‘ये राज मेरे सीने में ही दफन हो जाएंगे’

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स मुल्क की सरहद को कोई छू नहीं सकता। जिस मुल्क की सरहद की निगेहबान हों आंखें। …और नजर भी ऐसी जो किसी ‘दुश्मन’ पर कभी मेहरबां न हुई, जुबां ऐसी जो सदा प्यार की एक मीठी दास्तां रही…।

कुछ ऐसी ही बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे आरएन काव। उनकी जयंती (10 मई) पर पूरे राष्ट्र ने कृतज्ञता भाव से भावभीनी श्रदधांजलि अर्पित की। आरएन काव अर्थात रामेश्वर नाथ काव का जन्म 10 मई, 1918 को तत्कालीन बनारस (अब वाराणसी) में एक कश्मीरी पंडित परिवार में हुआ था।

वह भारतीय खुफिया विभाग के ऐसे सिरमौर थे जिनकी उपलब्धियों से राष्ट्र गौरवान्वित हुआ। वह रॉ (रिसर्च एंड अनालिसिस विंग) के संस्थापक भी थे। पता नहीं, कब वक्त को पंख लग जाते हैं और कब वक्त काटे नहीं कटता।

आज जब अतीत के झरोखे से निहारता हूं तो सहसा ही ‘काव साहब’ की छवि मन में कौंध जाती है और मुझसे जुड़ी उनकी स्मृतियां ताजा हो जाती हैं। उनके बारे में कई पत्र-पत्रिकाओं में बहुत सी बातें प्रकाशित हुईं, लेकिन उन्होंने किसी पर भी कभी कोई तीखी प्रतिक्रिया नहीं दी।

लेकिन, मैं यहां एक ऐसी घटना का जिक्र करना चाहूंगा जिसके कारण काव साहब थोड़े असहज हुए थे। पत्रकार राम बहादुर राय ने राजीव गांधी की हत्या के बाद मुझसे काव साहब के साथ एक मुलाकात निर्धारित करने के लिए कहा।

यह एक अनौपचारिक मुलाकात थी। राय ने काव साहब से यह सवाल किया कि राजीव गांधी की हत्या से क्या रॉ (रिसर्च एंड अनालिसिस विंग) की छवि पर कोई प्रतिकूल असर पड़ेगा? इस पर उन्होंने सिर हिलाकर हां में जवाब दिया।

इसके पश्चात राय ने उनकी इस स्वीकारोक्ति के आधार पर एक लेख लिखा और यह बात रॉ के अधिकारी काव साहब के संज्ञान में ले आए। शाम को काव साहब ने मुझे तलब किया और राम बहादुर राय का लिखा हुआ लेख दिखाने के लिए कहा। हालांकि उनके चेहरे पर नाराजगी का कोई भाव नहीं था।

जाने-माने पत्रकार रजत शर्मा ने 1993 में लोकप्रिय इंटरव्यू प्रोग्राम ‘आपकी अदालत’ शुरू किया। अपने इस प्रोग्राम के लिए रजत शर्मा काव साहब का इंटरव्यू लेना चाहते थे। उन्होंने इस बाबत मुझसे बात की और मैं उन्हें काव साहब के पास लेकर पहुंचा।

उनके पास इस प्रोग्राम से सम्बंधित कुछ कैसेट्स थे जो मैंने काव साहब के यहां ही रखवा दिया ताकि फुर्सत के वक्त वह उन्हें देख सकें।

हालांकि काव साहब ने इंटरव्यू देने का कोई वादा तो नहीं किया, अलबत्ता उन्होंने यह जरूर कहा कि मेरे माध्यम से वह बहुत जल्द अपना निर्णय रजत शर्मा तक पहुंचा देंगे।

बहरहाल, जब मैंने काव साहब से इस टीवी इंटरव्यू के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि पूर्व विदेश सचिव टीएन कौल, तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पूर्व प्रधान सचिव पीएन हकसर ने उन्हें किसी भी प्रकार के विवाद से दूर रहने की सलाह दी थी।

“भारत सरकार की खुफिया एजेंसी रॉ के संस्थापक रहे आरएन काव का जन्म 10 मई 1918 में वाराणसी में हुआ था। प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी तक के साथ उन्हें खुफिया विभाग में काम करने का मौका मिला।”

एक बार मैंने काव साहब से खुफिया विभाग से जुड़ी कुछ गोपनीय जानकारी साझा करने का अनुरोध किया तो उन्होंने जवाब दिया कि ऐसा कभी नहीं हो सकता और ये राज मेरे सीने में ही दफन हो जाएंगे।

इन सब बातों से उनकी कर्तव्य परायणता, अपने पेशे के प्रति निष्ठा और समर्पण भाव स्पष्ट परिलक्षित होते हैं। जब तक वह जीवित थे, मीडिया की सुर्खियों से दूर रहे। उन्हें खबरों में बने रहने की न तो कोई चाह थी और न ही शौक।

मैंने अपनी पुस्तक ‘मिशन रॉ’ में एक अध्याय काव साहब को समर्पित किया है। इसमें मैंने उनके साथ बिताए कुछ सुनहरे व अविस्मरणीय पलों को शब्दों में पिरोया है।

10 मई को उनकी जन्म शताब्दी के अवसर पर मैं श्रद्धांजलि स्वरूप उनकी चंद उपलब्धियों को कलमबंद करना चाहता हूं ताकि भावी पीढ़ी न सिर्फ उनके बारे में जान सके, बल्कि पेशे के प्रति उनकी दृढ़ प्रतिज्ञा, कर्तव्यनिष्ठा, समर्पण-भाव, लगन व त्याग का अनुसरण कर सके।

रामेश्वर नाथ काव जब केवल पांच साल के थे, तभी उनके पिता की अल्पायु में ही देहांत हो गया। उनके पिता उत्तर प्रदेश में डिप्टी कलेक्टर थे। इसके बाद उनकी परवरिश उनके दादा व चाचा ने की।

काव के अनुसार, केवल 29 वर्ष की आयु में ही उनके पिता का निधन हो गया। इस सदमे से उनकी मां नहीं ऊबर पाईं। पारिवारिक परिस्थितियों के कारण उनकी प्राथमिक शिक्षा कई स्थानों पर हुई। बचपन में वह इंजीनियर बनना चाहते थे।

उन्होंने 1936 में लखनऊ विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद अंग्रेजी साहित्य में मास्टर की डिग्री के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। स्नातकोत्तर में वह प्रथम स्थान पर रहे और उन्हें गोल्ड मेडल प्रदान किया गया।

भारतीय पुलिस सेवा में भर्ती होने के लिए उन्होंने 1940 में फेडेरल पब्लिक कमीशन की परीक्षा उत्तीर्ण की और उन्हें यूपी कैडर मिला। 7 अप्रैल, 1940 को मुरादाबाद में उनकी ट्रेनिंग शुरू हुई।

इस बीच, कुछ समय के लिए उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य में लेक्चरर के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं।आजादी के बाद इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) का गठन किया गया।

1948 में वह असिस्टेंट डायरेक्टर (सुरक्षा प्रभार) के रूप में आईबी में शामिल हुए और प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के सुरक्षा अधिकारी के रूप में उनकी तैनाती हुई।

“घाना के तत्कालीन प्रधानमंत्री क्वामे क्रुमाह का भारतीय प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के साथ मित्रवत सम्बंध था।”

अप्रैल, 1955 में उन्हें एक जटिल खुफिया जिम्मेदारी सौंपी गई। इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में गुट निरपेक्ष देशों का प्रथम शिखर सम्मेलन होने वाला था।

माना जा रहा था कि चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई ‘दि कश्मीर प्रिंसेस’ नामक भारतीय विमान से इंडोनेशिया जाने वाले थे, लेकिन तबीयत ठीक नहीं होने के कारण उन्होंने यह यात्रा कुछ समय के लिए टाल दी। इस विमान को चीन सरकार ने किराए पर ले रखा था और इसे हांगकांग से जकार्ता के लिए उड़ान भरना था।

बहरहाल, 11 अप्रैल, 1955 को यह विमान चीनी प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों को लेकर हांगकांग एयरपोर्ट से रवाना हुआ। उनके साथ कुछ पत्रकार भी थे।

यह विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और समुद्र में जा गिरा। इस हादसे के पीछे ताइवान की खुफिया एजेंसी (तत्कालीन फोरमोसा) का हाथ था। इसके बाद जकार्ता शिखर सम्मेलन में भाग लेने पहुंचे चाऊ एन लाई ने पंडित जवाहर लाल नेहरू पर इस बात के लिए जोर दिया कि इस विमान दुर्घटना की हांगकांग में होने वाली जांच में भारतीय खुफिया एजेंसी को भी शामिल होना चाहिए क्योंकि उन्हें न तो हांगकांग और न ही ब्रिटिश अधिकारियों पर ही कोई भरोसा है।

इसके बाद नेहरू ने आईबी के तत्कालीन निदेशक बीएन मल्लिक को हांगकांग में होने वाली जांच में भाग लेने लिए किसी योग्य अधिकारी को नियुक्त करने का निर्देश दिया। मल्लिक ने यह जटिल जिम्मेदारी आरएन काव को सौंपी।

इस जिम्मेदारी को उन्होंने बखूबी निभाया और इससे चीनी प्रधानमंत्री भी बेहद संतुष्ट हुए। उन्होंने बीजिंग पहुंचकर प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई से जांच के बाबत समस्त जानकारी साझा की।

लाई उनसे इतने प्रभावित हुए कि जब काव उनके कार्यालय पहुंचे तो स्मृति चिन्ह के रूप में काव को अपनी व्यक्तिगत मोहर प्रदान किया।

(अनुवाद : श्री राम शॉ)

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