सम्मान से मरने का भी अधिकार

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र्वोच्च अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रदत्त जीवन के अधिकार के दायरे में ही गरिमा के साथ मृत्यु को भी शामिल कर लिया है।

इससे लाइलाज बीमारियों और जीवन रक्षा उपकरणों के सहारे जबरन कष्टप्रद जिंदगी गुजारने के लिए बाध्य मरीजों को बहुत ही बड़ी राहत मिलेगी।

न्यायालय ने कुछ कठोर शर्तों के साथ ऐसे मरीजों को इच्छा मृत्य वरण करने की अनुमति देने के साथ ही अग्रिम इच्छा पत्र (लिविंग विल) को मान्यता भी दी है।

शीर्ष अदालत ने असाध्य बीमारी की अवस्था में जीवन रक्षक उपकरण हटाने के निर्णय लेने से पहले की जो प्रक्रिया निर्धारित की है वह बहुत ही दुरूह है और इसका दुरूपयोग होने की संभावना कम है।

न्यायालय की इस व्यवस्था के बारे में न्यायाधीशों ने बेहद स्पष्ट शब्दों में कहा है, ‘जीवन को कभी भी मृत्य से अलग करके नहीं देखा जा सकता। जो जीवित है उसे एक न एक दिन मरना है।’

भारतीय समाज ही नहीं, बल्कि समूची दुनिया में कोई भी परिवार अपने परिजन को महंगी चिकित्सा की वजह से खोना नहीं चाहता है लेकिन हमारे यहां तो हालात ऐसे हो चुके हैं कि कई बार परिवारों को अपने परिजन के जीवन की खातिर चल अचल संपत्ति तक गवानी पड़ जाती है।

यही नहीं, कई बार तो परिवार के सदस्य भी निजी अस्पतालों पर मरीज को जबरदस्ती जीवन रक्षक प्रणाली पर रखे रहने के आरोप लगाते रहते हैं।

ऐसी स्थिति में असाध्य रोग से ग्रस्त मरीजों के लिए उच्चतम न्यायालय की यह व्यवस्था जहां कष्टों से छुटकारा दिलाने में मददगार होगी, वहीं परिवारों को इलाज की वजह से बर्बादी से बचाने में भी मददगार होगी।

इस निष्कर्ष के समर्थन में जहां प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्र ने अपने फैसले में दार्शनिक उक्तियों का सहारा लेते हुए स्वामी विवेकानंद के इस कथन को उद्धृत किया, ”जीवन एक दीपक है जो लगातार जलता रहता है, जो जीने की इच्छा रखता है उसे हर पल उसके लिए मरना पड़ता है।

“न्यायालय ने अनुच्छेद 21 में प्रदत्त जीने के अधिकार का जिक्र करते हुए अपनी व्यवस्था में कहा है, ‘हर व्यक्ति को सम्मान के साथ जीने के अधिकार के समान ही गरिमा के साथ मरने का भी अधिकार प्राप्त है।”

युधिष्ठिर ने कहा कि हर आदमी मृत्यु देखता है पर उसे लगता है कि मौन मृत्यु उसे परेशान नहीं करेगी।” दूसरी ओर, एक अन्य न्यायाधीश ने अमिताभ बच्चन की मुकद्दर का सिकंदर फिल्म के गाने ‘रोते हुए आते हैं सब हंसता हुआ जो जायेगा’ का सहारा लिया।

न्यायाधीशों में इस बात पर आम सहमति थी कि मनुष्य की मृत्यु भी गरिमा के साथ होनी चाहिए और यदि कोई व्यक्ति असाध्य रोग से ग्रस्त है अथवा निष्क्रिय अवस्था में है तो उसे जीवन रक्षक उपकरणों के सहारे पीड़ादायक तरीके से जीने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ का 538 पेज का परोक्ष इच्छा मृत्यु की अनुमति देने संबंधी यह फैसला बहुत ही महत्वपूर्ण है।

यह सिर्फ उन्हीं परिस्थितियों में लागू होगा जहां मरीज  के बचने की कोई संभावना नहीं है और जीवन रक्षक उपकरणों के सहारे उसे जीवित रखकर उसकी पीड़ा और वेदना को बढ़ाया जा रहा हो।

संविधान पीठ ने हालांकि निष्क्रिय अवस्था में जीवन बिताने के लिए मजबूर मरीजों को मृत्य को अंगीकार करने की अनुमति देने और जीवन रक्षक उपकरण हटाने से पहले की प्रक्रिया के लिए कई दिशा निर्देश प्रतिपादित किए हैं।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि संसद से इस बारे में कानून बनने तक यह दिशा निर्देश प्रभावी रहेंगे।

न्यायालय का कहना था कि चूंकि भारत में लिखित मेडिकल के लिए हिदायत के बारे में कोई कानूनी व्यवस्था नहीं है, इसलिए न्यायालय का यह दायित्व है कि वह अनुच्छेद 21 में प्रदत्त जीवन के अधिकार को संरक्षित करे।

एक सवाल यह भी है कि लिखित इच्छा पत्र (लिविंग विल) कौन लिख सकता है? इस संबंध में न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि मानसिक रूप से स्वस्थ कोई भी व्यक्ति इसे लिख सकता है बशर्ते उसे इसके नतीजे के बारे में जानकारी हो।

इच्छा  पत्र में साफ तौर पर लिखना होगा कि उसका चिकित्सीय इलाज उस समय रोक दिया जाए जब सिर्फ उसकी मौत को टालने के लिए ऐसा किया जा रहा हो।

यही नहीं, परिवार के एक व्यक्ति को उसका संरक्षक बनना होगा जो मरीज के मौत की ओर बढ़ते समय इस पर अमल का निर्णय लेगा।

इस तरह से मृत्यु का वरण करने के बारे में इच्छा पत्र की एक प्रति जिला न्यायाधीश की रजिस्ट्री में रखी जाएगी और साथ ही परिवार को इससे अवगत कराया जाएगा।

“उच्चतम न्यायालय ने असाध्य रोग से ग्रस्त मरीजों के लिए इच्छा मृत्यु का रास्ता साफ करने का ऐतिहासिक फैसला दिया है।”

ऐसी स्थिति उत्पन्न होने पर अस्पताल के चिकित्सकों को इसकी जानकारी दी जाएगी।

इसके बाद कलेक्टर मुख्य चिकित्सा अधिकारी के नेतृत्व में मेडिकल बोर्ड गठित करेंगे जो वस्तुस्थिति का आकलन करके मरीज के जीवन रक्षक उपकरण हटाने के बारे में निर्णय लेगा।

अगर इस प्रक्रिया के बाद भी मरीज के जीवन रक्षक उपकरण हटाने की अनुमति नहीं मिलती है तो उसका परिवार राहत के लिए उच्च न्यायालय जा सकता है जो एक बार फिर तीन चिकित्सकों का दल गठित करके मामले का नये सिरे से परीक्षण कराने के बाद निर्णय लेगा।

इस प्रक्रिया से एक बात तो साफ है कि निहित स्वार्थों की खातिर कोई भी इस तरह के लिखित इच्छा पत्र का अनुचित लाभ नहीं उठा सकेगा।

न्यायालय ने अनुच्छेद 21 में प्रदत्त जीने के अधिकार का जिक्र करते हुए अपनी व्यवस्था में कहा है, ‘हर व्यक्ति को सम्मान के साथ जीने के अधिकार के समान ही गरिमा के साथ मरने का भी अधिकार प्राप्त है और किसी को भी इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है।’

गैर सरकारी संगठन कामन काज ने 2005 में निष्क्रिय अवस्था वाले मरीजों के लिए इच्छा मृत्यु वरण करने की अनुमति के लिए याचिका दायर की थी।

निश्चित ही अनुच्छेद 21 में मरने के अधिकार को शामिल करने की व्यवस्था बेहद महत्वपूर्ण है लेकिन यहां सवाल उठता है कि भारतीय कानून के तहत जघन्य अपराधों के जुर्म में मौत की सजा पाने वाले मुजरिमों के मामले में क्या होगा?

शीर्ष अदालत में पहले से ही एक जनहित याचिका लंबित है जिसमें मौत की सजा पाने वाले कैदियों को मृत्युपर्यंत फांसी पर लटकाने से होने वाली शारीरिक पीड़ा को चुनौती देते हुए कहा गया है कि मृत्य दंड पाने वाले कैदियों को भी गरिमा के साथ मरने का अधिकार है।

इसलिए फांसी देने की बजाय इस सजा पर अमल के लिए दूसरे वैकल्पिक उपाय अपनाने चाहिए।

हालांकि फिलहाल केन्द्र सरकार ऐसे किसी विकल्प को अपनाने से इनकार किया है लेकिन अब देखना यह होगा कि गरिमा के साथ मरने के अधिकार के इस फैसले के आलोक  में अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा की याचिका पर शीर्ष अदालत की क्या व्यवस्था होगी?

यह तो बात हुई निष्क्रिय अवस्था में रहने वाले मरीजों के इच्छा मृत्यु के वरण करने की।

यहां एक सवाल यह भी उठा कि यदि संपूर्ण प्रक्रिया का पालन करने के बाद मेडिकल बोर्ड की अनुमति से मरीज के जीवन रक्षक उपकरण हटाए जाते हैं तो ऐसे मरीजों के इलाज पर होने वाले खर्च के भुगतान के मामले में बीमा कंपनियों का क्या रुख होगा?

इस संबंध में बीमा मामलों के जानकारों का कहना है कि बीमा नियमन एवं विकास प्राधिकरण ने बीमित व्यक्ति के आत्महत्या करने की स्थिति में एक व्यवस्था कर रखी है और वही व्यवस्था इसमें भी लागू होगी।

बहरहाल, मुंबई के सरकारी अस्पताल के एक कर्मचारी की वहशियाना हरकत की शिकार हुई नर्स अरुणा शानबाग के मामले में जो इच्छा मृत्यु के सवाल को लेकर एक फैसला शीर्ष अदालत ने सुनाया था, उसी प्रक्रिया को अब संविधान पीठ ने पूरे सुरक्षा मानदंडों के साथ कानूनी मान्यता प्रदान की है।

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