वृहत्तर भारत का नया स्वरूप

0
135

सिंगापुर के दूरदर्शी राजनेता ली कुआन यू ने दक्षिण पूर्व एशिया के देशों का भविष्य एशिया की दो महाशक्तियों भारत और चीन ले साथ जुड़ा बताया था।

उन्होंने एशिया को एक ऐसा विमान बताया था जिसके दो डैने भारत और चीन हैं। लेकिन आज यह विमान अंतरराष्ट्रीय क्षितिज में सुगम यात्रा के जरिये विकास के गंतव्य तक पहुंचाने की बजाय विश्व की रणनीतिक आंधी में फंस कर अनिश्चितता के गगन में  बस चक्कर काट रहा है।

ये आशंकाएं भी सर उठा रही हैं कि क्या यह महाद्वीप 21 वीं सदी में विश्व का सिरमौर बनने की बजाय एक नया रणक्षेत्र बन जाएगा जिसमें भारत और चीन विकास रूपी विमान  के डैने की भूमिका निभाने के स्थान पर एक दूसरे के खिलाफ मिसाइल बन जाएंगे।

भारत एशिया की कहानी को दुखांत नहीं बनने देने के लिए कृतसंकल्प है। एशिया की कहानी को सुखान्त ही बने रहने देने के लिए भारत ने प्रधानमन्त्री पीवी नरसिंहराव के कार्यकाल में वर्ष 1992 में ही ‘लुक ईस्ट’ (पूर्व  की ओर देखो) की नीति अपनाई थी।

इस नीति को व्यापकता और गहराई देते हुए प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने ‘एक्ट ईस्ट’ (पूर्व  में सक्रिय बनने ) की घोषणा की। 25 वर्ष पहले ही भारत ने दक्षिण पूर्व एशिया के देशों के संगठन आसियान के साथ वार्ता साझेदारी की घोषणा की थी जिसके अन्तर्गत नियमित वार्ता और संपर्क कायम किया गया था।

इस साझेदारी की रजत जयंती को भारत समारोहपूर्वक मनाने का फैसला किया है। आसियान के 10 देशों के राज्याध्यक्ष या शासनाध्यक्ष इस रजत जयंती समारोह में भाग लेने के लिए दिल्ली आ रहे हैं। भारत-आसियान शिखर वार्ता 25 जनवरी को होगी।

उसके पहले अधिकारियों और मंत्रियों के  बीच वार्ताओं के दौर होंगे। शिखर वार्ता के अगले दिन भारत का गणतंत्र दिवस है। राजपथ पर होने वाली भव्य परेड में आसियान के दसों नेता मुख्य अतिथि होंगे। यह अपने आप में एक इतिहास है।

“आसियान और भारत के बीच 2009 में मुक्त व्यापार समझौता हुआ था। भारत चौथा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और द्विपक्षीय व्यापार 71 अरब डॉलर है।”

आम तौर पर परेड का मुख्य अतिथि कोई एक ही विदेशी मेहमान होता है लेकिन इस बार प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी अपनी प्रयोगधर्मी विदेशनीति के तहत कुछ अनोखा ही करने वाले हैं।

नई दिल्ली आने वाले नेता होंगे- म्यांमार की स्टेट काउंसलर (प्रधानमंत्री) आंग सान सू ची, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति जोको विदोदो , मलेशिया के प्रधानमन्त्री नजीब रज़ाक, ब्रुनेई के प्रधानमन्त्री सुल्तान हसनल बोल्काह, फिलीपींस के राष्ट्रपति रोड्रिगो डुटेरेट, लाओस के प्रधानमन्त्री थोंग्लौं सिसौलिथ, विएतनाम के राष्ट्रपति ट्रान दाई कुआंग, थाईलैंड के प्रधानमन्त्री प्रयुथ चान-ओचा, सिंगापुर के प्रधानमन्त्री ली सीन लूंग और कम्बोडिया के प्रधानमन्त्री हुन सेन।

हो सकता है कि इनमें से एकाध नेता स्वयं नहीं आ पाएं लेकिन वे यह अवश्य सुनिश्चित करेंगे कि उनके देश का प्रतिनिधित्व कोई शीर्षस्थ नेता ही करे।

परेड के अंत में निकलने वाली झांकियां भी कुछ अलग ही सन्देश देंगीं। पश्चिमी देशों के मेहमान नेता इन झांकियों को विस्मय और कौतुहल से देखते रहे हैं।

आसियान नेताओं के लिए ऐसा नहीं होगा। झाकियों का स्वरूप और उनकी विषय वस्तु उनके लिए परिचित सी होंगी। कारण स्पष्ट है। ये सभी देश कभी वृहत्तर भारत के हिस्से थे अथवा उसके साथ जुड़े थे।

दक्षिण भारत के पल्लव और चोल राजवंशों ने इन देशों में अपना राज्य कायम किया था और उन्हें आर्थिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से समृद्ध किया था।

रामायण, महाभारत और भगवान बुद्ध के धर्म सन्देश इस देशों की प्राण शक्ति हैं। इनमें से कई देश मुस्लिम हैं लेकिन मजहबी धर्मान्धता के दौर में भी वहां भारतीय संस्कृति का प्रभाव कायम है।

सदियों पहले भारतीय राजवंशों का यह योगदान न तो युद्ध से हासिल की गई विजय था न ही उन देशों का आर्थिक शोषण करने वाला उपनिवेशवाद।

कालांतर में इस देशों को इस्लामी और पश्चिमी विस्तारवाद का सामना करना पड़ा जिसका दुष्परिणाम आज भी वहां की जनता सहन कर रही है।

शिखर सम्मलेन के ठीक पहले विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने थाईलैंड, इंडोनेशिया और सिंगापुर की यात्रा कर वहां के नेताओं के साथ एजेंडे पर विचार विमर्श किया।

शिखर सम्मलेन के साथ ही द्विपक्षीय संबंधों के विभिन्न पहलुओं पर 20 अन्य आयोजन भी किए जाएंगे, जिनमें बिहार के तीर्थस्थल राजगीर में अंतरधर्म सम्मेलन और हैदराबाद में स्टार्ट अप एवं हैकथॉन महोत्सव शामिल है।

भारत और आसियान पिछले 15 वर्षों से नियमित रूप से वार्षिक शिखर वार्ताओं का आयोजन कर रहे हैं। दोनों पक्षों के बीच वर्ष 2009 में मुक्त व्यापार समझौता हुआ था।

आसियान भारत का चौथा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और द्विपक्षीय व्यापार 71 अरब डॉलर है। पश्चिमी विश्लेषक भारत की एक्ट ईस्ट नीति को अपने तरीके से देखना और मोड़ना चाहते हैं।

उनका मत यह है कि भारत चीन का असर कम करने या उसका मुकाबला करने के लिए इस नीति पर जोर दे रहा है।

इस धारणा को उस समय और बल मिला जब अमेरिकी प्रशासन ने ‘इंडो पैसिफिक’ शब्द का प्रयोग किया जिसमें इस विस्तृत समुद्री इलाके में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच गठबंधन की बात अन्तर्निहित है।

भारत-चीन के बीच अनसुलझे सीमा विवाद और डोकलाम जैसी घटनाओं से भी विश्लेषक यह निष्कर्ष निकालते हैं कि देर सबेर एशिया के इन दो बड़े देशों में संघर्ष होगा और रणनीतिक कारणों से भारत को अमेरिका की ओर झुकना होगा।

लेकिन नरेंद्र मोदी ‘सबका साथ-सबका विकास’ की जो नीति घरेलू और विदेश मोर्चे पर अपना रहे हैं, उसमें संघर्ष की बजाय सहयोग और संपर्क पर जोर है।

यही कारण है कि डोकलाम जैसी घटना के बावजूद द्विपक्षीय संबन्ध नहीं बिगड़े। जहां तक राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने का सवाल है केवल शक्ति प्रदर्शन ही एकमात्र जरिया नहीं है।

कुशल और दूरदृष्टि वाली कूटनीति से भी राष्ट्रीय हितों का सरंक्षण और संवर्धन किया जा सकता है। भारत-आसियान शिखर सम्मलेन ऐसा ही एक प्रयास है।

“भारत कभी विस्तारवादी देश नहीं रहा। यही कारण है कि आसियान देश आज भारत को एक संतुलनकारी ताकत के रूप में देख कर, उसके साथ जुड़ना चाह्ते हैं। ये देश भारत
के साथ सहज महसूस करते हैं।”

भारत और आसियान देशों के बीच नए कूटनीतिक संबन्धों पर दुनिया भर के विशेषज्ञों की नज़र है। एशियाई राजनीति पर शोध करने वाले दो विद्वानों सिंगापुर में प्रोफेसर किशोर महबूबानी और जेफ्री स्नग ने हाल में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘आसियान मिरेकल’ में लिखा है कि भारत ने दक्षिण पूर्व एशिया की ओर बहुत देर से ध्यान दिया।

इन देशों के साथ व्यापारिक संबंधों के लिहाज से वह चीन, यूरोपीय संघ, जापान और अमेरिका आदि के बाद सातवें स्थान पर है। बावजूद इसके भारत के लिए इस क्षेत्र में बहुत संभावनाएं हैं।

इस अवसर को नरेंद्र मोदी ने पहचाना है। इन देशों के साथ भारत के संबन्ध सांस्कृतिक, आर्थिक और रणनीतिक आधार पर कायम हैं। इन तीनों पायों को सामान रूप से मजबूत होना चाहिए।

फिलहाल ऐसा संतुलन कायम करने के लिए भारत सरकार को काफी कुछ करना होगा। मोदी यह जानते हैं कि यह काम मुश्किल है लेकिन उन्हें विश्वास है कि ऐसा किया जा सकता है।

मोदी संबंधों के तीन पायों को तीन सी, कॉमर्स, कल्चर और कनेक्टिविटी (वाणिज्य,संस्कृति और संपर्क ) से भी जोड़ते हैं।

आसियान देश आजकल बहुत अनिश्चिता के दौर से गुजर रहे हैं।

उनकी परेशानी राजनीतिक या आर्थिक कारणों से नहीं बल्कि क्षेत्र में पनप रहे शक्ति संघर्ष को लेकर है। उत्तर कोरिया का शासक परमाणु जखीरे पर बैठ कर अमेरिका को धमकी दे रहा है, जवाब में अमेरिका के डोनाल्ड ट्रंप भी ऐसा ही कर  रहे हैं।

तेल और प्राकृतिक गैस संसाधनों से भरे दक्षिण चीन सागर में चीन मनमाने तरीके से अपना समुद्री क्षेत्र घोषित कर रहा है। गुजरती महाशक्ति अमेरिका और उभरती महाशक्ति चीन के बीच वर्चस्व की लड़ाई का फैसला इसी इलाके में होने के संकेत हैं।

आसियान देशों के सामने यह सवाल मुंह बाए खड़ा है कि वे अमेरिका का साथ दें या चीन का। यह देश अपनी समुद्री सीमा को चीन के कब्जे में जाने नहीं देना चाहते, दूसरी ओर वे अमेरिका जैसी बाहरी शक्ति के साथ जुड़कर चीन का विरोध भी नहीं करना चाहते।  

ऐसी स्थिति में भारत उनके लिए एक संकटमोचक के रूप में सामने आता है। भारत कभी विस्तारवादी देश नहीं रहा तथा वह किसी क्षेत्र पर अपना दबदबा भी कायम नहीं करना चाहता। फिर सांस्कृतिक निकटता के लिहाज से आसियान देशों के लिए भारत का स्थान सर्वोपरि है।

आसियान देश आज भारत को एक संतुलनकारी ताकत के रूप में देखकर जुड़ना चाहते हैं। विश्लेषकों के अनुसार भारत और आसियान देश नैर्सिगक मित्र और सहयोगी हैं।

दोनों पक्ष एशिया में एक मुक्त,सर्वसमावेशी और न्यायसंगत आर्थिक-राजनीतिक ढांचा बनाना चाहते हैं। दोनों पक्ष पूर्व एशिया शिखर सम्मलेन, आसियान क्षेत्रीय फोरम, आसियान रक्षा मंत्री बैठक, और विस्तारित आसियान नौवहन फोरम में शामिल होते हैं।

इसके अलावा दोनों पक्षों के बीच वार्ता प्रक्रिया के 30 से अधिक जरिए हैं जिनमें वार्षिक शिखर वार्ता और मंत्रिस्तरीय बैठकें शामिल हैं। भारत और आसियान के बीच संपर्क मार्गों का निर्माण बहुत महत्व का मुद्दा है।

बांग्लादेश,म्यांमार और थाईलैंड  के बीच संपर्क सुविधाओं का निर्माण और विस्तार भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के विकास की दृष्टि से बहुत उपयोगी है।

पाठक की प्रतिक्रिया

Please enter your comment!
Please enter your name here