रुपहले पर्दे से राजनीति के मैदान में

0
65

न्नादुराई, करुणानिधि, एमजी रामचंद्रन,जे जयललिता, एनटी रामाराव, चिरंजीवी…। और अब रजनीकांत। दक्षिण भारत में फिल्मी पृष्ठभूमि से आकर सत्ता का स्वाद चखने वालों में रजनीतकांत ताजा नाम हैं। तमिल फिल्मों के करिश्माई अभिनेता हैं।

उनकी करीब-करीब हर फिल्म बेहद हिट होती रही है। 2017 के अंत में 31 दिसंबर को जब उन्होंने राजनीति में आने की घोषणा की तो फिल्म का एक प्रसिद्ध डॉयलॉग बोला। ‘मैं एक बार जो कहता हूँ, वह सौ बार के बराबर है।’

यह लोकप्रिय डॉयलॉग उनकी बादशाह (तमिल में बाशा) फिल्म का है जिसमें उन्होंने डॉन का काम किया था। वह जरूरतमंदों की भलाई के लिए काम करता था। वह भी गरीबों की सेवा के नारे के साथ राजनीति करेंगे।

रजनीकांत ने राजनीतिक यात्रा आरंभ करने करने के लिए ‘आध्यात्मिक राजनीति’ का नारा दिया। उन्होंने कहा कि राज्य की राजनीति में परिवर्तन की जरूरत है और वे इसी संकल्प के साथ राजनीति में उतर रहे हैं।

“रजनीकांत जयललिता की अन्नाद्रमुक और करुणानिधि की द्रमुक का समर्थन भी कर चुके हैं। लेकिन अब दोनों से दूर हो गए हैं। दोनों द्रविड़ दलों के बीच राजनीकांत राजनीति
में कितना स्थान बना पाते हैं, यह देखना बाकी है।”

उनकी राजनीति में उतरने की घोषणा ने तमिलनाडु राज्य की राजनीतिक परम्परा को आगे ही बढ़ाया है। अन्नादुराई के बाद फिल्मों में प्रसिद्धि की ऊंचाइयों पर पहुंचने वाले पटकथा लेखक करुणानिधि की पटकथा का केन्द्र बिंदु हमेशा कमजोर व्यक्ति होता रहा और एम जी रामचंद्रन (एमजीआर) ने हमेशा गरीब और कमजोर किरदार की भूमिका निभाई जो न्याय के लिए संघर्ष करता रहा।

मशहूर अदाकारा सुश्री जयललिता (जिसकी लोकप्रियता का ग्राफ राज्य की महिलाओं में हमेशा बढ़ता ही रहा) ने जिस तरह से राज्य की राजनीति में कब्जा जमाया, उसका उदाहरण अन्य भाषा-भाषी राज्यों के राजनीतिक क्षेत्र में कम ही देखा जाता है। ‘अम्मा ब्रांड’ गरीबों की मदद का पर्याय हो गया था।

रजनीकांत ने तमिलनाडु की राजनीति में ऐसे समय कदम रखा जब वहां राजनीतिक नेतृत्व में बड़ा खालीपन है। जे जयललिता की मौत हो चुकी है। अति बुजुर्ग करुणानिधि बीमार रहने लगे हैं।

विजयकांत विफल हो चुके हैं। द्रमुक पारिवारिक संघर्ष में फंसी हुई है। अन्नाद्रमुक में कई गुट हैं। वहां नेतृत्वहीनता जैसी स्थिति है। जेल में बंद शशिकला के भतीजे दिनाकरन हालांकि आरके नगर विधानसभा उप चुनाव जीत चुके हैं लेकिन उनके नेतृत्व की अभी परीक्षा होनी है।

लगता है, रजनीकांत ने इसी नेतृत्व शून्यता को भांपकर राजनीति में कदम रखा है।  

तमिलनाडु की राजनीति में सेलुलाइड जीवन से जितने भी लोगों ने राजनीति में कदम रखा, उन सभी लोगों ने जनता के बीच लोकहित के काम के कारण लोकप्रियता हासिल की। अब रजनीकांत की भी पहचान जनता के बीच एक सामाजिक हित चिंतक के रूप में की जा रही है।

“तमिलनाडु की राजनीति में सेलुलाइड जीवन से जितने भी लोगों ने राजनीति में कदम रखा, उन सभी लोगों ने जनता के बीच लोकहित के काम के कारण लोकप्रियता हासिल की।”

उन्होंने राजनीति में उतरने की घोषणा के साथ ही कहा, ‘जब मैं 45 साल का था तब मैंने मुख्यमंत्री बनने की बात नहीं सोची थी, क्या आप लोग यह सोच सकते हैं कि मैं अब 68 वर्ष की आयु में ऐसा सोच सकता हूँ।… मैं राजनीति में न तो धन के लिए और न ही प्रसिद्धि के लिए आ रहा हूं, दोनों ही मेरे पास अकूत हैं।

समय है राजनीतिक परिवर्तन का। सभी पार्टियां कार्यकर्ताओं वाली हैं लेकिन हम उन्हें अपना ‘अभिभावक’ मानते हैं, हमारी पार्टी में कार्यकर्ता नहीं, ‘अभिभावक’ हैं।’

रजनीकांत ने राजनीति में अपनी जड़ें जमाने के लिए ऑनलाइन ‘अभिभावकों’ के पंजीयन का काम भी आरंभ कर दिया है। एक मंझे हुए राजनीतिक खिलाड़ी की तरह भविष्य में राजनीतिक विरोधी होने वाले के करुणानिधि से मुलाकात कर यह साबित करने की कोशिश की है कि वे सभी का आशीर्वाद और समर्थन चाहते हैं।

तमिलनाडु में राजनीतिक भविष्य तलाश रही भाजपा, रजनीकांत की राजनीति में प्रवेश को अपने लिए सुखद अवसर मानती है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को एक सीट पर विजय हासिल हुई थी।

परन्तु 2016 के राज्य विधानसभा चुनाव में उसका खाता ही नहीं खुला। रजनीकांत की भाजपा नेताओं से गाहे-बगाहे मुलाकातें भी होती रही हैं। अगर भाजपा के साथ उनका तालमेल बना तो उसे जरूर फायदा हो सकता है।

पाठक की प्रतिक्रिया

Please enter your comment!
Please enter your name here