संजय भंसाली की लीला

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म अपने सामाजिक आदर्शों को किस तरह नष्ट करने में लगे हैं, इसका ताजा उदाहरण पद्मावती विवाद है। संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावती चित्तौड़ की रानी पद्मिनी  के जीवन पर आधारित है।

तुर्क अलाउद्दीन खिलजी के 1303 ईस्वी में चित्तौड़ पर आक्रमण के समय रानी पद्मिनी ने अपने स्वत्व की रक्षा के लिए राजमहल की अन्य राजपूत स्त्रियों के साथ जौहरपूर्वक अग्नि में कूदकर प्राण त्याग दिए थे।

अपनी इस वीरता के कारण रानी पद्मिनी हमारी सामाजिक स्मृति में देवी का स्वरूप पाए हुए हैं। देश के करोड़ों लोगों की स्मृति में वे अपने शील, कुल गौरव और वीरता के लिए अमर हो गई हैं। इनमें से अधिकांश लोग उस घटना के अन्य पात्रों को जानते भी नहीं होंगे।

उनके लिए इतिहास का महत्व नहीं है। जौहरपूर्वक दिखाई गई वीरता का महत्व है। इसलिए रानी पद्मिनी उनकी स्मृति में ऐसी आदर्श नायिका हैं, जिनका स्मरण हमें पवित्र करता है। समाज को अपने सत्व की रक्षा के लिए सावधान किए रहता है।

हमारे चित्त में स्थिरता पैदा करता है। ऐसे ही आदर्शों से हमारे समाज का नैतिक अनुशासन बन रहा है। इन आदर्शों को नष्ट कर हम अपने समाज को पश्चिम के पतनकारी प्रभावों से नहीं बचा सकेंगे। सामाजिक शील से ही हम लोगों का व्यवहार अनुशासित रख सकते हैं। उसे कानून या पुलिस के बल पर अनुशासित नहीं रखा जा सकता।

रानी पद्मिनी  पर पहले भी फिल्म बन चुकी है। लेकिन उस समय उस पर कोई विवाद नहीं उठा क्योंकि उस समय के फिल्म जगत को लेकर लोगों के मन में इतनी आशंकाएं नहीं थीं।आज आशंकाएं हैं और संजय लीला भंसाली की पिछली फिल्म बाजीराव मस्तानी इसका उदाहरण है।

लगभग 1300 ईस्वी से लेकर 1947 तक का काल भारत के लोगों के लिए एक तरह का विपत्तिकाल था। इसमें देश का बड़ा हिस्सा ऐसी विदेशी शक्तियों के अधीन चला गया था, जिन्होंने युद्ध, शासन और मानवता की सभी सीमाएं तोड़ दी थी। इस विपत्तिकाल की ग्लानि से हम अभी तक मुक्त नहीं हो पाए हैं।

इस विपत्तिकाल में हमारे जो पराक्रमी नायक अपने समाज की कुछ हद तक रक्षा कर पाए, उनकी स्मृति हमें इस ग्लानि से उबरने में सहायता देती है। ऐसे ही पराक्रमी नायकों में बाजीराव प्रथम की गिनती होती है। लेकिन संजय लीला भंसाली के लिए मराठा इतिहास के इस अप्रतिम नायक बाजीराव का महत्व केवल यह है कि वह मस्तानी नाम की एक नर्तकी पर आसक्त था।

‘रानी पद्मिनी पर पहले भी फिल्म बन चुकी है। लेकिन उस समय उस पर कोई विवाद नहीं उठा क्योंकि उस समय के फिल्म जगत को लेकर लोगों के मन में इतनी आशंकाएं
नहीं थीं।आज आशंकाएं हैं और संजय लीला भंसाली की पिछली फिल्म
बाजीराव मस्तानी इसका उदाहरण है।’

यह स्वाभाविक ही था कि बाजीराव के इस चित्रण पर लोगों की आपत्ति होती। लेकिन जो विवाद हुआ, उसने भंसाली की फिल्म बाजीराव मस्तानी के बारे में कौतूहल ही बढ़ाया। फिल्म के दर्शक बढ़े, आमदनी बढ़ी और भंसाली का हौसला भी।

बाजीराव मस्तानी के निर्माण के समय ही संजय लीला भंसाली ने रानी पद्मिनी  पर फिल्म बनाने का निर्णय लिया था। इसलिए यह आशंका पैदा होना स्वाभाविक था कि उनकी फिल्म में रानी पद्मिनी का चरित्र चित्रण ठीक से नहीं किया जाएगा।

जनवरी में जब इस फिल्म की जयपुर में शूटिंग हो रही थी तो यह अफवाह उड़ी कि भंसाली रानी पद्मिनी और अलाउद्दीन खिलजी के अंतरंग दृश्य फिल्मा रहे हैं। इससे उत्तेजित लोगों ने शूटिंग में बाधा पहुंचाई, मारपीट की और भंसाली को शूटिंग स्थगित करके जयपुर छोड़ना पड़ा। तब से इस फिल्म पर विवाद गहराता गया है।

विवाद के केंद्र में यह मान्यता है कि फिल्म में एक स्वप्न का दृश्य है, जिसमें रानी पद्मिनी  और अलाउद्दीन खिलजी को साथ दिखाया गया है। संजय लीला भंसाली ने कई बार यह घोषित किया है कि उनकी फिल्म में ऐसा कोई दृश्य नहीं है।

लेकिन जिस तरह उन्होंने ऐसे किसी दृश्य के होने का खंडन किया है, उससे यही लगता है कि मूल फिल्म में ऐसा कुछ था, जिसे विवाद उठने पर हटा दिया गया। इसका अर्थ यह है कि फिल्म की कहानी रानी पद्मिनी की वीरता और अलाउद्दीन खिलजी की क्रूरता पर केंद्रित नहीं है। उसे किसी तरह की प्रेम कहानी दिखाने का प्रयत्न किया गया है। इस आशंका ने ही पूरे देश में ऐसा आक्रोश पैदा किया है, जैसा अब तक किसी और फिल्म को लेकर कभी पैदा नहीं हुआ था।

अब तक छह बड़े राज्यों के मुख्यमंत्री घोषित कर चुके हैं कि उनके यहां फिल्म प्रदर्शित की गई तो काफी अव्यवस्था हो सकती है। मध्य प्रदेश और गुजरात के मुख्यमंत्री अपने राज्य में फिल्म प्रदर्शित करने पर रोक लगा चुके हैं।

राजस्थान और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री केंद्र सरकार को लिखकर बता चुके हैं कि फिल्म प्रदर्शित होने दी गई तो उनके राज्य में उपद्रव भड़क सकते हैं। पंजाब के कांग्रेसी मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा है कि ऐसी फिल्म ठीक नहीं है जो लोगों की भावनाओं को आहत करे।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने संजय लीला भंसाली पर व्यंग्य करते हुए कहा है कि अगर उन्हें प्रेम कहानी ही बनानी है तो अलाउद्दीन खिलजी की बेटी फिरोजा पर बनाएं जो राजकुमार वीरमदेव की दीवानी थी या फिर औरंगजेब की पोती साफिया पर बनाएं जो राजकुमार अजित सिंह की प्रेम दीवानी थी।

अगर उन्हें इसके लिए पैसे चाहिए तो वे देंगे और जीएसटी समेत देंगे। महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश और हरियाणा से भी अनेक मंत्रियों और नेताओं ने फिल्म प्रदर्शित होने पर गंभीर परिणामों की चेतावनी दी है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर दो राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने पद्मावती के विरोध को अनुचित बताया है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने फिल्म प्रर्दिशत करने में डाली जा रही बाधाओं की निंदा की है।

गुजरात चुनाव को देखते हुए फिल्म का एक दिसंबर को रिलीज होना स्थगित करवा दिया गया है। सेंसर बोर्ड ने निर्माताओं के आवेदन में एक तकनीकी खामी निकाल ली कि आवेदन में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि फिल्म ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित है या उसका कथानक काल्पनिक है। लेकिन फिल्म के निर्माता और निर्देशक आश्वस्त हैं कि अंतत: फिल्म प्रर्दिशत होगी और लोग देखेंगे कि उसमें आपत्तिजनक कुछ नहीं है।

अब तक सिर्फ फिल्म का ट्रेलर सामने आया है, जिसमें रानी पद्मिनी  को राजनर्तकियों की तरह नाचते हुए दिखाया गया है। इस पर राज परिवारों की ओर से तीखी आपत्ति की गई है। उन्होंने कहा है कि भारत में कभी रानियां इस तरह नृत्य नहीं करती थीं।

अंग्रेजी शिक्षा ने भारत के राजा-महाराजाओं के बारे में जो अज्ञान पैदा कर रखा है, उसके कारण इस तरह की आपत्तियां गंभीरता से ली जाएंगी, इसमें संदेह है। इसी तरह अंगे्रजों ने भारतीय इतिहास को लिखने और समझने का जो स्वरूप बना दिया है, उसके कारण अधिक लोगों को यह समझ में नहीं आएगा कि चित्तौड़ के राणा रतन सिंह को और अलाउद्दीन खिलजी को एक ही तरह से नहीं देखा जा सकता। उन्हें केवल दो विरोधी युद्धरत राजाओं के रूप में नहीं दिखाया जा सकता।

राजा रतन सिंह राजमर्यादाओं से बंधे हुए एक भारतीय राजा थे और अलाउद्दीन खिलजी एक बर्बर आक्रमणकारी था, जिसके लिए किसी मर्यादा का कोई अर्थ नहीं था।

इस फिल्म को लेकर एक विवाद वामपंथी इतिहासकारों ने भी उठाया है। उनकी ओर से हरिवंस मुखिया और इरफान हबीब ने दलील दी है कि रानी पद्मिनी कोई ऐतिहासिक पात्र है ही नहीं।

उनके बारे में पहला उल्लेख मलिक मुहम्मद जायसी लिखित ‘पद्मावत’ में आया है, जिसकी कहानी काल्पनिक है। पद्मावत अलाउद्दीन खिलजी की 1303 में हुई चित्तौड़ विजय के 237 वर्ष बाद 1540 में लिखी गई थी। उसके बाद 1589 में हेम रतन ने गोरा बादल पद्मिनी चौपाई लिखी।

उसके बाद 19वीं शताब्दी में कर्नल टाड और कुछ बंगाली लेखकों के वर्णन आए। इन वर्णनों में काफी असमानता है। लेकिन यह सब बहस काफी पहले हो चुकी है। इतिहासकार आशीर्वादीलाल श्रीवास्तव और गोपीनाथ शर्मा आदि ने स्पष्ट किया है कि पद्मावत की कहानी के काल्पनिक होने या बाद के साहित्य की विसंगतियों के बावजूद रानी पद्मिनी  और उनके जौहर की सत्यता से इनकार नहीं किया जा सकता।

भारतीय इतिहास लेखन की यह विडंबना रही है कि उसका अधिकांश राजाओं और उनसे जुड़ी घटनाओं के खंडन-मंडन में ही उलझा दिया गया है। इन इतिहासकारों के लिए केवल विजय ही महत्वपूर्ण रही है।

उसमें भी विदेशी आक्रांताओं की विजय बढ़ा-चढ़ाकर वर्णित की गई है और भारतीय राजाओं के पराक्रम की जैसी उपेक्षा हुई है, उसे अपराध की श्रेणी में ही रखा जा सकता है।

यह साधारण अपराध नहीं है कि हम चित्तौड़ के राजवंश को तथा तुर्क और मुगल आक्रांताओं को एक तराजू पर तौले। आठवीं शताब्दी से चित्तौड़ पर गुहिल वंश के शासकों का राज रहा है।

यह राजवंश बप्पा रावल से आरंभ हुआ था, जो भारतीय इतिहास के सबसे तेजस्वी नायकों में से एक रहे हैं। उन्होंने 734 से 753 ईस्वी तक 19 वर्ष शासन किया था और फिर उसे स्वेच्छा से अपने उत्तराधिकारी को सौंपकर संन्यास्त हो गए थे।

उन्होंने अरब आक्रांताओं को अफगानिस्तान के पार तक खदेड़ दिया था। वे जितने पराक्रमी थे, उतने ही प्रजा वत्सल भी थे। बारहवीं शताब्दी में इस राजवंश की दो शाखाएं हो गईं। पहली शाखा रावल के अंतिम राजा रतन सिंह थे। 1303 में चित्तौड़ की पराजय अवश्य हुई, लेकिन कुछ ही वर्षों में दूसरी शाखा सिसौदिया के राजपूतों ने चित्तौड़ को तुगलक वंश से छीन लिया।

सिसौदिया राजवंश में महाराणा संग्राम सिंह और महाराणा प्रताप जैसे पराक्रमी राजा हुए, जिनकी कीर्ति हमारी स्मृति में सदा बना रही है। अकबर को महाराणा प्रताप से चित्तौड़ छीनने में सफलता मिल गई थी, लेकिन वह मेवाड़ उनसे नहीं ले पाया। बाद में यह वंश उदयपुर चला गया और इस वंश ने कभी अपने गौरव को क्षीण नहीं होने दिया। भारतीय इतिहास में इस राजवंश को अलग से स्थान दिया जाना चाहिए था।

राजा रतन सिंह की तुलना में अलाउद्दीन खिलजी एक लुटेरा, क्रूर और विश्वासघाती शासक था। खिलजी वंश का दिल्ली पर 1290 से 1320 तक 30 वर्ष शासन रहा। खिलजी वंश के शासकों की गिनती भारतीय मुस्लिम शासकों के सबसे क्रूर और अन्यायी शासकों में की जाती है।

खिलजी वंश ने मुस्लिम शासन को देश के बड़े हिस्से में फैलाने में सफलता प्राप्त की थी। यह वह समय था जब मध्य एशिया, अरब, ईरान और अफगानिस्तान से लूटपाट की आकांक्षा लेकर आंधी की तरह योद्धाओं के दल आ रहे थे।

उन्होंने बर्बर तरीकों से लूटपाट के द्वारा साधन इकट्ठे किए और एक बड़ी सेना खड़ी कर ली। इसी भीड़ में खिलजी वंश भी भारत आया था। शुरू में वे गुलाम वंश के शासकों के अधीन थे। जब गुलाम वंश के भीतर सत्ता की मारकाट मची तो जलालुद्दीन खिलजी को दिल्ली की सत्ता हथियाने का मौका मिल गया।

जलालुद्दीन धोखे और विश्वासघात से 70 वर्ष की आयु में गद्दी पर बैठा था। उसने अपने भतीजे अलाउद्दीन को अपनी बेटी देकर दामाद बना लिया था। अलाउद्दीन खिलजी जलालुद्दीन खिलजी की ओर से युद्ध करते हुए उसके शासन का विस्तार करता रहा।

1296 में उसे देवगिरी के किले पर नियंत्रण करने में सफलता मिली और उसकी लूट के दौरान काफी धन उसके हाथ लगा। इस धन का उपयोग उसने सेनानायकों को अपने साथ मिलाने के लिए किया और जलालुद्दीन खिलजी की हत्या करके वह दिल्ली की गद्दी पर बैठ गया।

अलाउद्दीन खिलजी ने 20 वर्ष शासन किया। इस पूरी अवधि में निरंतर यह आशंका सताती रही कि कोई उसे षड्यंत्र करके सत्ता हथिया सकता है। इस आशंका में उसने अपने अनेक भाई-भतीजों को मरवा दिया।

‘राजा रतन सिंह राजमर्यादाओं से बंधे एक भारतीय राजा थे और अलाउद्दीन खिलजी एक बर्बर आक्रमणकारी था। उसके लिए किसी मर्यादा का कोई अर्थ नहीं था।’

इसी तरह के शक में उसने अपनी सेना के 30 हजार मंगोल सिपाहियों की हत्या करवा दी थी। अपने शासन के अंतिम दिनों में वह बीमार हुआ। अपने आसपास के लोगों पर शक के कारण उसने अपने एक विश्वस्त सेनानायक मलिक कफूर को बुलाया, जो उन दिनों देवगिरी में तैनात था।

मलिक कफूर ने अलाउद्दीन खिलजी का कान भरकर उसके दो बड़े बेटों को अंधा करवा दिया और उसके दूसरे ससुर अल्प खां की हत्या करवा दी। इन सब पर अलाउद्दीन के खिलाफ षड्यंत्र करने का आरोप लगाया गया था। कहते हैं कि मलिक कफूर ने ही अंत में अलाउद्दीन खिलजी की हत्या की और उसे बीमारी से मरा घोषित करके पहले से तैयार मकबरे में दफना दिया।

कफूर ने उसके छोटे अल्पसंख्यक बेटे को गद्दी पर बैठाया ताकि उसके नाम पर स्वयं शासन कर सके। लेकिन कुछ ही महीनों में अलाउद्दीन खिलजी के अंगरंक्षक रहे सैनिकों ने मलिक कफूर की हत्या कर दी। खिलजी के तीसरे बेटे शिहाबुद्दीन ने अपने छोटे भाई की हत्या करके गद्दी छीन ली।

इस तरह कोई चार वर्ष खिलजी वंश का शासन और चला। अलाउद्दीन खिलजी ने अपने सैनिक अधिकारियों को आदेश दिए थे कि सभी संपन्न हिंदुओं की संपत्ति जब्त कर ली जाए और उन्हें इतना शारीरिक कष्ट दिया जाए कि वे मुस्लिम शासकों का विरोध करने लायक न बचें।

उसने स्थानीय अधिकार समाप्त करके सारा राजस्व सीधे वसूलना शुरू किया। हमारे इतिहासकारों ने इसे आर्थिक सुधार की संज्ञा दी है। इतिहास लिखने का इससे भद्दा तरीका और क्या हो सकता है?

अगर इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास की यह दुर्गति की है तो संजय लीला भंसाली से क्या अपेक्षा की जा सकती है। लेकिन अधिक लोग इतिहास नहीं पढ़ते, फिल्म देखते हैं। इसलिए भंसाली का अपराध बड़ा है। पर भंसाली का यह विश्वास सही है कि अंतत: उनकी फिल्म दिखाई जाएगी।

देश की अदालतें भंसाली के साथ खड़ी होंगी और हमारे राजनैतिक तंत्र में न इतनी समझ है न इच्छा कि वह देश के गौरव से खिलवाड़ न होने दे। हमारा सिनेमा दिनोंदिन फूहड़ता और अश्लीलता की सीमाएं लांघ रहा है।

लेकिन हमारे सिनेमा के अभिनेताओं का कद बढ़ता जा रहा है। उन्हें संसद में नामित करते हुए किसी राजनैतिक दल को हिचक नहीं होती। जब कला परिष्कार की जगह अपसंस्कृति का माध्यम बन जाए तो अपराध किसी एक व्यक्ति का नहीं रह जाता।

लेकिन शायद भारतीय समाज की कोई आंतरिक शक्ति है, जो उसे काल के विपरीत प्रभावों से बचा लेती है। इसलिए वह बचा रहेगा, सभी क्षेत्रों के भंसालियों के बावजूद। रानी पद्मिनी पर पहले भी फिल्म बन चुकी है।

लेकिन उस समय उस पर कोई विवाद नहीं उठा क्योंकि उस समय के फिल्म जगत को लेकर लोगों के मन में इतनी आशंकाएं नहीं थीं। आज  आशंकाएं हैं और संजय लीला भंसाली की पिछली फिल्म बाजीराव मस्तानी इसका उदाहरण है।

अलाउद्दीन खिलजी ने अपने सैनिक अधिकारियों को आदेश दिए थे कि सभी संपन्न हिंदुओं की संपत्ति जब्त कर ली जाए और उन्हें इतना शारीरिक कष्ट दिया जाए कि वे मुस्लिम शासकों का विरोध करने लायक न बचें।

उसने स्थानीय अधिकार समाप्त करके सारा राजस्व सीधे वसूलना शुरू किया। हमारे इतिहासकारों ने इसे आर्थिक सुधार की संज्ञा दी है। इतिहास लिखने का इससे भद्दा तरीका और क्या हो सकता है?

अधिक लोग इतिहास नहीं पढ़ते हैं, फिल्म देखते हैं, इसलिए भंसाली का अपराध बड़ा है। पर उनका यह विश्वास सही है कि अंतत: फिल्म अवश्य दिखाई जाएगी। अदालतें  भंसाली के साथ खड़ी होंगी। हमारे राजनैतिक तंत्र में न इतनी समझ है, न इतनी इच्छा कि वह देश के गौरव के साथ खिलवाड़ न होने दे।

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