सत्ता के शिखर पर शी

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चीनी संसद की पांच मार्च से आरंभ हुई बैठक में चीन के संविधान से यह बात निकाल दी गई कि चीन के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति केवल दो अवधि के लिए ही इस पद पर चुने जा सकते हैं।

यह धारा माओत्से तुंग के समय हुई गलतियों के कारण जोड़ी गई थी। यह माना गया था कि लंबी छलांग और सांस्कृतिक क्रांति के दौरान हुई गलतियों का कारण माओत्से तुंग का नेतृत्व था जिसे चुनौती नहीं दी जा सकती थी।

देंग श्याओ पिंग के नेतृत्व में चीन के नेताओं ने यह निर्णय किया कि आगे साझे नेतृत्व के आधार पर ही निर्णय किए जाएंगे।

किसी एक नेता को सर्वशक्तिमान न होने देने के लिए ही दो अवधि की यह सीमा संविधान में डाली गई थी। शी जिनपिंग के नेतृत्व में अब यह नीति छोड़ दी गई है।

यह मान लिया गया है कि शी के नेतृत्व में चीन को जो दिशा मिली है और जो नया लक्ष्य मिला है, उसे प्राप्त करने के लिए उनके नेतृत्व की निरंतरता आवश्यक है।

अगर चीन के संविधान में पुराने प्रावधान बने रहते तो शी को 2023 में सत्ता छोड़नी पड़ती। उनके नेतृत्व के लिए कोई बाधा नहीं रह गई है। परिस्थितियां उनके अनुकूल रहती हैं तो वे आजीवन सत्ता में रह सकते हैं।

शी जिनपिंग को अनियत काल तक सत्ता में बनाए रखने का अनौपचारिक फैसला पिछले वर्ष पार्टी कांग्रेस की बैठक के समय ही हो गया था।

पोलित ब्यूरो में किसी युवा व्यक्ति का न लिया जाना इसी बात का संकेत था।

देंग श्याओ पिंग के समय से चली आ रही यह अलिखित मर्यादा छोड़ दी गई थी कि 65 वर्ष की आयु के बाद के किसी व्यक्ति का पार्टी और सरकार के स्तर पर चुनाव नहीं किया जाएगा।

उस समय शी जिनपिंग 64 वर्ष के थे। पुरानी मर्यादा बनी रहती तो वे केवल एक बार ही और चुने जा सकते थे। उस हालत में उन्हें पार्टी का महासचिव पद पांच वर्ष बाद छोड़ना पड़ता।

चीन में मुख्य भूमिका पार्टी के महासचिव की ही होती है। शी जिनपिंग पार्टी के महासचिव होने के नाते ही चीन के राष्ट्रपति और चीनी सेनाओं के सर्वोच्च कमांडर हैं।

शी जिनपिंग को 2012 में पार्टी का महासचिव बनाया गया था। उस समय किसी ने यह नहीं सोचा था कि वे कुछ ही समय में इतने ताकतवर हो जाएंगे।

शी के पांच वर्ष में ही इतना शक्तिशाली होने का कारण यह है कि उन्होंने चीनी नेतृत्व को यह विश्वास दिलाया है कि वे 2049 तक चीन को संसार की अग्रगण्य शक्ति बना देंगे और आर्थिक व सामरिक दृष्टि से चीन अमेरिका के स्तर पर पहुंच जाएगा।

चीन को इस दिशा में आगे बढ़ाने के लिए ही उन्होंने लगभग एक हजार अरब डॉलर के निवेश की वन वेल्ट-वन रोड योजना बनाई है।

इस योजना के अंतर्गत दुनिया के अधिकांश क्षेत्रों को जोड़ने वाला एक व्यापारिक मार्ग विकसित किया जा रहा है। यह व्यापारिक मार्ग समुद्र के रास्ते भी होगा और स्थल मार्ग से भी होगा।

इस व्यापारिक मार्ग पर सभी तरह की सुविधाएं विकसित करने के लिए चीन ने इतनी विशाल वित्तीय व्यवस्था के बारे में सोचा है।

चीन की यह योजना यूरोप और अमेरिकी अनुभव पर आधारित है।

शी जिनपिंग का मानना है कि यूरोप और अमेरिका एक व्यापारिक साम्राज्य खड़ा करके ही समृद्ध हुए हैं। चीन भी उनका अनुकरण कर एक व्यापारिक साम्राज्य खड़ा करना चाहता है।

जिस तरह दूसरे विश्वयुद्ध में ध्वस्त हुए यूरोप के ढांचे का पुनर्नर्मिाण करने के लिए मार्शल योजना बनाई गई थी और उसके लिए व्यापक साधन जुटाए गए थे, उसी तरह चीन अगले पांच-छह वर्ष तक डेढ़-दो सौ अरब डॉलर प्रतिवर्ष खर्च करके व्यापारिक सुविधाओं का विकास करना चाहता है।

“शी जिनपिंग को अनियत काल तक सत्ता में बनाए रखने का अनौपचारिक फैसला पिछले वर्ष पार्टी कांग्रेस की बैठक के समय ही हो गया था।”

वह अपने व्यापारिक साम्राज्य की नींव के तौर पर अनेक औद्योगिक क्षेत्र खड़े कर रहा है। पाकिस्तान में विकसित किया जा रहा औद्योगिक क्षेत्र उनमें से एक है जिसमें चीन 50 अरब डॉलर से अधिक का निवेश करने का वायदा कर चुका है।

यूरोप की समृद्धि के पीछे एक औपनिवेशिक सत्ता के रूप में उसका उदय था। अमेरिकी महाद्वीप पर नियंत्रण से पहले यूरोपीय संसार के केवल 6.7 प्रतिशत भूगोल में सीमित थे।

अमेरिकी महाद्वीप और उसके बाद ऑस्ट्रेलिया आदि के विशाल क्षेत्रों पर नियंत्रण होने के बाद वे संसार के 38 प्रतिशत भू-भाग के स्वामी हो गए।

उन्होंने वहां की स्थानीय आबादी को समाप्त करके इस विशाल क्षेत्र का पूरा नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। यूरोपीय लोगों के पहुंचने से पहले अमेरिकी महाद्वीप पर ही लगभग दस करोड़ लोग थे।

एक शताब्दी से कम समय में ही उनमें से 90 प्रतिशत लोग समाप्त कर दिए गए। इन क्षेत्रों की विशाल संपत्ति यूरोपीय जाति की समृद्धि के मूल में है।

उसके बाद भारत आदि उपनिवेशों का दोहन हुआ। 19वीं शताब्दी की औद्योगिक क्रांति और बीसवीं शताब्दी की प्रौद्योगिकीय क्रांति उनके व्यापारिक साम्राज्य की अगली कारक थी।

यूरोप के अनुकरण पर चीन ने भी एक औपनिवेशिक सत्ता का स्वरूप लिया। आज के चीन में 55 प्रतिशत भू-भाग वह है जो पहले कभी चीन का हिस्सा नहीं था।

शिंजियांग और तिब्बत को उसने जबरन हस्तगत करके अपने राज्य में समाहित किया है।

लेकिन यह दोनों क्षेत्र उसकी समृद्धि का वैसा आधार नहीं हो सकते, जैसा अमेरिकी महाद्वीप और अन्य क्षेत्र यूरोपीय लोगों की समृद्धि का आधार हुए।

चीन के पास उस तरह का भी कोई बाहरी उपनिवेश नहीं है जैसा यूरोप के पास भारत और अफ्रीकी देश थे। लेकिन उसने कम्युनिस्ट शासन के द्वारा अपनी विशाल आबादी को आंतरिक उपनिवेश की तरह ही इस्तेमाल किया है।

चीन की बहुसंख्या चीन के शासकों की महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिए अब तक कोल्हू के बैल की तरह जोती जाती रही है।

इस आंतरिक उपनिवेशीकरण से चीन को वे सब साधन जुटाने का मौका मिल गया है जो तेज और औद्योगीकरण और आर्थिक विकास के लिए आवश्यक होते हैं।

पश्चिमी विशेषज्ञ लंबी छलांग और सांस्कृतिक क्रांति में हुई ज्यादतियों के कारण माओ के आलोचक हैं। वे चीन की प्रगति के लिए अधिक श्रेय देंग श्याओ पिंग के नेतृत्व को देते हैं।

उनका मानना है कि देंग ने आर्थिक सुधारों की नींव रखी। उन्हें आशंका है कि शी देंग के राजनैतिक सुधारों को पीछे लौटा सकते हैं। शी की वन वेल्ट-वन रोड परियोजना के बारे में भी उनकी अनेक शंकाएं हैं।

उनका कहना है कि इस महत्वाकांक्षी योजना के लिए धन जुटाना आसान नहीं होगा। इस परियोजना के लिए चीन ने लगभग एक हजार अरब डॉलर निवेश का लक्ष्य रखा है।

अभी भी चीन पर उसके सकल उत्पादन के 250 प्रतिशत के बराबर कर्ज है। उनका यह भी मानना है कि इस परियोजना में काफी जोखिम है और चीन का निवेश डूब सकता है।

दूसरी तरफ कुछ लोग कह रहे हैं कि तेज गति से आगे बढ़ने की उतावली में चीन ने अपनी आवश्यकता से अधिक साधन और क्षमता पैदा कर ली गई थी।

इस परियोजना में उसी का इस्तेमाल हो रहा है। शी ने अपना राजनैतिक भविष्य दांव पर लगाते हुए इस परियोजना को आगे बढ़ाया है।

आज शी सर्वशक्तिमान दिख रहे हैं, लेकिन अगर उनकी योजना सफल न हुई और चीन को एक व्यापारिक साम्राज्य बनाने का जो सपना उन्होंने देखा है, वह पूरा न हुआ तो उनका नेतृत्व खतरे में पड़ सकता है।

चीन के साम्यवादी तंत्र में सब शी के समर्थक नहीं हैं। लेकिन अभी किसी के पास चीन के भविष्य की कोई वैकल्पिक परिकल्पना नहीं है। इसलिए कोई शी की परियोजना पर उंगली नहीं उठा रहा।

शी भी यह जानते हैं कि उनकी यह परियोजना ही उनका भविष्य निर्धारित करेगी। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी और चीनी राज्यतंत्र की पूरी शक्ति को शी के अभियान में लगाने के लिए उनके विचारों को संविधान में शामिल करवा दिया गया है।

 “भारत के लिए चीन माओ के जमाने से ही चुनौती बना हुआ है। शी के शिखर पर पहुंचने से हमारे लिए कोई नई चुनौती पैदा नहीं हुई है।”

शी सतर्कतापूर्वक असहमत रहने वाले नेताओं को किनारे करते जा रहे हैं। हालांकि यह सभी कम्युनिस्ट व्यवस्थाओं में होता रहा है।

शी अपने पूर्ववर्ती चीनी नेताओं से अलग भी हैं और कुछ मामलों में उनका नेतृत्व पिछले नेतृत्व की निरंतरता में ही है। माओ साम्यवादी विचारधारा की उपज थे।

वे एक बड़े हिंसक संघर्ष का नेतृत्व करते हुए महान नेता हुए थे। इसलिए वे विचारधारात्मक अधिक थे और अपने तौर-तरीकों में काफी निर्मम थे।

चीन को जल्दी से जल्दी विश्व शक्ति बनाने की उतावली में उन्होंने पूरे देश को लोहा गलाने और स्टील पैदा करने में झोंक दिया। उनकी लंबी छलांग इस झोंक में तीन से साढ़े चार करोड़ लोग भुखमरी और बीमारी का शिकार हुए।

इस असफलता के कारण उन पर अपने कुछ अधिकार छोड़ने का दबाव आ गया था। इस दबाव को समाप्त करने के लिए ही सांस्कृतिक क्रांति की ब्यूह रचना की गई थी।

इस सांस्कृतिक क्रांति के दौरान चीनी लोगों पर बहुत बर्बर अत्याचार हुए थे। सांस्कृतिक क्रांति के दौरान स्वयं शी और उनके परिवार को भी काफी भुगतना पड़ा था।

उनके पिता चीन के उप प्रधानमंत्री थे। सांस्कृतिक क्रांति के दौर में उन्हें पदच्युत कर दिया गया। कुछ समय बाद 1968 में उन्हें जेल भेज दिया गया और वहां से वे 1972 में ही छूट पाए।

सांस्कृतिक क्रांति के दौर में शी की बहन को मार डाला गया। शी को भी राजनैतिक शिक्षण के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में भेजा गया था।

वहां की असहनीय परिस्थितियों से घबराकर शी वहां से पेइचिंग भाग आए थे। उनके पारिवारिक संबंधों ने उनकी रक्षा न की होती तो शी का राजनीतिक जीवन वही समाप्त हो गया होता।

अब तक लंबी छलांग और सांस्कृतिक क्रांति की बहुत आलोचना हुई है और चीन के इस दौर को उसके इतिहास का काला दौर बताया गया है।

यह सब पूरी तरह सच है, पर चीन के नेताओं के लिए इस दौर में हुए अत्याचार महत्वपूर्ण नहीं हैं।

उनके लिए महत्व इस बात का है कि माओ ने एक ग्रामीण और खेतिहर समाज को एक सैनिक जैसे समर्पित तंत्र में बदल दिया, जिसका काम आदेश मानना है, अपनी बुद्धि से उचित-अनुचित का निर्णय करना नहीं।

यह भी याद रखना चाहिए कि देंग श्याओ पिंग इस पूरी अवधि में माओ से सहयोगी थे। माओ की मृत्यु के बाद बिना पार्टी और सरकार के सर्वोच्च पदों पर कब्जा किए उन्होंने चीनी अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा में मोड़ा था।

देंग के समय ही अमेरिकी कल-कारखाने चीन स्थानांतरित हुए थे, जिसका रोना डोनाल्ड ट्रम्प आज रो रहे हैं। पर चीन और अमेरिकी सहयोग की नींव माओ के रहते ही पड़ गई थी।

1971 में निक्सन का चीन में स्वागत हुआ था वह माओ का ही काल था। देंग ने चीन के अर्थतंत्र और राजनैतिक तंत्र को कुछ ढीला अवश्य किया। लेकिन देंग के काल में ही चीन की एक परिवार एक बच्चे की नीति सख्ती से लागू की गई थी।

उससे चीनी परिवारों पर जो अत्याचार हुए, वे सांस्कृतिक क्रांति के अत्याचारों से कम नहीं थे। बड़े पैमाने पर स्त्रियों को गर्भ नियंत्रण के स्थायी उपाय करने के लिए बाध्य किया गया और 11 करोड़ स्त्रियों की जबरन नसबंदी कर दी गई।

इस नीति के कारण बहुत से परिवारों में यह सोचकर कन्याओं को मार दिया गया था कि अगले बच्चे के तौर पर उन्हें बेटा प्राप्त हो सकता है।

लाखों परिवारों को दूसरे बच्चे के जन्म के कारण काफी अपमानित किया गया और उन पर भारी जुर्माना लगाया गया।

माओ के काल से ही ग्रामीण क्षेत्र के लोगों के शहरी क्षेत्रों में बसने पर प्रतिबंध चल रहे थे। वे देंग के काल में भी ज्यों के त्यों बनाए रखे गए।

शहरी कारखानों के लिए ग्रामीण क्षेत्रों से जानवरों की तरह मजदूर लाए जाते थे, लेकिन उन्हें शहरों में स्थायी रूप से बसने की अनुमति नहीं थी।

 

चीन के मार्क्सवादी शासकों ने पुरानी ह्यूको व्यवस्था को एक नए वर्ग विभाजन का स्वरूप दे दिया। ग्रामीण क्षेत्र में बसने वाले लोग बहुत सी सुविधाओं से वंचित रखे गए।

चीन की विशाल ग्रामीण आबादी की हालत हमारे यहां गांव के बाहर उप गांवों में रहने वाले छोटी जाति के लोगों जैसी थी।

 

हमारे यहां उनकी संख्या 15 प्रतिशत से अधिक नहीं थी जबकि चीन की अधिकांश आबादी ही इस कोटि में डाल दी गई थी।

 

शी के समय तक चीन के एक आर्थिक शक्ति बनने का आधार तैयार हो चुका था। इसलिए शी 2049 तक चीन को अमेरिका के स्तर तक पहुंचाने का सपना देख सके।

शी को अपने उद्देश्य में कितनी सफलता मिलेगी, कोई नहीं जानता। खुद वे भी नहीं जानते। इसलिए उन्होंने अपने भविष्य को सुरक्षित करने के लिए दो तरह के इंतजाम करने आरंभ कर दिए हैं।

भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर उन्होंने पार्टी, सरकार और सेना के अनेक ताकतवर लोगों को हटाकर अपने समर्थकों को भरना शुरू किया है। शी के सामने दूसरी चुनौती जन असंतोष की है।

उसके लिए चीन के चप्पे-चप्पे पर ऐसे कैमरे लगवाए जा रहे हैं, जो व्यक्ति के चेहरे से उसकी सारी जानकारी उपलब्ध कर देंगे। इस आधुनिक निगरानी व्यवस्था को पूरे देश में लागू करने वाला चीन पहला और अकेला देश है।

भारत के लिए चीन माओ के जमाने से ही चुनौती बना हुआ है। शी के शिखर पर पहुंचने से हमारे लिए कोई नई चुनौती पैदा नहीं हुई है। शी एक अत्यंत महत्वाकांक्षी और निर्मम व्यक्ति हैं।

लेकिन वे एक व्यावहारिक नेता भी हैं। वे सबसे पहले अपनी महत्वाकांक्षी वन वेल्ट-वन रोड योजना को सफल होते देखना चाहते हैं। इसलिए अभी सीधे किसी लड़ाई में पड़ना नहीं चाहेंगे।

लेकिन वे अपने आपको एक निर्णायक नेता भी सिद्ध करना चाहते हैं। इसलिए बहुत से मामलों में उनका रुख आक्रामक रहा है। शी के सामने जोखिम अधिक है।

अब तक के सभी चीनी नेताओं की नीतियां मुसीबत ही साबित हुई हैं। माओ की लंबी छलांग और सांस्कृतिक क्रांति तो बड़ी मुसीबत बनी ही थी।

देंग की एक परिवार एक बच्चा नीति भी उतनी ही मुसीबत साबित हुई। शी की वन वेल्ट-वन रोड परियोजना के मुसीबत बनने की भी कम आशंका नहीं है।

वह शी के अवसान और चीन के राजनैतिक कायाकल्प का माध्यम भी बन सकती है। लेकिन अभी वह समय दूर है।

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