसे दुरुस्त किया। पूरी तैयारी लेखन की हो गई थी।

उनका संकल्प था कि वे पंजाबी में लिखेंगे और अगर बात नहीं बनी तो अच्छे साहित्य का कम से कम पंजाबी में अनुवाद तो जरूर करेंगे। मुंबई छोड़ने के दिन 13 अप्रैल1973 को उन्हें दिल का दौरा पड़ा और लीलावती अस्पताल में उनका निधन हो गया।

फिल्मी यात्रा में उन्हें अपेक्षित सम्मान नहीं मिला, उसी तरह अंतिम यात्रा में मित्रों व परिजनों के अलावा कुछ ही फिल्मी लोग शामिल हुए।

उनके निधन की खबर सुन मछुआरे वरसोवा से पैदल आए और पूरी रात उनके शव के पास रहे। बाकी लोग वे थे जिनकी बलराज साहनी ने किसी न किसी रूप में मदद की थी।

बलराज साहनी अकेले ऐसे अभिनेता थे जिन्होंने ख्याति व पैसे को कभी महत्व नहीं दिया। कुछ समय पिता के कारोबार में हाथ बंटाया। लेकिन वहां उनका मन नहीं लगा और पत्नी दमयंती के साथ वे साहित्यिक रुचि पूरी करने के लिए बाहर निकल गए।

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