संविधान के साथ धोखाधड़ी

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चमुच बहस इसे कहते हैं जो अब छिड़ी है।बहसअरबी शब्द है। हिन्दी में खप गया है। लेकिन इसका मतलब अपनेअपने माफिक लोग लगा लेते हैं।

संविधान की किसी धारा पर बहस सुप्रीम कोर्ट में नहीं होगी तो कहां होगी। सुलझे और अनुभवी नेता माने जाते हैंडॉ. फारुख अब्दुल्ला। वे धमकी दे रहे हैं कि धारा 35 से छेड़छाड़ हुई तो विद्रोह हो जाएगा।

संविधान के किसी भी प्रकांड पंडित से पूछिए कि इस प्रावधान का मतलब क्या है? वह थोड़ी देर तो विस्मित नजरों से आपको देखेगा। कारण यह कि संविधान में 35 के प्रावधान से वह सर्वथा अपरिचित होगा। ऐसा ही अनुभव मेरा है।

कई साल पहले इस प्रावधान के बारे में लोकसभा के प्रधान महासचिव पद से रिटायर व्यक्ति से जब पूछा तो वे हक्केबक्के रह गए। संविधान की प्रति सामने रखकर फिर उस प्रावधान को हमने समझने का प्रयास किया। अंत में वे बोले कि यह तो संविधान के साथ धोखाधड़ी है। यहां उनका नाम सोच समझकर नहीं दे रहा हूं।

ऐसा उन्होंने क्यों कहा? इसे समझ लेने पर कोई भी मानेगा कि इस बहस का मतलब है। बहस की जरूरत इसलिए है, क्योंकि संविधान में धारा 35 का उल्लेख नहीं है। उसे खोजना पड़ता है। सिर्फ धारा 35 का उल्लेख है।

फिर सवाल उठता है कि 35 कहां है? इसे संविधान के परिशिष्ट में पा सकते हैं। उसे आदेश, 1954 के शीर्षक में दिया गया है। कानून और संविधान का कोई पंडित भी बहुत आसानी से 35 को उसमें खोज नहीं सकता। बहुत माथापच्ची करनी होगी।

तब यह सवाल उठता है कि इसे किन परिस्थितियों में चुपके से संविधान में जोड़ने के लिए परिशिष्ट का हिस्सा बनाया गया? खंडन के किसी खतरे के बगैर दो बात कहीं जा सकती है।

पहली यह कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसे राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद से लागू करवाया। यह प्रशासनिक आदेश है। दूसरी बात ज्यादा गंभीर है और इसी अर्थ में संविधान के साथ धोखाधड़ी है कि संसद को तब अंधेरे में रखा गया। इसलिए लोग इस बारे में कुछ नहीं जानते।

इस धारा के कारण जम्मूकश्मीर में मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है। वे लोग नागरिक अधिकार से वंचित हैं, जिन्हें बहुत पहले मिल जाना चाहिए। पाकिस्तान से आए हजारों परिवार वहां 70 साल से रह रहे हैं। पर वे वहां के नागरिक नहीं हैं।

धारा 35 राज्य सरकार को अधिकार देती है कि वह नागरिकता के बारे
में निर्णय अपने विवेक से करे। इस तरह देश में दोहरी नागरिकता
औरनागरिकता में भेदभाव चल रहा है।

ऐसा अन्याय इसलिए संभव है, क्योंकि धारा 35 राज्य सरकार को अधिकार देती है कि वह नागरिकता के बारे में निर्णय अपने विवेक से करे। इस तरह देश में दोहरी नागरिकता और नागरिकता में भेदभाव चल रहा है। इसे ही पक्का करने के लिए यह प्रावधान जोड़ा गया।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने बलिदान दिया। वे एक विधान के लिए कुर्बान हुए। उसके बाद ही 14 मई, 1954 को पंडित नेहरू ने यह प्रावधान करवाया।

सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर हुई है। जिसे सुनने योग्य मान लिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे बहसतलब माना है। सही मंच वही है। पिछले महीने 17 जुलाई को एटार्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल ने चीफ जस्टिस जे.एस. खेहर और डी. वाई. चंद्रचूड़ की पीठ से कहा कि याचिका ने एक अत्यंत संवेदनशील विषय उठाया है। इस परबड़ी बहसकी जरूरत है।

उसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट के तीन सदस्यीय पीठ को सौंप दिया गया है। यह हुई इसकी भूमिका। बहस तो अब होगी।

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विश्वसनीयता और प्रामाणिकता राय की पत्रकारिता की जान है। हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषीय न्यूज एजेंसी से उन्होंने पत्रकारिता में कदम रखा था। वे जनसत्ता के चुने हुए शुरुआती सदस्यों में एक रहे हैं। राय ‘जनसत्ता’ के ‘संपादक, समाचार सेवा’ के रूप में संबद्ध रहे। चार वर्षों तक पाक्षिक पत्रिका ‘प्रथम प्रवक्ता’ का संपादन किया। फिलहाल ‘यथावत’ के संपादक हैं।

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