रहने को घर नहीं , ये गोल्फ कोर्स हमारा

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2030 के बाद दुनिया के सारे बड़े गोल्फ खिलाड़ी पचास किलोमीटर के एक ही दायरे में पैदा होंगे। मेरे इस आकलन का आधार दिल्ली के हवाई अड्डे से नोएडा तक की सड़क के दोनो किनारे पर खड़े आदमकद होर्डिंग हैं।

ये होर्डिंग अलग-अलग बिल्डरों के हैं, जो चीख-चीख कर बता रहे हैं कि उनके प्रोजेक्ट में किस तरह के गोल्फ कोर्स हैं। हाउसिंग के प्रीमियम प्रोजेक्ट में 18 होल वाले गोल्फ कोर्स हैं।

मध्यम श्रेणी के प्रोजेक्ट में 9 होल वाले हैं। थ्री होल गोल्फ कोर्स और गोल्फ कोर्स विदाउट होल भी हो तो पता नहीं। अमीर लोगो का खेल है, मुझे इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है।

लेकिन इस बात की जानकारी जरूर है कि बिल्डरो ने ठान लिया है कि भविष्य के सारे विश्वविजेता गोल्फर नोएडा, ग्रेटर नोएडा और गाजियाबाद में ही पैदा होंगे।

एक मित्र ने बहुत पहले नोएडा एक्सटेंशन की हाउसिंग सोसाइटी में फ्लैट बुक कराया था। यह  फ्लैट बहुत सस्ता है और सोने में सुहागा कि उसके साथ एक गोल्फ कोर्स भी है।

मैने कहा मुबारक हो अब तो आप रईसों वाली जिंदगी जिएंगे। वे इतने उत्साहित हुए कि हाथ पकड़कर सीधे अपनी गाड़ी में बिठाया और चल पड़े प्रोजेक्ट दिखाने।

गाड़ी हिचकोले खाती हुई एक एक ऐसे इलाके में दाखिल हुई जहां सड़क के नाम पर केवल एक पगडंडी  थी। कार धूल उड़ाती हुई हमें मंजिल तक ले आई। एक तरफ रेत का टीला था, दूसरी तरफ बजरी पड़ी थी।

“ऊंची इमारतें, हरियाली, कई स्विमिंग पूल और सबसे बढ़कर गोल्फ कोर्स ये सब कुछ एक बहुत बड़े टेबल पर इस तरह उकेरे गये थे कि देखकर पल भर को लगा कि हम ग्रेटर नोएडा नहीं बल्कि सिंगापुर में हैं।”

जगह-जगह विशाल गड्डे खुदे थे और सरिया लदे कुछ ट्रक भी खड़े थे। मित्र ने समझाया, कंस्ट्रक्शन साइट का एक ही माहौल, एक जैसा ही होता है। एक बार काम खत्म, यह जगह पहचान में नहीं आएगी।

मैने उनके समर्थन में सिर हिलाया और हम दोनो एक दूसरे का हाथ पकड़े गड्डे के किनारे-किनारे वहां तक पहुंचे जहां बिल्डर ने अस्थायी दफ्तर बना रखा था।

बिल्डर के कर्मचारी ने मुझे प्रोजेक्ट का मॉडल दिखाया तो आंखे चौंधिया गई।

ऊंची इमारते, हरियाली, कई स्विमिंग पूल और सबसे बढ़कर गोल्फ कोर्स ये सब कुछ एक बहुत बड़े टेबल पर इस तरह उकेरे गये थे कि देखकर पल भर को लगा कि हम ग्रेटर नोएडा नहीं बल्कि सिंगापुर में हैं। मैने पूछा- इतना बड़ा गोल्फ कोर्स बनेगा कहां?

कर्मचारी ने बाहर इशारा किया- देखिए,जहां हमारी बाउंड्री खत्म हो रही है, उसके बाहर के पूरे इलाके को गोल्फ कोर्स के रूप में डेवलप किया जा रहा है।

देखा -एक बड़ा सा नाला था, उसके पार मिट्टी का विशाल टीला था। जहां टीला खत्म हो रहा था, उसके साथ एक और नाला था, दूसरा नाला खत्म होने के बाद करीब एक किलोमीटर तक फैली झाड़यिां थीं। मैं हैरान होकर देख रहा था।

बिल्डर का कर्मचारी मेरा अज्ञान ताड़ गया और हंसकर बोला- लगता है आप टीवी नहीं देखते। दुनिया के बड़े गोल्फ कोर्स ऐसे ही होते हैं, प्राकृतिक वातावरण में एकदम उबड़-खाबड़।

अभी इस जगह की लैंडस्केपिंग होगी। टीले पर खूबसूरत घास उगाए जाएंगे और चारो तरफ हरे-भरे पेड़ होंगे। जहां नाले हैं वहां सुंदर वॉटर बॉडीज होंगी और उनमें बत्तखें तैरेंगी।

“लंबे अरसे बाद पिछले हफ्ते दिल्ली आना हुआ तो उन मित्र से मुलाकात हुई। मैने पूछा- अब तो आपके बच्चे गोल्फ खेल रहे होंगे। वे चिढ़कर बोले- काहे का गोल्फ! बिल्डर फ्लैट दे यही हमारी जीत होगी।”

अपनी अज्ञानता स्वीकार कर, थोड़ी देर बाद हम वहां से लौट आए। ये कहानी 2008 की है, अब 2018 है।  दिल्ली से बोरिया-बिस्तर बांधकर मुंबई आ चुका हूं।

लंबे अरसे बाद पिछले हफ्ते दिल्ली आना हुआ तो उन मित्र से मुलाकात हुई। मैने पूछा- अब तो आपके बच्चे गोल्फ खेल रहे होंगे। वे चिढ़कर बोले-  काहे का गोल्फ! बिल्डर फ्लैट दे यही हमारी जीत होगी।

ईएमआई के साथ किराया भरते-भरते हालत खराब हो गई है। जमा पूंजी पहले ही बिल्डर ले चुका है। अब तो भगवान का ही सहारा है।

संयोग की बात- दिल्ली प्रवास के दौरान एक दूसरे मित्र से मुलाकत हुई, जिनकी माली हालत हम तमाम दोस्तो में सबसे बेहतर है।

उन्होंने कहा- आओ मैं तुम्हे अपना नया घर दिखाकर लाऊं। गाड़ी में बैठकर हम चले। वह नोएडा एक्सटेंशन नहीं सचमुच का नोएडा था। गोल्फ कोर्स भी सचमुच का था।

लेकिन खिलाड़ी नजर नहीं आए अलबत्ता कुछ बकरियां जरूर घास चर रही थीं। गोल्फ कोर्स पार करके हम बिल्डिंग के कॉरीडोर  में दाखिल हुए।

वॉचमैन से पूछताछ के बाद मित्र ने कहा- लिफ्ट अभी तैयार नहीं हो पाया है, बारह मंजिल तक सीढि़यां चढ़ पाओगे? मै समझ गया कि मेरी फिटनेस को ललकारा जा रहा है।

धूल भरी सीढि़यों पर रेंगते वे आगे बढ़े और पूरे जोश में पीछे-पीछे मैं भी चला।

हम दोनो वहां पहुंच ही गए जहां उनके सपनो का आशियाना था। फ्लैट तैयार ही था। बस खिड़की और दरवाजे लगने बाकी थे।

बॉलकोनी में खड़े होने पर गोल्फ कोर्स का अदभुत नजारा दिखाई दे रहा था। घास चरती बकरियां भी बहुत सुंदर लग रही थीं। मेरे मित्र बोले- यह दिल्ली-एनसीआर का सबसे अच्छा प्रोजेक्ट था।

लेकिन सरकार बदली तो बिल्डर की हालत खराब हो गई। काम उसने बहुत अच्छा करवाया है लेकिन अब दिवालिया हो चुका है।

जाने कब मिलेगा पजेशन? मैने पूछा- क्या ये नहीं हो सकता कि सारे फ्लैट ओनर मिलकर फिलहाल गोल्फ कोर्स का कब्जा ले लें और बच्चो के साथ हर इतवार को खेलने आया करें।

घर ना सही गोल्फ कोर्स सही। मित्र ने थोड़ी देर सोचने के बाद जवाब दिया- वैसे आइडिया बुरा नहीं है। मन में आशा लिए  दिल्ली से वापस लौट आया कि आज नहीं तो कल नोएडा में गोल्फ क्रांति जरूर आएगी।

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