लालच पर लगाम

सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में 7 मई की तारीख को नीति, नैतिकता और लोकतांत्रिक परंपरा की बहाली के लिए हमेशा याद किया जाएगा। आप पूछ सकते हैं कि आखिर इस तारीख में खास क्या है? यह सवाल जायज है।

उससे ही सुप्रीम कोर्ट के फैसले का महत्व समझा जा सकता है। 7 मई को सोमवार का दिन था। उसी दिन एक जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया।

हालांकि जो विषय उसके विचाराधीन था वह उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से संबंधित था। सवाल यह था कि क्या पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन सरकारी बंगला रखने का अधिकार है?

भले ही यह सवाल उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्रियों का उदाहरण देकर उठाया गया हो पर यह सिर्फ चंद राजनीतिक नेताओं तक ही सीमित नहीं है।

इसका संबंध उन स्वार्थी राजनीतिक प्रवृत्तियों से है जिससे मुख्यमंत्रियों की फिसलन सामने आती है। इसे दूसरे तरह से भी कह सकते हैं। जिनका उदाहरण दिया गया है वे अपनी छवि गिराने के लिए स्वयं जिम्मेदार हैं।

“सवाल यह था कि क्या पूर्व मुख्यमंत्रियों को आजीवन सरकारी बंगला रखने का अधिकार है?”

इस पर सवाल उठता है कि क्या वे नेता इस बात से अवगत नहीं हैं? वे भलीभांति अवगत हैं। लेकिन स्वार्थवश अपने लिए अनाधिकार निर्णय करवाया। जिसे जनहित याचिका में चुनौती दी गई थी। अखिलेश यादव की सरकार ने 2016 में एक कानून में संशोधन कराया। कानून पुराना है। 1981 का है। उस संशोधन से पूर्व मुख्यमंत्री को आजीवन सरकारी बंगला अपने पास रखने का अधिकार मिल गया।

उसे ही सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि पद से हटने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री भी आम नागरिक हो जाता है। इसलिए उसे आजीवन आवास उपलब्ध कराना भेदभाव है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले से एक सिद्धांत की रचना की है। समता का सिद्धांत। यह संविधान की रक्षा का एक बड़ा उदाहरण है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में लिखा है कि प्राकृतिक संपदा हो, सार्वजनिक संपत्ति हो या सरकारी बंगले, ये सब राष्ट्र की संपत्ति हैं।

इनके बारे में सरकार को न्याय, निष्पक्षता और समता के सिद्धांत पर निर्णय करना चाहिए। मुख्यमंत्री जब पद से हटता है तब वह सामान्य नागरिक हो जाता है। इसलिए उसे सरकारी बंगला आजीवन रखने का कोई अधिकार नहीं है।

संविधान की भावना का इससे उलंघन होता है। इस फैसले से सुप्रीम कोर्ट ने एक मनमाने कानून को समाप्त कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप इसलिए करना पड़ा क्योंकि उत्तर प्रदेश की सरकार ने उसके फैसले का आदर नहीं किया।

सुप्रीम कोर्ट ने 2016 में फैसला सुनाया था कि मायावती, मुलायम सिंह, राजनाथ सिंह, कल्याण सिंह, रामनरेश यादव और नारायण दत्त तिवारी अपने सरकारी बंगले खाली करें। उस फैसले पर अमल करने की बजाए अखिलेश यादव की सरकार ने कानून में ही संशोधन करा दिया। उस संशोधन को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया है।

“सुप्रीम कोर्ट ने 2016 में फैसला सुनाया था कि मायावती, मुलायम सिंह, राजनाथ सिंह, कल्याण सिंह, रामनरेश यादव और नारायण दत्त तिवारी अपने सरकारी बंगले खाली करें।”

इस फैसले का देशव्यापी प्रभाव होगा। झारखंड, बिहार, जम्मू कश्मीर, असम, मणिपुर, राजस्थान और मध्य प्रदेश की राज्य सरकारों ने भी उत्तर प्रदेश की देखादेखी कानून बना रखा है।

इससे पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगला अपने पास रखने की सुविधा मिल जाती है। सवाल सिर्फ सरकारी बंगले का नहीं है उस स्वार्थी प्रवृत्ति का है जिसका लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं होना चाहिए।  सुप्रीम कोर्ट का फैसला उसी स्वार्थ पर चोट करता है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि इस फैसले के दायरे में केंद्र और राज्य सरकारों के इससे संबंधित सभी कानून आएंगे। फैसला सुनाने से पहले सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों से अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए कहा।

सिर्फ चार राज्यों ने अपना पक्ष रखा। उड़ीसा और तमिलनाडु ने बताया कि उनके राज्य में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। लेकिन बिहार और असम ने स्वीकार किया कि पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी आवास देने की व्यवस्था है।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से भेदभाव की प्रथा पर अंकुश लगेगा। इसका एक नैतिक प्रभाव भी पड़ेगा। इससे सत्ता राजनीति को अधिक जवाबदेह और पारदर्श बनना होगा।

यह फैसला लोक शिक्षण का भी काम करेगा। इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव तो तत्काल पड़ा। खास होने का मुगालता पालते नेता आम हो गए।

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विश्वसनीयता और प्रामाणिकता राय की पत्रकारिता की जान है। हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषीय न्यूज एजेंसी से उन्होंने पत्रकारिता में कदम रखा था। वे जनसत्ता के चुने हुए शुरुआती सदस्यों में एक रहे हैं। राय ‘जनसत्ता’ के ‘संपादक, समाचार सेवा’ के रूप में संबद्ध रहे। चार वर्षों तक पाक्षिक पत्रिका ‘प्रथम प्रवक्ता’ का संपादन किया। फिलहाल ‘यथावत’ के संपादक हैं।

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