सनक में संसद

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संसद ठप्प है। इसलिए नहीं कि सांसद आपे से बाहर हैं बल्कि इसलिए क्योंकि हंगामा करने के लिए उनके नेताओं ने उन्हें निर्देश दे रखा है। संसद के न चलने पर चिंता बहुत पुरानी है।

संसद में हंगामा हो रहा है। कामकाज नहीं हो रहा है। 5 मार्च को बजट अधिवेशन का अगला सत्र प्रारंभ हुआ। उसी दिन से संसद ठप्प है। इसलिए नहीं कि सांसद आपे से बाहर हैं बल्कि इसलिए क्योंकि हंगामा करने के लिए उनके नेताओं ने उन्हें निर्देश दे रखा है।

संसद के न चलने पर चिंता बहुत पुरानी है। इस समय जो हालत है उससे अगर किसी नागरिक का खून खौलने लगे तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। किसी भी पैमाने से संसद को देखें तो उसका काम विधिसम्मत व्यवस्था बनाना है, न कि बनी हुई व्यवस्था को ध्वस्त करना है।

पहले भी ऐसी खबर छपी थी और इस समय भी छपी है कि इस पर लालकृष्ण आडवाणी अत्यंत क्षुब्ध हैं। वे जिस अवस्था को प्राप्त हैं वह उन्हें शिखर पर बैठाता है।

जिसकी बात सभा को सुननी चाहिए। लेकिन जिस लोकसभा के वे इस समय सदस्य हैं वहां उनकी सुनने वाला कोई नहीं है। ऐसा क्यों है? क्या वर्तमान लोकसभा का विपक्ष उस विपिन चंद्रपाल को सच साबित कर रहा है जिन्होंने 1 सितंबर, 1927 को एक लेख लिखा था।

जिसका शीर्षक था-‘जवाबदेह सरकार के हम अयोग्य हैं।’ उनके लेख का यह अंश पढि़ए- ‘अनेक भोले भाले लोगों की यह सनक है कि यदि हमें पूर्णतया संसदीय संविधान प्राप्त हो जाए तो हमारे आज के सब कष्ट मिट जाएंगे।

परंतु संसदीय संविधान तो संसदीय शासन के लिए वांछित स्थितियां नहीं बना सकते।’ यह उनकी तब चेतावनी थी। अब विपक्ष अपने आचरण से इसे उनकी भविष्यवाणी बना रहा है।

विपक्ष न केवल विपिन चंद्रपाल को सच साबित कर रहा है बल्कि कांस्तेन्तिन पोबेदोनोस्तसेव (मोस्कावस्की स्बोरनिक) के कथन को भी पत्थर की लकीर बना रहा है। मन की मौज में कहे गए एक वाक्य को हमारे सांसद ‘ईश वचन’ बना रहे हैं। उनका कथन है-‘संसदें हमारे युग का सबसे बड़ा झूठ हैं।’

सोचिए! जो संसद होकर भी न चल रही हो वह झूठ के सिवा और क्या हो सकती है? क्या ऐसी संसद आम नागरिकों की चिंता कर सकेगी? क्या वह शासन को जवाबदेह बना सकेगी? इसका उत्तर खोजना नहीं है, वह तो साक्षात प्रकट है।

क्या ऐसी संसद एडमंड बर्क की सलाह सुनेगी? उन्होंने 3 नवंबर, 1774 को ब्रिस्टल के लोगों से कहा था कि ‘संसद विभिन्न और परस्पर विरोधी हितों के प्रतिनिधियों का सम्मेलन नहीं है,

जिन हितों का प्रतिपादन प्रत्येक को अभिकर्ता और समर्थक के रूप में अन्य अभिकर्ताओं व समर्थकों के विरुद्ध करना है, अपितु संसद, एक राष्ट्र की, एक हित में-वह भी संपूर्ण के हित में-विचार विमर्शात्मक सभा है,

जहां पर स्थानीय उद्देश्यों व स्थानीय पूर्वाग्रहों को नहीं, अपितु समष्टि की व्यापक बुद्धि से उत्पन्न सर्वकल्याण के लिए देश का मार्गदर्शन करना चाहिए।

आप अवश्य ही एक सदस्य को चुनते हैं, किंतु जब आप उसको चुन चुके हैं, तब वह ब्रिस्टल का सदस्य नहीं है, अपितु वह संसद का सदस्य है।’ वह ऐसी कसौटी है जिस पर अपनी संसद को हमेशा परखा जाना चाहिए।

इसे भारत के नागरिक मानते हैं। लेकिन क्या सांसद भी मानते हैं? ऐसा नहीं लगता। ऐसी स्थिति में वर्तमान संसद के सदस्यों को याद करना होगा कि वह सभा, सभा नहीं होती जहां संत लोग न हों, और वे संत नहीं जो धर्म का आचरण और धर्म पर भाषण न करते हों।

इस संसद में लालकृष्ण आडवाणी जैसा संत है। उन्हें धर्म भी आता है और उस पर आचरण भी। लेकिन उनकी दशा उस वेदव्यास की तरह है जो दोनों भुजाएं उठाकर धर्म का उपदेश तो दे रहा है पर उन्हें सुनने वाला कौन है!

लगता है कि संविधान के निर्माताओं ने  वैदिक युग को याद कर बड़े भरोसे से लोकतंत्र के लिए संसद बनवाई। लेकिन उन्हें कहां पता था कि उनकी बनाई संसद का इतना अधिक अवमूल्यन हो जाएगा कि सांसद अपना धर्म ही भूल जाएंगे।

वे संसद को एक ‘राज सभा’ यानी पार्टी की सभा में बदल देंगे। जिसे लोकसभा के अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति नहीं, पार्टी के नेता चलाएंगे। जो स्थिति है, वह लोकतंत्र के नाम पर छुद्र पार्टी तंत्र यानी दूसरे शब्दों में पार्टी की सामंतशाही कायम हो गई है।

लोकतंत्र में बहस संविधान से बनी सभाओं और नागरिकों के बीच होती है। सामंतशाही में बहस नहीं, दरबार लगता है। बहस पर विराम रहता है। इसीलिए लोकतंत्र को उससे बेहतर माना गया है।

यहां लोकतंत्र के प्रहरी पार्टी के ‘लठैत’ हो गए हैं। आजकल के शब्दों में वे माफिया जैसा व्यवहार कर रहे हैं। सोचिए! ऐसी संसद क्या किसी काम की हो सकती है!

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पिछला लेखवाह रे जगन मोहन
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विश्वसनीयता और प्रामाणिकता राय की पत्रकारिता की जान है। हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषीय न्यूज एजेंसी से उन्होंने पत्रकारिता में कदम रखा था। वे जनसत्ता के चुने हुए शुरुआती सदस्यों में एक रहे हैं। राय ‘जनसत्ता’ के ‘संपादक, समाचार सेवा’ के रूप में संबद्ध रहे। चार वर्षों तक पाक्षिक पत्रिका ‘प्रथम प्रवक्ता’ का संपादन किया। फिलहाल ‘यथावत’ के संपादक हैं।

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