समाचार अपनी भाषा में

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हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषी न्यूज एजेंसी ने विश्व पुस्तक मेले की छटा में एक रंग और जोड़ा। उसके लेखक मंच पर पुस्तक केंद्रित चर्चा ही होती है। 9 जनवरी को उसमें एक नया आयाम जुड़ा। वह इतिहास का एक पन्ना जरूर बनेगा।

न्यूज एजेंसी की पहल पर एक वैचारिक, समसामयिक और प्रभावी विमर्श हुआ। जो बढ़े तो नई बहस को जन्म दे सकता है। विषय था-‘भाषाई न्यूज एजेंसी की पत्रकारिता- अतीत, वर्तमान और भविष्य।’

यह प्रश्न पुराना है। उससे पार पाने के संघर्ष का इतिहास भी लंबा है। समाधान खोजने के प्रयासों का एक इतिहास भी है। वह जहां गौरवशाली है वहीं इस बात का गवाह भी है कि मंजिल अभी दूर है।

वह मंजिल क्या है? आजादी से पहले भी भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता का बड़ा संसार था। लेकिन उसे भाषाई औपनिवेशिकता से जूझना पड़ता था। आजादी के बाद वह दुरावस्था बदलनी चाहिए थी। क्या बदली? इसे खोजें तो पाएंगे कि ज्यादा फर्क नहीं पड़ा।

ऐसी बात भी नहीं है कि भारतीय भाषाओं की चेतना कमजोर थी। वह प्रबल थी। हिन्दुस्थान समाचार न्यूज एजेंसी का गठन प्रमाणस्वरूप है। आजाद भारत के पहले सूचना और प्रसारण मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल जब ‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ बनवा रहे थे उससे पहले ही हिन्दुस्थान समाचार का जन्म हो चुका था।

उस समय भारतीय जरूरतों, तथ्यों और संदर्भों के स्तर पर एक बेहतर समाचार सेवा की जरूरत अनुभव की गई। उसी से सरकारी स्तर पर पीटीआई बनी और समाज की पहल पर हिन्दुस्थान समाचार बना।

विडंबना देखिए कि 1999 में पीटीआई ने अपना 50 साल मनाया। दूसरी तरफ हिन्दुस्थान समाचार पुनर्जन्म की प्रसव पीड़ा में था। राष्ट्रपति के.आर. नारायणन ने पीटीआई के समारोह में कहा कि वह आजाद भारत की पहली न्यूज एजेंसी है। इस कथन में उनका अज्ञान मत देखें।

यह समझें कि उन्हें यही बताया गया होगा। पर सच यह है कि हिन्दुस्थान समाचार न्यूज एजेंसी उससे पुरानी है। डॉ. वेद प्रताप वैदिक के शब्दों में ‘वरिष्ठ’ है। दूसरी विडंबना अधिक त्रासद है।

आज भी सभी जिलों में किसी भी न्यूज एजेंसी का संवाददाता नहीं है। पीटीआई के करीब चार सौ स्टिंगर हैं। लेकिन न्यूज के कारोबार पर उसका एकाधिकार नब्बे फीसद है।

उसी तरह भारत की 22 भाषाओं में खबरें देने वाली कोई भी न्यूज एजेंसी नहीं है। इसका एक अर्थ साफ है कि अंग्रेजी का खबर की दुनिया में साम्राज्य भारत में कायम है। इसके राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक दुष्प्रभावों को बताने की नहीं बल्कि जरूरत है अनुभव करने की।

इसे हिन्दुस्थान समाचार अपने लिए एक बड़ी चुनौती समझता है। पुस्तक मेले का विमर्श उसे समझने की एक कोशिश है। जो इस अर्थ में सफल और सार्थक रही कि विमर्श में वे लोग शामिल हुए जिन्हें स्वस्थ पत्रकारिता और न्यूज एजेंसी के काम-काज का लंबा अनुभव है।

डॉ. वेद प्रताप वैदिक को वे दिन याद हैं जब इंदिरा गांधी की तानाशाही को खबरों में ढालने के लिए ‘समाचार’ बनवाया गया था। उसके विवरण से उन्होंने बात शुरू की। ‘हिन्दुस्थान समाचार दीवानों की न्यूज एजेंसी है। यह देशभक्तों की है।’ इस पहचान को उन्होंने उजागर किया। वे ‘भाषा’ के एक दशक तक संपादक रहे। अपने अनुभव का निचोड़ बताते हुए कहा कि ‘विचार में पक्ष हो और समाचार निष्पक्ष हो।’

न्यूज एजेंसी की पत्रकारिता पर सभी वक्ता बोले। बोलने वालों में डा. वेदप्रताप वैदिक के अलावा लवकुमार मिश्र, कुमार आनंद, रामबहादुर राय, मधुकर उपाध्याय, जगदीश उपासने थे। अध्यक्षता आर.के. सिन्हा ने की।

जिन्होंने हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषी न्यूज एजेंसी को नंबर एक बनाने की ठानी है। इसी इरादे से उन्होंने घोषणा की कि देश के सभी सात सौ चौबीस जिलों में संवाददाता नियुक्त किए जाएंगे। भाषाई न्यूज एजेंसी का अतीत संघर्षमय रहा है।

क्योंकि सत्ता का सहयोग और संरक्षण अंग्रेजी की न्यूज एजेंसी पीटीआई को शुरू से ही मिला। संसद मार्ग पर सरकार ने पीटीआई को जमीन दी। भवन बनाने के लिए मदद दी। उसके कई फ्लोर अपने दफ्तर के लिए किराए पर लिया। इस तरह सरकार ने उसे स्वावलंबी बनने में मदद की। यही सद्भाव भाषाई न्यूज एजेंसी के साथ सरकार ने क्यों नहीं प्रकट किया? जो पहले नहीं हुआ, वह क्या आज नहीं हो सकता!

अपनी भाषा में खबर मिले। यह कौन नहीं चाहता! सभी चाहते हैं। इसी जरूरत को भाषाई न्यूज एजेंसी पूरी करती है। अपनी भाषा के रसायन से बना समाचार अधिक स्वस्थ और संदेशपरक होगा। अनुवाद के पीलेपन से मुक्त होगा।

अपने मूल स्वरूप में होगा। ऐसा समाचार अपने समय से सीधा संवाद कर सकने में समर्थ होगा। बदलाव का वाहक भी होगा। प्रामाणिक भी होगा। ऐसी ही उपयोगी बातें विमर्श से निकलीं। हर वक्ता ने न्यूज एजेंसी की शैली के बारे में अपने अनुभवों से सुझाव दिए।

जिसका सार यह था कि न्यूज एजेंसी की जरूरत हर परिस्थिति में इसलिए बनी रहेगी, क्योंकि प्रामाणिक खबरों की ललक सबको रहती ही है।

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विश्वसनीयता और प्रामाणिकता राय की पत्रकारिता की जान है। हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषीय न्यूज एजेंसी से उन्होंने पत्रकारिता में कदम रखा था। वे जनसत्ता के चुने हुए शुरुआती सदस्यों में एक रहे हैं। राय ‘जनसत्ता’ के ‘संपादक, समाचार सेवा’ के रूप में संबद्ध रहे। चार वर्षों तक पाक्षिक पत्रिका ‘प्रथम प्रवक्ता’ का संपादन किया। फिलहाल ‘यथावत’ के संपादक हैं।

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