विधायक बचाओ स्टार्ट अप

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लोकतंत्र की अनमोल मूरते हैं, विधायक। नाजुक इतने कि किसी भी पल हाथ से छूट जाएं और देखतेदेखते टूट जाएं। जादुई ऐसे कि टूटकर भी जुड़ जाएं तो कभी परिंदों की तरह फुर्र से उड़ जाएं।

सचमुच अनमोल हैं, विधायक। कीमती इतने कि बाजार में उतरने से पहले ही हाथोंहाथ बिक जाएं। भरोसेमंद इतने कि मंत्री की कुर्सी ना मिलने पर भी कई बार पार्टी में टिक जाएं।

लोकतंत्र की आत्मा का वास विधायकों में होता है, लेकिन विधायक की आत्मा कहां होती है? यह एक गूढ़ प्रश्न है, जिसका उत्तर कोई संसदीय समिति ही ढूंढ़ सकती है। आत्मा का पता लगाने के लिए समिति को कई विधायकों के बीच सर्वे करना पड़ेगा।

लेकिन विधायक एक साथ मिलेंगे कहां? संसदीय समिति जब तक किसी एक विधायक के पास पहुंचेगी, तब वह पार्टी बदल चुका होगा। समिति बैंगलोर के होटल में पहुंचेगी तो विधायक वापस गुजरात के रिजॉर्ट में चुका होगा। यही वजह है कि विधायक की आत्मा ढूंढ़ने का प्रोजेक्ट अब तक शुरू नहीं हो पाया है।

लेकिन विधायकों से जुड़ा एक काम ऐसा है, जो तत्काल शुरू हो सकता है और होना भी चाहिए। इस प्रोजेक्ट का नाम हैविधायक बचाओ स्टॉर्ट अप।

सरकार नेबेटी बचाओका नारा दिया है। लेकिन इस देश की बेटियां कभी भी सरकार के भरोसे नहीं रहीं। वे खुद को बचाने की लड़ाई अपने आप लड़ रही हैं। लेकिन विधायकों के साथ ऐसा नहीं है। विधायकों का आखेट इस तरह हो रहा है कि वे रॉयल बंगाल टाइगर की तरह विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गये हैं।

अगर पुराना वक्त होता तो विधायकों के क्रैश की जिम्मेदारी कोई सरकारी
एजेंसी संभाल लेती। लेकिन ये दौर निजीकरण का है। भारत तेजी से डेमोक्रेसी
प्राइवेट लिमिटेड बनने की दिशा में अग्रसर है। ऐसे में उचित यही होगा कि विधायक
बचाओ परियोजना का स्टार्ट अप प्रपोजल लेकर प्राइवेट कंपनियां सामने आयें।

विधायक अक्सर फुसला लिये जाते हैं। चारा फेंककर उनका शिकार कर लिया जाता है। विधायक किसी बगिया में उगी ताजा तरकारी की तरह तोड़ लिये जाते हैं। विधायक एक पार्टी से दूसरी पार्टी और एक गठबंधन से दूसरे गठबंधन को ट्रांसफर कर दिये जाते हैं।

ठीक उसी तरह जैसे मकाउ और काकातुआ जैसे दुर्लभ पक्षियों की तस्करी होती है, उसी तरह विधायकों की भी बकायदा तस्करी होती है। भला ये सब कैसे रुकेगा? क्या ऐसी व्यवस्था नहीं हो सकती कि जिन पार्टियों को अपने विधायकों के टूटनेफूटने या बिकने का डर हो, वे उन्हें किसी खास जगह पर ले जाकर जमा करा दें और चैन की बंशी बजाये।

मतलब विधायकों के लिए क्रैश जैसा कोई सिस्टम हो। शाम को जब पार्टी का चीफ व्हिप अपने विधायकों की खोजखबर लेने पहुंचे तो क्रैश का इंचार्ज उससे कहेदेख लीजिये आपका विधायक चोरी नहीं हुआ है। खापीकर मगन है, और स्विमिंग पूल में खेल रहा है। किसी ने इसे बरगलाया नहीं और ना ही पार्टी तोड़ने जैसी कोई गंदी बात सिखाई।

अगर पुराना वक्त होता तो विधायकों के क्रैश की जिम्मेदारी कोई सरकारी एजेंसी संभाल लेती। लेकिन ये दौर निजीकरण का है। भारत तेजी से डेमोक्रेसी प्राइवेट लिमिटेड बनने की दिशा में अग्रसर है। ऐसे में उचित यही होगा किविधायक बचाओ परियोजनाका स्टार्ट अप प्रपोजल लेकर प्राइवेट कंपनियां सामने आयें।

बेहतर प्रस्ताव देने वाली कंपनियों को विधायक बचाओ स्टार्ट अप शुरू करने का लाइसेंस दिया जाये। इस प्रयास से हमारे विधायक सुरक्षित रहेंगे और लोकतंत्र की रक्षा हो पाएगी।

लेकिन किसी एक पार्टी के चाहने से ऐसा संभव नहीं है। राष्ट्रहित में सभी पार्टियों को आमसहमति बनानी पड़ेगी। जब विधायक हर पार्टी का चोरी होता है तो फिर आम सहमति से विधायक बचाओ स्टार्ट अप को हरी झंडी क्यों नहीं दिखाई जा सकती है?

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