सबसे बड़ा घोटाला

कोर्ट के फैसले ने सभी को हक्का-बक्का कर दिया है। हर किसी के मन में सवाल उठ रहा है। वह सवाल एक ही है- क्या टूजी घोटाला हुआ ही नहीं था? अक्सर मौन रहने वाले पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी इस सवाल पर बोल पड़े।

कांग्रेस पार्टी और मनमोहन सिंह ने वही कहा, जिससे उनकी सियासत को गति मिलती है। सत्य की खोज पर वे मौन हैं।  ऐसे में 21 दिसंबर से भ्रम की स्थिति बनी हुई है।

सीबीआई कोर्ट ने टूजी घोटाले पर 1552 पेज का फैसला सुनाया है। इस फैसले में किसी को दोषी नहीं ठहराया गया। सभी 17 आरोपियों को बाइज्जत बरी कर दिया गया। कोर्ट के इस निर्णय से देश की जनता हतप्रभ है।

इसकी वजह है, क्योंकि टूजी को लेकर जो दस्तावेज इधर-उधर मौजूद हैं, उससे इस बात के संकेत मिलते हैं कि टूजी घोटाला हुआ था। इस घोटाले में ए. राजा सहित तमाम लोगों की हिस्सेदारी थी।

तब स्वयं सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले से स्पष्ट कर दिया था कि घोटाला हुआ है। कोर्ट ने माना था कि टूजी के आवंटन में अनियमितता हुई है। यह बात 2012 की है।

घोटाले के मद्देनजर जनहित याचिका दायर हुई। उस पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने माना था कि स्पेक्ट्रम के आवंटन में नियम-कानून का पालन नहीं हुआ। कोर्ट ने कहा कि दूरसंचार मंत्री ने मनमाने तरीके से स्पेक्ट्रम बांटा है।

इसमें कुछ खास कंपनियों का पक्ष लिया गया है, ताकि उन्हें लाइसेंस मिल पाए। लिहाजा कोर्ट ने 122 लाइसेंस रद्द कर दिए थे।यही निष्कर्ष कैग (नियंत्रकऔर महालेखाकार परीक्षक) का भी था।

“कोर्ट का कहना कि सीबीआई के अधिकारी, गवाह और वकील सभी कुछ बोलने से बच रहे थे। इससे इतना तो स्पष्ट है कि टूजी मामले में सभी आरोपियों को
बचाने की साजिश रची गई थी।”

कैग ने टूजी के संबंध में जो रिपोर्ट पेश की थी, उसमें हेराफेरी का कच्चा चिट्ठा दर्ज है। उसके मुताबिक टूजी के आवंटन में हर स्तर पर हेराफेरी की गई। पहली बात यह है कि साल 2001 की दर पर 2007-08 में स्पेक्ट्रम को बेचा गया।

दूसरी बात है- प्राकृतिक संसाधनों को बेचने के लिए कोई निविदा नहीं निकाली गई। जबकि वित्त मंत्रालय ने साफ कहा था कि निविदा निकालकर स्पेक्ट्रम बेचा जाना चाहिए।

तीसरी महत्वपूर्ण बात है- ट्राई की अनुशंसा को भी नहीं माना गया। ट्राई ने 2007 में कहा था कि जो आवेदन आए हैं, उनमें ज्यादातर दूरसंचार सेवा प्रदाताओं के पास जरूरी पूंजी नहीं हैं, इसलिए स्पेक्ट्रम का आवंटन रोक देना चाहिए। पर दूरसंचार मंत्रालय इसके लिए तैयार नहीं था। इस वजह से 1.76 लाख करोड़ रुपए के राजस्व का नुकसान हुआ।

हेराफेरी का यह खेल कैसे हुआ? इसका पूरा ब्यौरा कैग की रिपोर्ट में है। तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए. राजा ने अपने लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए निविदा निकालने की बजाए ‘पहले आओ, पहले पाओ’ की नीति बनाई।

इसमें भी उन्होंने गड़बड़ी की। 2003 से यह नीति चल रही थी। इसके मुताबिक जो पहले आवेदन करता है, उसे प्राथमिकता दी जाती है। पर ए. राजा ने बिना किसी वैध कारण के इस नियम को बदल दिया। मतलब प्राथमिकता उसे नहीं दी जाएगी, जिसने पहले आवेदन किया है, बल्कि उसे दी जाएगा जो ‘लेटर ऑफ इंटेट’ पहले जमा करेगा।

इस तरह की फेरबदल के साथ आवेदन भेजने की तिथि तय की। उसे चुनिंदा कंपनियों को बता दिया गया। उसके बाद विज्ञापन जारी किया गया। जब स्पेक्ट्रम के लिए आवेदनों का तांता लग गया तो कानून मंत्रालय ने मूल्य निर्धारण पर चर्चा के लिए मंत्रियों का एक समूह बनाने की बात कही।

पर दूरसंचार मंत्री ने उस सुझाव को ठुकरा दिया। उन्होंने कहा कि इसकी जरूरत तब पड़ती जब कोई नई नीति का मसला होता। स्पेक्ट्रम वाले मामले में कुछ नहीं है, इसलिए मंत्री समूह बनाने की आवश्यकता नहीं है।

दिलचस्प बात यह है कि सरकार उनकी बात मान गई। इस तरह ए.राजा ने अपने चहेतों को स्पेक्ट्रम बांटने की पृष्ठभूमि तैयार कर दी। इसके बाद असल खेल शुरू हुआ।

ए.राजा ने बतौर दूरसंचार मंत्री उन कंपनियों को सस्ते दामों में स्पेक्ट्रम बांटा जिनका दूरसंचार से कोई संबंध था। फिर अराजकता के ऐसे दौर का आगाज किया गया जहां कानून अपना अर्थ खो चुका था।

उन्होंने 85 ऐसी कंपनियों को लाइसेंस दिया जिनके पास निर्धारित पूंजी भी नहीं थी। इसी तरह 45 उन कंपनियों का साथ दिया जिनका ‘मेमोरेंडम ऑफ एसोसियएशन’ तक गलत था।

यही नहीं रिलायंस इंफोकॉम और टाटा टेलीसर्विसेज को फायदा पहुंचाने के लिए ए.राजा ने अन्य कंपनियों के आवेदन को खारिज कर दिया। यह सब तक किया गया जबकि अन्य टेलीकॉम सेवा प्रदाता भी योग्यता रखते थे। राजा ने सबसे बड़ा खेल यूनीटेक और स्वान कंपनी को लाइसेंस देने में किया।

इन दोनों कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए उन्होंने अपने हाथ से ‘पहले आओ, पहले पाओ’ की परिभाषा में बदलाव किया। इन दोनों कंपनियों का पक्ष लेने का सिलसिला यही नहीं रुका। मनमाने तरीके से आवेदन प्राप्त करने की तारीख 25 सितंबर 2007 कर दी। फिर उसे बढ़ा कर 1 अक्टूबर 2007 कर दिया।

इस कहानी को 5 मई 2010 को डॉ. मुरली मनोहर जोशी की अध्यक्षता में बनी लोक लेखा समिति ने भी दोहराया। बस अंतर इतना ही है कि वह रिपोर्ट कांग्रेसी सदस्यों की वजह से सदन के पटल पर नहीं रखी जा सकी।

समिति ने जो रिपोर्ट तैयार की थी उसे कांग्रेस के लोगों ने बतौर समिति के सदस्य पास नहीं किया। इसलिए नियमानुसार उसे पेश नहीं किया जा सका। वह रिपोर्ट 575 पेज की थी। उसमें 276 पेज दस्तावेज थे। उस रिपोर्ट ने यूपीए सरकार को टूजी के मामले में उल्टा खड़ा कर दिया था।

इससे कांग्रेसी तिलमिला गए थे। उसकी बड़ी वजह यह थी कि कमेटी ने प्रधानमंत्री कार्यालय और वित्त मंत्रालय को कटघरे में खड़ा कर दिया था। जहां तक बात दूरसंचार मंत्री ए.राजा का सवाल है तो उनकी भूमिका संदेह के दायरे में थी ही।

वे जिस तरह से कंपनियों के एजेंट बने हुए थे उससे उन  पर सवाल उठना स्वभाविक था।सुब्रह्मण्यम स्वामी कहते हैं कि स्वान का हित साधने के लिए बीएसएनएल को स्वान कंपनी से रोमिंग समझौता करने के लिए मजबूर किया गया।

उनकी ही कृपा से कंपनी को उस सर्किल में स्पेक्ट्रम मिल गया जहां पहले से ही रिलायंस काम कर रहा था। नियम के मुताबिक वहां स्वान को स्पेक्ट्रम नहीं दिया जाना चाहिए था। पर मंत्री की मेहरबानी की वजह से उन्हें वहां स्पेक्ट्रम मुहैया कराया गया।

स्वामी के मुताबिक ए.राजा ने स्वान को महज 1537 करोड़ रुपए में स्पेक्ट्रम मुहैया करा दिया। उसने इसका कुछ हिस्सा 4500 करोड़ रुपए में दुबई की एक कंपनी को बेच दिया। फिर ग्रीन हाउस प्रामोटर लि का 49 प्रतिशत शेयर 1000 करोड़ रूपए में खरीदा।

इस कंपनी से ए.राजा की पत्नी एमए.परमेश्वरी जुड़ी है। क्या यह महज इत्तफाक है कि स्वान ने उसी कंपनी में निवेश किया जिसमें ए.राजा की पत्नी है।बावजूद इसके कोर्ट ने जो फैसला दिया है, उसने सबको चौंका दिया है। सवाल यह है कि कोर्ट इस निर्णय पर पहुंचा कैसे?  

इसका जवाब कोर्ट के निर्णय और लोक लेखा समिति की रिपोर्ट में है। समिति की रिपोर्ट के मुताबिक कांग्रेस ने टूजी घोटाले पर पर्दा डालने की साजिश बखूबी रची थी। पहले तो सीबीआई ने दो साल तक कोई मामला ही दर्ज नहीं किया।

“स्वामी के मुताबिक ए.राजा ने स्वान को महज 1537 करोड़ रुपए में स्पेक्ट्रम मुहैया करा दिया। उसने इसका कुछ हिस्सा 4500 करोड़ रुपए में दुबई की एक कंपनी को बेच दिया।”

जब मामला दर्ज किया तो उसमें किसी का नाम ही नहीं थी। अनजान लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। ऐसा तब किया जबकि कई लोगों को सीबीआई गिरफ्तार कर चुकी थी।

जब सीबीआई से समिति ने पूछा कि आपने अनजान लोगों के खिलाफ मुकदमा क्यों दर्ज किया ? इस पर तत्कालीन निदेशक अजय सिंह ने कहा सीवीसी (केंद्रीय सतर्कता आयोग) ने जो रिपोर्ट भेजी थी उसमें किसी का नाम नहीं था।

इससे साफ है कि दोनों ही एजेंसियां नहीं चाहती थी कि किसी को आरोपी बनाया जाए। जाहिर है इसका आदेश उन्हें ऊपर से आया होगा। तभी तो 2जी मामले में आरोपियों को बचाने का काम एजेंसियां कर रही थी।

यही वजह रही कि जिस अधिकारी को टूजी केस सौंपा गया, उसे साथ में कई और केस भी दे दिए गए।मसलन 2010 के शुरुआत में वह किसी दूसरे केस में व्यस्त थे।

उससे निपटने के बाद एनटीपीसी के केस में लग गए। इसी दौरान वह कम्प्यूटर कोर्स के लिए फ्लोरिडा चले गए। वहां जाने से पहले वह चार-पाच महीने तैयारी में लगे रहे।

फ्लोरिड़ा से आने के बाद भारत में एक कोर्स करने लगे। उसमें भी चार महीने लगा। इस दरमियान जांच चलती रही। जांच, बिना जांच अधिकारी के कैसी चली? इसे सहज ही समझा जा सकता। तत्कालीन कांग्रेस सरकार भी यही चाहती थी कि जांच ठीक से न हो।

हुआ भी यही। अप्रैल 2011 और अप्रैल 2014 में सीबीआई ने जो चार्जशीट दाखिल की उसमें कोई दम नहीं था। साथ सीबीआई का रवैया भी टूजी को लेकर सही नहीं था। इसकी कहानी कोर्ट के फैसले में लिखी है।

कोर्ट ने कहा है कि वह सात साल तक रोज सबूत का इंतजार करती रही। पर सीबीआई ऐसा कोई साक्ष्य लाने में विफल रही, जिससे आरोप साबित हो सके। कोर्ट ने माना है कि शुरू में सीबीआई ने काफी उत्साह दिखाया था।

आरोपियों के खिलाफ जोरदार पैरवी भी की। अदालत सीबीआई की चार्जशीट से भी संतुष्ट थी। उसे भरोसा था कि एजेंसी ठीक काम रही है। इसी वजह कोर्ट ने आरोपियों को जमानत देने से इंकार कर दिया था। पर धीरे-धीरे सीबीआई का रवैया बदल गया।

हालात यह हो गए कि  बहस के दौरान कोर्ट में न तो जांच अधिकारी रहते थे और न ही कोई वरिष्ठ अधिकारी। एक सब इस्पेक्टर मनोज कुमार को इतने बड़े घोटाले की पैरवी के लिए तैनात कर दिया गया। जांच अधिकारी विवेक प्रियदर्शी को व्यापाम घोटाले की जांच में लगा दिया गया।

मामला तब और बिगड़ गया जब  विशेष अभियोजक यूयू ललित सुप्रीम कोर्ट के जज बन गए। उनके बाद नियुक्त विशेष अभियोजक ने आरोपों को साबित करने में कोई रुचि नहीं दिखाई। पहले तो उन्होंने अदालत में बहस करने से इनकार कर दिया।

उनका कहना था कि वे आरोपियों की ओर उठाए गए सवालों का लिखित जवाब देंगे। लेकिन जब लिखित जवाब देने की बारी आई, तो वे मौखिक बहस करने लगे। कोर्ट के मुताबिक विशेष अभियोजक, सरकारी अभियोजक और सीबीआई के बीच  कोई तालमेल नहीं था।

आरोप पत्र में कई तथ्य गलत और भ्रामक थे। कई बार तो सीबीआई जो जवाब देती थी, उसमें हस्ताक्षर ही नहीं होते थे। कहने पर सब टालमटोल करते थे। उससे ऐसा लगता था कि मानो कोई जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार ही नहीं है।

उससे ऐसा लगता था कि मानो कोई जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार ही नहीं है। कोर्ट का कहना कि सीबीआई के अधिकारी, गवाह और वकील सभी कुछ बोलने से बच रहे थे।

इससे इतना तो स्पष्ट है कि टूजी मामले में सभी आरोपियों को बचाने की साजिश रची गई थी। इसलिए सक्ष्यों को कोर्ट के सामने पेश नहीं किया गया।

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पिछले चार सालों में जितेन्द्र ने जो रिपोर्ट लिखी है, उससे इनकी पहचान एक खोजी पत्रकार की बनी है। देश-दुनिया की आर्थिक गतिविधियों के साथ-साथ भारत के अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर भी वे मौलिक दृष्टि रखते हैं। सरकारी नीतियों के क्रियान्वयन का विषय चतुर्वेदी के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

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