योग और वियोग

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जुड़ना योग है, टूटना वियोग है। योगासन करने से शरीर, मन और आत्मा एक-दूसरे जुड़ जाते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी यही बात देश और दुनिया को समझाने की कोशिश कर रहे हैं।

दुनिया पहले से समझती आई थी, मोदीजी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पूरे विश्व को योग की महत्ता और अच्छी तरह समझ में आ गई। संयुक्त राष्ट्र ने 21 जून की तारीख को विश्व योग दिवस घोषित कर दिया।

लेकिन देशवासियों के लिए योग का महत्व ठीक से समझना अभी बाकी है। योग के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए प्रधानमंत्री स्वयं हर साल 21 जून को तरह-तरह की क्रियाएं करके दिखाते हैं। देशवासियों में उत्साह का संचार होता है।

वे भी फौरन योगा मैट खरीद लेते हैं और टीवी के सामने डट जाते हैं। हैशटैग योगा डे के साथ अपने-अपने फोटो फेसबुक, ट्विटर और इंस्टाग्राम पर डाल देते हैं और अगले दिन फिर से उनका योग से वियोग हो जाता है।

लेकिन प्रधानमंत्री मोदी आसानी से हार मानने वालों में कहां हैं? वे हर देशवासी को स्वस्थ और चुस्त-दुरुस्त देखना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने विराट कोहली के फिटनेस चैलेंज को स्वीकार किया।

प्रधानमंत्री ने फिटनेस चैलेंज मंजूर किया तो उनके पीछे-पीछे बहुत से और लोगों ने भी किया। नतीजे में एक बार फिर सोशल मीडिया तस्वीरों से रंग गया।

लेकिन क्या फिटनेस या योग जीवन पद्धति बन पाए? बदलाव अगर इतनी आसानी से आ जाता तो फिर कहना ही क्या था! वैसे बाबा रामदेव योग के कहीं ज्यादा पुराने ब्रांड एंबेसेडर हैं।

“प्रधानमंत्री योग के प्रचार में व्यस्त हैं और उधर एनडीए में वियोग का दौर चल रहा है। वियोग की यह स्थिति गठबंधन साझीदारों के विचित्र आसनों की वजह से बनी है।”

लेकिन जब से बाबाजी की कुंडली में राजयोग आया है,असली योग पीछे चला गया है।अब कपालभाति से ज्यादा केश कांति और अनुलोम-विलोम के बदले नूडूल-बिस्कुट सुनाई देता है।

हर संभव प्रोडक्ट लांच करने के बाद अब बाबाजी टेलीकॉम सेक्टर में भी उतर चुके हैं। बहुत संभव है कि आनेवाले दिनों में वे कोई ऐसा कैप्सूल लांच कर दें जिसे सुबह-शाम खाने से समस्त यौगिक क्रियाओं के लाभ मिलने लगे।

किसी आसन-प्रणायाम के चक्कर में पड़ने की जरूरत ही ना रहे। बाबाजी की अति विस्तारवादी योजनाओं के बीच योग के प्रमोशन की जिम्मेदारी अब अकेले मोदीजी के कंधों पर आ गई है।

इधर प्रधानमंत्री योग के प्रचार में व्यस्त हैं और उधर एनडीए में वियोग का दौर चल रहा है। वियोग की यह स्थिति गठबंधन साझीदारों के विचित्र आसनों की वजह से बनी है।

उद्धव ठाकरे ‘हठयोगी’ बने बैठे हैं। विचित्र मुद्राएं और भाव-भंगिमा दिखा रहे हैं। पुराने हठयोगियों की तरह आंखे लाल-लाल करके शाप भी दे रहे हैं।

किसी को उनके पास फटकने की हिम्मत नहीं हो रही थी। लेकिन अमित शाह उनके पास गए। उल्टे लटके उद्धव कुछ देर के लिए सीधे भी हुए। लंबी वार्ता हुई लेकिन वियोग की आशंका अब भी कायम है।

“उद्धव ठाकरे ‘हठयोगी’ बने बैठे हैं। विचित्र मुद्राएं और भाव-भंगिमा दिखा रहे हैं। पुराने हठयोगियों की तरह आंखें लाल-लाल करके शाप भी दे रहे हैं।”

बिहार के सुशासन बाबू अपना चिर-परिचित’गुप्तासन’ दिखा रहे हैं। अगला पैंतरा क्या होगा कोई नहीं जानता।

बिहार एनडीए में वियोग की आशंका सिर्फ सुशासन बाबू की वजह से नहीं बढ़ी है। मौसम विज्ञानी पासवान ताड़ासन करके अपना कद बढ़ाने में जुटे हैं। वहीं काग चेष्टा करते हुए उपेंद्र कुशवाहा कागासन के पैंतरे दिखा रहे हैं।

नीतीश, पासवान और कुशवाहा मिलकर अगले लोकसभा में जितनी सीटें मांग रहे हैं, उतनी सीटें अमित शाह ‘शीर्षासन’ करके भी नहीं दे सकते हैं। यानी वियोग के बादल मंडराना अवश्यंभावी है।

चित्र-विचित्र आसन के मामले में बीजेपी नेता भी कम नहीं हैं। गिरिराज सिंह से लेकर त्रिपुरा के नये विप्लवी मुख्यमंत्री तक बीजेपी के दर्जनों नेता हमेशा ‘बकासन’ की मुद्रा में रहते हैं।

योगी आदित्यनाथ को ‘गोरक्षासन’ और ‘गोमुखासन’ पसंद हैं। तो दूसरी तरफ अज्ञातवास में भेजे गए ये कुछ पुराने नेता ‘भुजंगासन’ करने  पर तुले हुए हैं तो कुछ ऐसे भी हैं, जो यह दावा कर रहे हैं कि उनकी कुंडलिनी जागृत हो गई है।

वियोग हो या ना हो लेकिन पार्टी को रोग होने की आशंका जरूर पैदा हो गई है। यौगिक क्रियाओं के बहुत लाभ हैं,अगर उन्हे सही तरीके से किया जाए। पतंजलि ने योग के आठ सूत्रों का प्रतिपादन कुछ सोच-समझकर ही किया होगा।

मोदीजी समय-समय पर अपनी पार्टी के लोगो को यम, नियम आसन और प्रत्यहार की सही व्याख्या समझाते रहते हैं। लेकिन परिणाम सामने वाले व्यक्ति की ग्राह्यता पर निर्भर है। आखिर एक अकेले मोदीजी क्या-क्या करेंगे?

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