राहुल गांधी की दोमुंही राजनीति

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कौन कहता है कि ‘गुजरात मॉडल’ विफल हो गया है? सच तो यह है कि गुजरात विधानसभा के इस चुनाव में उसका ऐसा विस्तार हुआ है जो पुन: राज्य की सीमा लांघकर देशव्यापी विमर्श का विषय हो गया है।

विकास और राजनीति एक दूसरे से बहुत गहरे जुड़े रहते हैं। गुजरात के विकास को एक माडल मानकर ही ‘गुजरात मॉडल’ का नामकरण हुआ। विकास की दृष्टि से वह जहां सफल है वहीं राजनीति को भी वह अपने आगोश में समेट चुका है।

इस बारे में किसी को भ्रम अब नहीं होगा। गुजरात विधानसभा के चुनाव में राहुल गांधी ने हर तरह से नरेंद्र मोदी की राह चुनी। नकल की। यह अलग बात है कि नकल में अपनी अकल कितनी लगाई! इस तरह वे इस चुनाव को हिन्दू बनाम हिन्दू बनाने में ऐसे जुटे कि अपनी राजनीति ही भूल गए।

“विकास और राजनीति एक दूसरे से बहुत गहरे जुड़े रहते हैं। गुजरात के विकास को एक माडल मानकर ही ‘गुजरात मॉडल’ का नामकरण हुआ।”

कांग्रेस ने कभी हिन्दू बनाम हिन्दू की राजनीति नहीं की। उसकी पहचान सेकुलर राजनीति की रही है। हमेशा से इस पर बहस भी चलती रही है कि सेकुलरिज्म क्या है? इसी बहस में लालकृष्ण आडवाणी ने नया शब्द जोड़ा।

उन्होंने जो नया शब्द चलाया वह ‘शुडो सेकुलरिज्म’ कहलाया। छद्म धर्मनिरपेक्षता। कांग्रेस पर वह शब्द ऐसा चिपका कि अभी तक छूटा नहीं है। याद करिए यह तीन दशक पुराना किस्सा है। दाग भी उतना ही पुराना है।

राहुल गांधी उस दाग को मिटाने में लगे हैं। उन्हें किसने सलाह दी, यह तो नहीं मालूम, लेकिन वे जो कुछ कर रहे हैं उससे उनकी दोमुही राजनीति सामने आ रही है। कांग्रेस में इससे बेचैनी स्वाभाविक है।

सवाल भी उठ रहे हैं। राहुल गांधी का रंग बदलना वैसा ही है जैसा कभी राजीव गांधी करते थे। परिणाम हुआ कि वे न हिन्दू समाज का समर्थन पा सके और न मुसलमानों का विश्वास जीत सके।

ऐसा नहीं लगता कि राहुल गांधी ने अपने पिता की भूलों से कुछ सीखा हो। उन्हें अपना कहा भी शायद याद नहीं रहता। इसे कांग्रेसी ही बता रहे हैं। जिस दिन राहुल गांधी ने खुद को शिव भक्त बताया, उसी दिन कांग्रेस के एक अनुभवी नेता ने टिप्पणी की कि 2006 में राहुल गांधी ने जो कहा था, उसे वे भूल गए हैं।

तब उन्होंने हैदराबाद की कांग्रेस में कहा था कि ‘किसी ने मुझसे मेरा धर्म पूछा। थोड़ी देर सोचा और जवाब दिया कि तिरंगा झंडा मेरा धर्म है।’ क्या शिव भक्त होने का दावा करने वाले राहुल गांधी को वह बयान याद है? यह कांग्रेसी पूछ रहे हैं। जाहिर है कि कांग्रेसी भी राहुल गांधी के इमान पर सवाल उठा रहे हैं।

“गुजरात चुनाव इसलिए भी याद किया जाता रहेगा क्योंकि राहुल गांधी ने इसी दौरान
कांग्रेस की कमान संभाली है। अध्यक्ष बने हैं। इसी से जुड़ा हुआ है
कि वे कैसी कांग्रेस बनाएंगे?”

गुजरात चुनाव इसलिए भी याद किया जाता रहेगा क्योंकि राहुल गांधी ने इसी दौरान कांग्रेस की कमान संभाली है। अध्यक्ष बने हैं। इसी से जुड़ा हुआ है कि वे कैसी कांग्रेस बनाएंगे? उसकी कसौटी क्या होगी? इसका संबंध राहुल गांधी की राजनीति के अतीत और भविष्य से है। अतीत जाना हुआ है।

इसमें उनके महासचिव और उपाध्यक्ष रहते कांग्रेस ने अपने राज में हिन्दू आतंकवाद का मुद्दा बनाया। तब राहुल गांधी चुप थे। अब वे शिव भक्त होने का दिखावा कर रहे हैं।

इससे दो बात साफ-साफ निकलती है। वे बेपेंदी की विचारहीन कांग्रेस बनाएंगे। जो अवसरवादी होगी। उन्हें अपने परिवार की कुल परंपरा जहां नहीं मालूम वहीं, वे कांग्रेस की परंपरा से भी अनभिज्ञ दिखते हैं। ऐसे हैं राहुल गांधी। वे जैसे हैं, वैसी ही कांग्रेस को भी बनाएंगे।  

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