वाह रे जगन मोहन

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वाइ.एस. जगन मोहन रेड्डी ने ऐसा दांव खेला कि उनके कई प्रतिद्वंद्वी एक साथ ढेर हो गए। सबसे पहले चंद्र बाबू नायडू को झटका लगा। उन्हें कई दिनों तक झटका लगता रहा।

क्या करें और न करें, की उधेड़बुन में पड़े रहे। पहले यह समझें कि जगन मोहन का दांव क्या है? इसी से उसका प्रभाव और होने वाला परिणाम देखा जा सकता है। चंद्र बाबू नायडू संभवत: पहली बार गच्चा खा गए।

पहल उनसे जगन मोहन रेड्डी ने छीन ली। सवाल आंध्र प्रदेश के साथ कथित अन्याय का है। इसे चंद्र बाबू नायडू उठा रहे थे। केंद्र पर दबाव बना रहे थे।

सौदेबाजी का अपना पुराना नुस्खा फिर से चलाना चाहते थे। जो संभव नहीं हुआ। अटल बिहारी वाजपेयी से जो वे हासिल कर लेते थे, वह नरेंद्र मोदी से असंभव देख भावी रणनीति में व्यस्त थे।

उन्हें क्या पता था कि जगन मोहन बाजी मार ले जाएंगे। इस समय आंध्र प्रदेश सत्ता राजनीति के युद्ध का मैदान बन गया है। कारण कि सालभर बाद लोकसभा और विधानसभा के चुनाव साथ-साथ होने हैं।

कौन है आंध्र प्रदेश का सबसे बड़ा हितैषी? यही तो होड़ है। इसके लिए ही सभी अपनी सेनाएं सजा रहे हैं। जगन मोहन अरबी घोड़े पर सवार दिखते हैं। तभी तो सिर्फ 9 लोकसभा सदस्यों वाले जगन मोहन ने एक लंबी छलांग लगाई।

अविश्वास प्रस्ताव पेश करने का दांव चल दिया। फिर क्या था! चंद्रबाबू नायडू अपने जाल में उलझते चले गए। पहले समर्थन का बयान दिया। उन्हें तुरंत इसका हिसाब अपने उलटा पड़ते लगा।

तब अपने सांसदों को अविश्वास प्रस्ताव लाने का आदेश दिया। असल में जगन मोहन रेड्डी की वाइएसआर कांग्रेस और चंद्र बाबू की तेलगू देशम के जनाधार में 19-20 का ही फर्क है।

इस तरह लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन की मेज पर दो नोटिस आ गई। अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष का आखिरी हथियार होता है, ब्रह्मास्त्र। अध्यक्ष उसे विचार करने के लिए कानूनन बाध्य हैं।

यही सुमित्रा महाजन ने किया। लेकिन हंगामे में फंसी लोकसभा विचार के लिए तैयार नहीं थी। एक पखवाड़ा इसी में निकल गया। जगन मोहन उस कांग्रेसी नेता के बेटे हैं जिसने सोनिया गांधी को वाजपेयी शासन में संभाला।

इतना ही नहीं, कांग्रेस का पूरा खर्च उठाया। दगाबाजी की मार से जगन मोहन रेड्डी ने अपनी पार्टी बनाई, पिता के नाम पर। ऐसा संभव ही नहीं था कि जगन मोहन का दाव सिर्फ चंद्र बाबू नायडू को चित करता। कांग्रेस कैसे बच सकती थी।

हुआ यही। राहुल गांधी जब लोकसभा में 23 मार्च यानी शुक्रवार को पहुंचे तो उन्हें जगन मोहन का तीर सीधे लगा। हंगामे को दूसरे पखवाड़े में भी चलाते रहने के इरादे को तीर ने तार-तार कर दिया।

राहुल गांधी लुजलुज आदमी हैं। संकल्प के धनी नहीं हैं। मौलिक होने का तो सवाल ही नहीं है। इसलिए जैसे ही उन्हें अनुभवी और राजनीति की बारीकियों को समझने वाले उनके साथियों ने बताया कि आंध्र प्रदेश में कांग्रेस वैसे ही मारी जाएगी जैसे अभी नगालैंड में साफ हो गई है।

उसका नामोनिशान मिट गया है। कांग्रेस के लिए आंध्र प्रदेश का महत्व ऐतिहासिक है। जब पूरे देश में जनता पार्टी की लहर थी तब भी आंध्र प्रदेश ने कांग्रेस को डूबने से बचाया था।

अगर आंध्र प्रदेश में कांग्रेस की सत्ता न होती तो इंदिरा गांधी जैसे उबरीं वैसे नहीं उबर सकती थीं।

यही वह रहस्य है जिससे कांग्रेस को भी मजबूरन अविश्वास प्रस्ताव की जंग में खच्चर पर सवार होकर कूदना पड़ा है। ऐसी जंग राहुल गांधी को मुबारक। जगन मोहन के एक दांव ने अपने प्रतिद्वंद्वियों का आधा बल हर लिया।  

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विश्वसनीयता और प्रामाणिकता राय की पत्रकारिता की जान है। हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषीय न्यूज एजेंसी से उन्होंने पत्रकारिता में कदम रखा था। वे जनसत्ता के चुने हुए शुरुआती सदस्यों में एक रहे हैं। राय ‘जनसत्ता’ के ‘संपादक, समाचार सेवा’ के रूप में संबद्ध रहे। चार वर्षों तक पाक्षिक पत्रिका ‘प्रथम प्रवक्ता’ का संपादन किया। फिलहाल ‘यथावत’ के संपादक हैं।

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