राहुल के नेतृत्व पर विपक्ष उदासीन

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रेंद्र मोदी को 2019 में फिर सत्ता में आने से रोकने के लिए गंभीरता से कोशिश में लगे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को विपक्षी दल ही गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। दो हालिया घटनाओं ने कांग्रेस पार्टी के ‘वार रूम’ को भाजपा विरोधी मोर्चे की तरफ देखने को विवश किया है।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से मिलने के लिए भेजा गया। 17 जून को ममता बनर्जी नीति आयोग की बैठक शामिल होने के लिए दिल्ली आयी थीं। अहमद पटेल और ममता बनर्जी की बैठक में क्या बातचीत हुई, कांग्रेस ने कोई बयान जारी नहीं किया।  

लेकिन यह पता चला है कि पटेल ने ममता को यह समझाने की कोशिश की थी कि 2019 में भाजपा को हराने का उद्देश्य तभी पूरा हो सकता है जब विपक्षी दल कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व को जारी रखते हैं।

लेकिन उन राज्यों में इसे नजरंदाज किया जा रहा है जहां क्षेत्रीय दल सत्ता में हैं या शक्तिशाली हैं। पटेल की इस अपील पर ममता की क्या प्रतिक्रिया रही, यह पता नहीं चला है। लेकिन एक बात निश्चित है कि पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के प्रति तृणमूल के दृष्टिकोण पर नेतृत्व चिंतित है।

यह कहा नहीं जा सकता कि तृणमूल कांग्रेस बंगाल में कांग्रेस को सीट बंटवारे के समय उचित हिस्सा देगी। पश्चिम बंगाल के संभावित परिदृश्य में त्रिकोणीय संघर्ष भी हो सकता है।

“2019 में भाजपा को हराने का उद्देश्य तभी पूरा हो सकता है जब विपक्षी दल कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व को जारी रखते हैं।”

कांग्रेस को वाम मोर्चा के साथ हाथ मिलाकर राज्य में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ लड़ने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। हालांकि, अगले साल होने वाले  चुनाव में अभी 10 महीने बाकी हैं।

तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के बीच बन रहे समीकरण में बदलाव भी हो सकता है। 13 जून को आयोजित इफ्तार पार्टी में राहुल गांधी ने विपक्षी पार्टियों के नेताओं को आमंत्रित किया था।

कांग्रेस अध्यक्ष को इस आयोजन से निराशा मिली क्योंकि कोई भी वरिष्ठ विपक्षी नेता ने इफ्तार में भाग नहीं लिया। राष्ट्रवादी कांग्रेस के शरद पवार तो वहां नहीं ही गए, पार्टी के दूसरे प्रमुख चेहरा प्रफुल्ल पटेल को भी नहीं भेजा गया।

इस आयोजन में डीपी त्रिपाठी ने पार्टी का प्रतिनिधित्व किया। ममता बनर्जी नहीं आईं। उन्होंने तृणमूल कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करने के लिए दिनेश त्रिवेदी को भेजा।

बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती भी गायब थीं। बसपा का प्रतिनिधित्व सतीश मिश्रा ने किया। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और टीडीपी के मुख्यमंत्री एन चंद्रबाबू नायडू भी राहुल गांधी द्वारा आयोजित पार्टी में नहीं दिखे।

इफ्तार पार्टी में विपक्षी झुकाव पर्याप्त नहीं था। चार मुख्य विपक्षी मुख्यमंत्रियों पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी, आंध्र प्रदेश के चंद्रबाबू नायडू, केरल के पिनाराई विजयन और कर्नाटक के एचडी कुमारस्वामी ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के साथ एकजुटता दिखायी।

“कांग्रेस को वाम मोर्चा के साथ हाथ मिलाकर राज्य में भाजपा और तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ लड़ने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। हालांकि, अगले साल होने वाले  चुनाव में अभी 10 महीने बाकी हैं।”

विपक्षी मुख्यमंत्रियों ने आईएएस अधिकारियों के कथित असहयोग पर केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच मतभेद को हल करने में मदद करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील की। कांग्रेस ने केजरीवाल और उनके मंत्रियों की दिल्ली के उप राज्यपाल के कार्यालय में धरना देने पर आलोचना की है।

विपक्षी खेमे में कुछ गंभीर ‘खेल’ चल रहा है जो कांग्रेस के खिलाफ जा सकता है। 2019 के चुनावों में ममता बनर्जी, चंद्रबाबू नायडू और अखिलेश यादव जैसे कुछ विपक्षी नेताओं का यह संयुक्त प्रयास है जिसमें कांग्रेस नहीं है।

ऐसी खबरें आ रही है कि कांग्रेस ने मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में मायावती की बसपा के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन बनाने का प्रस्ताव दिया है। यह प्रस्ताव अखिलेश यादव को परेशान कर चुकी है। सपा कांग्रेस से मध्य प्रदेश में बड़ी संख्या में सीटों की मांग कर रही है जहां उसकी कोई उपस्थिति नहीं है।

लोकसभा चुनाव के लिए यूपी में सीट साझा करने की व्यवस्था के बदले मध्य प्रदेश में समाजवादी पार्टी अपने लिए सीटों की मांग कर कांग्रेस पर दबाव बना रही है। मध्य प्रदेश में समाजवादी पार्टी के लिए कांग्रेस द्वारा सीट देने की संभावना नहीं है।

वहां पर सत्तारूढ़ भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा चुनाव होगा। यदि राहुल गांधी मायावती के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन करने पर सहमत हुए तो यह दलित वोटों के कारण हैं।

एक अनुमान के मुताबिक, यदि कांग्रेस बसपा के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन करती है तो भाजपा को पिछली बार की अपेक्षा 25-30 सीटें कम मिल सकती हैं। 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 230 सदस्यों वाली विधानसभा में 165 सीटें मिली थीं।

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दैनिक अखबार ‘स्टेट्समैन’ से श्री सहाय ने पत्रकारीय जीवन की शुरुआत की। वे करीब तीन दशक तक स्टेट्समैन से जुड़े रहे। इस दौरान सहाय ने जो खबरें की, उससे उनकी स्वतंत्र पहचान बनी। ‘यथावत’ के शुरुआती दिनों से ही मोहन सहाय बतौर सलाहकार संपादक पत्रिका से जुड़े हैं।

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