वसुंधरा के सामने दोहरी चुनौती

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चार अगस्त की सुबह राजस्थान के उदयपुर शहर में और दिनों की अपेक्षा ज्यादा कोलाहल था। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह चुनावी शंखनाद करते हुए मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की राजस्थान गौरव यात्रा को हरी झंडी दिखाकर विजय रथकी तर्ज पर रवाना कर रहे थे।

झीलों के इस शहर में शाह ने नेतृत्व बदलने के सारे कयासों को नकारते हुए पूरी तरह स्पष्ट कर दिया कि,’पार्टी नरेन्द्र मोदी और वसुंधरा राजे के विकास कार्यों के दम पर चुनाव में उतर रही है। शाह ने इस मौके को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के 40 सवालों के जवाब मांगने के बयान पर हमलावर होने का अवसर भी नहीं गंवाया और पलटवार करते हुए दो टूक लफ्जों में कह दिया कि,’हमसे सवाल! कांग्रेस से तो जनता चार पीढि़यों का हिसाब मांग रही है?’

इससे ठीक एक महीने पहले शनिवार 6 जुलाई का दिन भी भाजपा के लिए ऐतिहासिक घड़ी की तरह था जब लाभार्थी जनसंवाद सभाको संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने 31 मिनट के भाषण में बार-बार मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की तारीफों के पुल बांधते हुए साफ कर दिया कि,’भाजपा अगला विधानसभा चुनाव वसुंधरा राजे के नेतृत्व में ही लड़ेगी।

 

“प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के नेतृत्व में राजस्थान विधानसभा चुनाव लड़ने का एलान किया है। अब प्रदेश भाजपा नेतृत्व में बदलाव का कयास बीती बात हो गई है।”

मोदी ने यहां तक कहा कि,’चार साल पहले प्रदेश में कैसे काम होता था, किन हालात में वसुंधरा राजे ने काम संभाला और बेपटरी हुए विकास को साधा, उन बातों को भूलना मत… तब आपको पता चलेगा कि आज कैसा काम हो रहा है?

अब प्रदेश भाजपा के नेतृत्व में बदलाव का कयास बीती बात हो गई है। वसुंधरा राजे निर्विवाद रूप से भाजपा का चुनावी चेहरा हैं। अब सवाल पूरी तरह वसुंधरा राजे के अस्तित्व का है।

करो या मरोसरीखी चुनावी जंग में राजे के सामने परम्परागत वोट बैंक को बनाए रखने,अपने को साबित करने और पार्टी आलाकमान के भरोसे पर खरा उतरने की चुनौती है। सुराज गौरव यात्राको देखते हैं तो इस बात का अहसास होता है कि उन्होंने पूरी ऊर्जा और ताकत झोंक रखी है।

“वसुंधरा राजे निर्विवाद रूप से भाजपा का चुनावी चेहरा हैं। अब सवाल पूरी तरह उनके अस्तित्व का है। ‘करो या मरो’ सरीखी चुनावी जंग में राजे के सामने परम्परागत वोट बैंक को बनाए रखने और अपने को साबित करने की दोहरी चुनौती है।”

सुराज यात्राके पहले चरण में मुख्यमंत्री के प्रति चित्तौड़गढ, डूंगरपुर, बांसवाड़ा के आदिवासियों की नाराजगी चौंकाने वाली थी। सरकारी योजनाओं के बारे में आदिवासियों का शिकायती लहजा स्तब्ध करने वाला था कि, ‘कैसी योजना और कैसा लाभ?

जिन लोगों को हमने वोट दिया, उसके बाद तो हमें उनकी शक्ल तक नजर नहीं आई ? चित्तौड़ के आदिवासी भील समुदाय को महाराणा प्रताप के साथ युद्ध में रहे योद्धाओं का वंशज माना जाता है। मुगलों के खिलाफ युद्ध करते समय महाराणा प्रताप ने इन्हीं भील आदिवासियों के साथ लंबा वक्त गुजारा था।

आदिवासी बहुल क्षेत्र उदयपुर संभाग में आता है और गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया, इसी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं, लेकिन उन्होंने इस संभाग की सुराज गौरव यात्रामें मुख्यमंत्री से क्यों दूरी बनाए रखी, यह सवाल भी चुनावी बेला में बुरी तरह खदबदा रहा है?

राजे के सामने सबसे बड़ी चुनौती पार्टी का परम्परागत वोट माना जाने वाला राजपूत समुदाय है, जो इस कदर नाराज है कि गांव, तहसील और जिला स्तर पर धिक्कार रैलीनिकालने पर आमादा है।

समाज की संघर्ष समिति के संयोजक गिरिराज सिंह लोटवाड़ा कहते हैं, ‘अक्टूबर में आयोजित किए जाने वाले सम्मेलन में समाज के लोगों को, वसुंधरा मुक्त राजस्थानऔर कमल का फूलहमारी भूलकी शपथ दिलाई जाएगी।

गर्जर आरक्षण आंदोलन की अगुवाई करने वाले गुर्जर नेता किरोड़ी सिंह बैसला ने दो टूक कह दिया है कि वसुंधरा राजे का विरोध जारी रहेगा। इस बीच वसुंधरा से नाराज पार्टी के वरिष्ठ नेता घनश्याम तिवाड़ी ने अलग दल बना लिया है। चुनाव मैदान में उतरे तो नुकसान तय है।

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