व्यर्थ की बाजीगरी

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जिन लोगों ने आम आदमी पार्टी से बहुत उम्मीदें की थी, वे निराश हो चुके हैं। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का विकल्प बनने का सपना देखने वाली पार्टी और उसका नेतृत्व राष्ट्रीय राजधानी की शहर सरकार भी विधिवत नहीं चला पा रहा है।

यह किसी से छिपा हुआ नहीं है। दिन के उजाले की तरह बहुत साफ है। नेतृत्व और उसके विधायक ‘गली के गुंडे’ की तरह व्यवहार कर रहे हैं। इसके दो परिणाम सामने आए हैं। पहला कि अरविंद केजरीवाल के वकील ही उनका साथ छोड़ रहे हैं।

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने मानहानि का जो आपराधिक मुकदमा कर रखा है, उसमें दूसरे वकील ने भी इसलिए साथ छोड़ दिया क्योंकि वह झूठी दलील देने के लिए तैयार नहीं हैं।

दूसरी घटना तो एक गंभीर चेतावनी है। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के सलाहकार ने जो बयान दिया है वह प्रमाण है कि एक साजिश रची गई। मुख्यमंत्री निवास में आधी रात को मुख्य सचिव को बुलाया कि उन पर हमला किया जा सके।

साजिश का पहला आधार आधी रात को बुलाना है। दूसरा आधार है कि मुख्य सचिव को उन दो विधायकों के बीच में बैठने की जगह तय की गई जिन्हें हमला करने का जिम्मा दिया गया था। इस घटना से पूरी राजधानी सदमे में है।

वे लोग पछता रहे हैं, जिन्होंने उन्हें चुना था। इसका दूसरा पक्ष भी है कि अपने मतदाताओं को भ्रमित  रखने के लिए आम आदमी पार्टी का नेतृत्व सरकार गिराने की साजिश की कहानी गढ़ रहा है।

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के सलाहकार ने जो
बयान दियाहै वह प्रमाण है कि एक साजिश रची गई।

उसका यह खोटा सिक्का अब नहीं चल पाएगा। कारण कि दिल्ली और देश के ईमानदार अफसर मीडिया और सोशल मीडिया से ही अरविंद केजरीवाल के झूठ का पर्दाफास कर रहे हैं।

अपनी ओछी राजनीति पर आम आदमी पार्टी के नेताओं को जहां अफसोस जताना चाहिए और लोगों से माफी मांगनी चाहिए, वहां वे उल्टे बेसिर पैर के आरोप लगा रहे हैं।

संसदीय लोकतंत्र का यह अक्षम्य उपहास है। राजनीति का गहरा मजाक भी यह है। साफ सुथरे शासन के वायदे से जो सत्ता में पहुंचे, वे न केवल गंदगी फैला रहे हैं बल्कि उसका बचाव भी करने की हिमाकत कर रहे हैं।

वे यह भूल जा रहे हैं कि जनता उनसे जवाब मांगेगी। झूठे विज्ञापन छपवाकर अपने खोखलेपन को आम आदमी पार्टी की सरकार कब तक ढकेगी?

एक अफसर ने यह राज खोला है कि मुख्य सचिव पर कातिलाना हमला इसलिए करवाया गया, क्योंकि झूठे विज्ञापन की वे अनुमति नहीं दे रहे थे। अरविंद केजरीवाल और उनकी चौकड़ी के चेहरे से नकाब तेजी से उतर रहा है।

सवाल यह नहीं है कि एक निर्वाचित सरकार खतरे में है। सवाल दूसरा है कि क्या निर्वाचित नेतृत्व को अलोकतांत्रिक आचरण या यूं कहें कि मनमानी करने की छूट कब तक दी जाती रहेगी! खोटा सिक्का कब तक खरे को शासन से बेदखल कर लोगों को ठगता रहेगा?

दिल्ली में अनहोनी हो रही है। जिसे सुशासन का कारगर जरिया बना सकते थे उसे ही जान से मारने का प्रयास किया गया। मुख्यमंत्री निवास षड्यंत्र का अड्डा हो गया है। मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री उसमें न केवल शामिल हैं, बल्कि वे हिस्सेदार भी हैं।

न होते तो उन विधायकों को रोकते। मुख्यमंत्री के सलाहकार ने साफ-साफ बता दिया है कि उन लोगों ने रोका नहीं। यह तो नहीं कहा कि उकसाया। लेकिन इतना साफ है कि जो कुछ हुआ, वह पहले से तय था। इसे ही साजिश कहते हैं।

विधायक को कर्मचारी पीट रहे हैं। ऐसा दृश्य कहीं कभी देखा नहीं
गया। सुना भी नहीं गया। जो भी राजनीतिक नेतृत्व अफसरशाही से
टकराता है, वह अपने आप को शासन करने के अयोग्य घोषित करता है।

मुख्य सचिव ने अपना धर्म निभाया है। वे रात को 12 बजे पहुंचे। न चाहते तो उन्हें मजबूर नहीं किया जा सकता था। उनके इस आचरण का ही प्रभाव है कि पूरे देश के अफसर एक जुट हो गए हैं। उनके समर्थन में प्रस्ताव पारित हुए हैं। दिल्ली के अफसरों ने सत्याग्रह का व्रत ले लिया है। पूरे देश के सरकारी कर्मचारी विरोध में एक स्वर से बोलने लगे हैं।

विधायक को कर्मचारी पीट रहे हैं। ऐसा दृश्य कहीं कभी देखा नहीं गया। सुना भी नहीं गया। जो भी राजनीतिक नेतृत्व अफसरशाही से टकराता है, वह अपने आप को शासन करने के अयोग्य घोषित करता है।

यही अरविंद केजरीवाल कर रहे हैं। दिल्ली के पहले मुख्यमंत्री चौधरी ब्रह्मप्रकाश ने तब ऐसा कुछ भी नहीं किया था कि उन्हें बर्खास्त किया जाए। लेकिन जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें हटाया और विधान सभा भी हमेशा के लिए भंग कर दी।

लंबी लड़ाई लड़कर मदनलाल खुराना ने 1993 में विधान सभा दिल्ली को लौटाया। अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी उस राजनीतिक उपलब्धि पर पानी फेर रहे हैं। क्या वे सफल होंगे? नहीं। बाजीगरी अब काम नहीं आएगी।

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विश्वसनीयता और प्रामाणिकता राय की पत्रकारिता की जान है। हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषीय न्यूज एजेंसी से उन्होंने पत्रकारिता में कदम रखा था। वे जनसत्ता के चुने हुए शुरुआती सदस्यों में एक रहे हैं। राय ‘जनसत्ता’ के ‘संपादक, समाचार सेवा’ के रूप में संबद्ध रहे। चार वर्षों तक पाक्षिक पत्रिका ‘प्रथम प्रवक्ता’ का संपादन किया। फिलहाल ‘यथावत’ के संपादक हैं।

49 टिप्पणी

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