सच बताती पुस्तक

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म्मूकश्मीर संबंधी सबसे बड़ा भ्रम दूर हो सकता है। डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री की पुस्तकजम्मूकश्मीर के जननायक महाराजा हरि सिंहको एक जिज्ञासु पाठक के रूप में पढ़ने मात्र से यह संभव है।

सबसे बड़ा भ्रम अभी भी बना हुआ है। वह यह है कि हरि सिंह जम्मूकश्मीर को स्वतंत्र रखना चाहते थे। भारत में विलय के लिए तैयार नहीं थे। उसी तरह यह भी एक भ्रम ही है कि सरदार पटेल पर छोड़ दिया जाता तो दूसरी रियासतों की भांति जम्मूकश्मीर का भी भारत में विलय हो जाता।

ये दोनों ऐतिहासिक भ्रम हैं। सच क्या है? इसे डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री की पुस्तक तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर परतदरपरत खोलती जाती है।

महाराजा हरि सिंह की यह ऐसी जीवनी है जो पूरे जम्मूकश्मीर के इतिहास से पाठक को परिचित कराती है। हरि सिंह ने जम्मूकश्मीर की सत्ता 1925 में संभाली। तब वे 30 साल के थे। उन्होंने जम्मूकश्मीर पर 22 साल शासन किया।

कम लोग जानते हैं कि वे 1931 के पहले गोलमेज सम्मेलन में भारत के राजाओं और रियासतों के प्रतिनिधि थे। वहां वे जो बोले वह उनके देशभक्त होने का जहां प्रमाण है, वहीं अंग्रेजों के लिए एक चेतावनी भी थी। ऐसा शासक क्यों भारत के विलय का विरोध करेगा?

इस सवाल का जवाब डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री ने देने की सफल कोशिश की है। दरअसल हरि सिंह और जवाहरलाल नेहरू में दृष्टिकोण का जबरदस्त टकराव था। नेहरू उन्हें अपमानित करने का अवसर खोजते रहते थे। आखिरकार पंडित नेहरू ने हरि सिंह को जम्मूकश्मीर से निकलवा ही दिया। वे निर्वासित जीवन जिए।

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री ने प्रामाणिक संदर्भों को खंगाल कर लिखा है किमहाराजा हरि सिंह तीनतीन मोर्चों पर अकेले लड़ रहे थे।आजादी आने के वक्त की यह बात है। पहला मोर्चा माउंटबेटन का था। वे उन पर दबाव डाल रहे थे कि जम्मूकश्मीर को वे पाकिस्तान में मिला दें।

दूसरा मोर्चा पाकिस्तान का था। जो जम्मूकश्मीर को हड़पने के लिए हर तरह की चालें चल रहा था। तीसरा मोर्चा जवाहरलाल नेहरू का था। इसे ही पूरे संदर्भ के साथ इस पुस्तक में पढ़ा जा सकता है।

नेहरू के मनोविज्ञान को जितना बारीकी से इस पुस्तक में रखा गया है, उतना अन्यत्र
कहीं नहीं पाया जाता। 1947 में भारत बंटा। यह माना जाता है कि
जवाहरलाल नेहरू ने महात्मा गांधी की बात मानी होती तो बंटवारा रुक जाता।

महाराजा हरि सिंह दो मोर्चों पर जीते। तीसरे मोर्चे पर भी वे अगर जीत जाते तो जम्मूकश्मीर की समस्या वह नहीं होती जो आज है।

ऐसा क्यों नहीं हो सका? यही समझ लेने की जरूरत है। तभी सबसे बड़े भ्रम का निवारण संभव है। हरि सिंह को जहां श्रेय मिलना चाहिए वहां उन्हें ऐतिहासिक रूप से दोषी ठहरा दिया गया है। क्योंकि तथ्यों को गलत संदर्भ में निरंतर प्रस्तुत किया जाता रहा है।

पहली बार उन्हीं तथ्यों को सही संदर्भ में यह पुस्तक प्रस्तुत करती है। उन्हें पढ़ें तो इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि दोषी जवाहरलाल नेहरू की वह मानसिकता है जिसके अधीन वे काम कर रहे थे। नेहरू के मनोविज्ञान को जितना बारीकी से इस पुस्तक में रखा गया है उतना अन्यत्र कहीं नहीं पाया जाता।

1947 में भारत बंटा। यह माना जाता है कि जवाहरलाल नेहरू ने महात्मा गांधी की बात मानी होती तो बंटवारा रुक जाता। जिन्ना से उनकी प्रतिद्वंदिता जगजाहिर है। वहां नेहरू मात खा गए। उसकी भरपाई वे जम्मूकश्मीर में शेख अब्दुल्ला को अपने कंधों पर उठाए रखकर कर रहे थे।

जम्मूकश्मीर को भारत में मिलाने का श्रेय हरि सिंह को है। लेकिन नेहरू इसका श्रेय शेख अब्दुल्ला को देने पर अमादा थे। यह उनकी जिद्द थी।

जम्मूकश्मीर देश की पहली ऐसी रियासत थी जिसमें मुसलमान बहुसंख्यक था। उसका शासक हिन्दू था। इसलिए नेहरू शेख अब्दुल्ला को भारत में विलय का श्रेय देना चाहते थे कि वे दुनिया को बता सकें कि यह उदाहरण द्विराष्ट्रवाद का खंडन करता है।

इसी कारण शेख अब्दुल्ला की हर बात नेहरू ने मानी। हरि सिंह ने  वही किया जो सरदार पटेल चाहते थे। लेकिन जम्मूकश्मीर को दूसरी रियासतों जैसा नहीं बनाया जा सका तो इसके लिए दोषी नेहरू हैं। क्योंकि उन्होंने शेख अब्दुल्ला के कहने पर धारा 370 और धारा 35 जैसे पहाड़ बीच में खड़े किए।

हरि सिंह के बेटे डा. कर्ण सिंह ने भी इसमें भूमिका निभाई। जिसे बहुत विस्तार से इस पुस्तक में पढ़ा जा सकता है। खोजकर और खरीद कर इसे पढ़ना चाहिए।

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विश्वसनीयता और प्रामाणिकता राय की पत्रकारिता की जान है। हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषीय न्यूज एजेंसी से उन्होंने पत्रकारिता में कदम रखा था। वे जनसत्ता के चुने हुए शुरुआती सदस्यों में एक रहे हैं। राय ‘जनसत्ता’ के ‘संपादक, समाचार सेवा’ के रूप में संबद्ध रहे। चार वर्षों तक पाक्षिक पत्रिका ‘प्रथम प्रवक्ता’ का संपादन किया। फिलहाल ‘यथावत’ के संपादक हैं।

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