याद रहें पुराने अनुभव

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ह प्रसन्नता की बात होती, यदि कश्मीर में  माहे रमजान शांति और चैन से गुजर जाता। मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती का यह अनुरोध भी सार्थक होता कि इस पवित्र मास में गोलीबारी और आतंक से लोगों को मुक्ति मिले। अकीदतमंद मुसलमानों का मानना है कि यह मास मन को नियंत्रित करने, शांति और सहअतिस्त्व की भावनाएं विकसित करने का मास होता है।

इसके बाद आने वाली ईद में गिले शिकवे भूलकर गले मिलने की तैयारी होती है। लेकिन हमारे देश में ही नहीं, दुनिया के अन्य क्षेत्रों में भी कभी कभी शांति के ऐसे अवसरों का उपयोग कुछ निहित स्वार्थी तत्व शांति भंग करने के लिए ही करते रहे हैं । मुश्किल है कि ये टकराव केवल एक मजहब के लेागों का दूसरे मजहब के लोगों से ही नही होता, एक ही मजहब के दो वर्गों के बीच भी होता है और नाम दीन की सेवा का ही दिया जाता है।

अब तो यह अनुभव विश्व के हर समझदार व्यक्ति को हो गया है कि इस जुनूनी टकराव का अंत तो अपने विरोधी सभी वर्गों को समाप्त करने पर भी नही होता, क्योंकि इस भावना के लिए दुश्मन की आवश्यकता होती है और वह नए-नए दुश्मन ईजाद करता ही रहता है।

शिया-सुन्नी विवाद न तो नया है और न ही अप्रत्याशित। कश्मीर में इसका एक और खतरनाक आयाम भी है। आरम्भ से ही कश्मीर का आदोलन दूसरों के हाथों में रहा है। उसे सीमा पार से वे लोग निर्देशित करते हैं जिनका कश्मीर या कश्मीरियों के हितो से कोई सरोकार नहीं।

“अटल बिहारी वाजपेयी ने भी सद्भावना भरा एक कदम उठाया था। महबूबा और इससे पहले उनके पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद भी प्राय: उसकी दुहाई देते रहे हैं। लेकिन उस सद्भावना के परिणामों के बारे में चर्चा नहीं करते। उस वर्ष पिछले वर्षों की तुलना में अधिक लोग मारे गए जिनमें सैनिक तो थे ही, आतंकवादी भी थे और नागरिक भी।”

जो पाकिस्तान अपने करोड़ों बंगाली मुसलमानों को न्याय नही दे सका, जो सिंधियों को अपने ही देश में बेबस बना रहा है, वह कुछ लाख कश्मीरी मुसलमानों की हित चिंता क्यों करेगा? कश्मीर में ऐसा वर्ग पैदा हो गया है जो आंखं मूंद कर सीमा पार के इशारों पर चलने को तैयार है।

इसलिए महबूबा मुफ्ती को यह समझ लेना चाहिए कि उन कहने भर से ही अलगाववादी और आतंकवादी हथियार ताक पर रखकर दो महीने आराम से घर नहीं बैठे रहेंगे। रोजों का मास और अमरनाथ यात्रा का दूसरा मास बिना किसी खून खराबे के यूं नहीं गुजर जाएगा। महबूबा के अनुरोध का समर्थन नेशनल काफ्रेंस और कांग्रेस के नेताओं ने भी किया।

लेकिन अगर राजनैतिक दलों की उतनी साख होती और उन्होंने अपने दलों के संगठनों को लगभग लम्बी छुट्टी पर न भेजा होता तो इन दलों की काई औकात होती और लोग उनकी अपील को गंभीरता से लेते। कश्मीर के देहाती इलाकों, विशेषकर दक्षिण कश्मीर के गांवों में तो राजनैतिक दलों के कार्यकर्ता खोजने पर भी नहीं मिलते।

वहां जमाते इस्लामी द्वारा प्रेरित आतंकी दलों के ‘स्वयंसेवक’ ही राजनीति और मजहब दोनों का निर्देशन करते रहते हैं। कसूर उनका भी नहीं, वे भी तो किसी और के इशारे पर चलते हैं।

कोई आतंकवादी चाहे तो अपनी जोखिम पर पाकिस्तानी आकाओं की के विरुद्ध बगावत कर सकता है, कई नवजवानों ने किया भी है,लेकिन संगठन के स्तर पर हिजबुल मुजाहिदीन हो या लश्कर-ए-तैयबा या और कोई संगठन सीमा पार के आदेश को मानने के लिए मजबूर है। उनके लिए मुख्यमंत्री की अपील के कोई मायने नहीं। यह बात अगले ही दिन आतंकवादियों के प्रकट चेहरों, सैयद अली शाह गीलानी, मीरवाइज मोहम्मद फारूक और  यासीन मलिक ने इस एकतरफा कार्रवाई को मजाक बताकर विरोध किया।

“जो पाकिस्तान अपने करोड़ों बंगाली मुसलमानों को न्याय नही दे सका, जो सिंधियों को अपने ही देश में बेबस बना रहा है, वह कुछ लाख कश्मीरी मुसलमानों की हित चिंता क्यों करेगा? कश्मीर में ऐसा वर्ग पैदा हो गया है जो आंखं मूंद कर सीमा पार के इशारों पर चलने को तैयार है। ”

मजाक इसलिए था कि सेना ने केवल यह मान लिया था कि इस मास में टोह लेकर आतंकवादियों के अड्डों पर छापे नहीं मारे जाएंगे और अगर आतंकवादी किसी पर हमला नहीं करते तो सुरक्षा बल भी गोली नही चलांएगे। अलगाववादियों के लिए यह मजाक नहीं होता अगर उनको नागरिकों और सेना को शिकार करने की खुली छूट दी जाती। आतंकवादियों ने भी अपने मंसूबे व्यक्त कर दिए।

उन्होंने उत्तर कश्मीर से हाजिन के इलाके से एक नौजवान को गांवों से उठाकर फांसी पर लटका दिया। उस पर सेना का मुखबिर होने का आरोप था। करीब दो दशक पहले अटल बिहारी वाजपेयी ने भी इसी प्रकार का एक कदम उठाया था। महबूबा और इससे पहले उनके पिता मुफ्ती मोहम्मद सईद भी प्राय: अटलजी की सद्भावना की दुहाई देते रहे हैं। लेकिन कभी उस सद्भावना के परिणामों के बारे में चर्चा नहीं करते।

आंकड़े बताते हैं कि उस वर्ष पिछले वर्षों की तुलना में अधिक लोग मारे गए जिनमें सैनिक तो थे ही,आतंकवादी भी थे और नागरिक भी। अगर उस अनुभव को याद किया जाए तो भारत सरकार को सुरक्षा बलों के हाथ बांधने की कोई आवश्यकता नहीं थीं और न उसका कोई उपयोग था। फिर भी वर्तमान गृहमंत्री ने महबूबा के अनुरोध को मानते हुए कहा कि इस मास में सेना अपने ‘खोजो और मारो’ वाले कार्यक्रम को स्थगित करेगी और तभी जवाब देगी जब आतंकवादी हमला करने की कोशिश करें।

दरअसल ये सामरिक कार्रवाई नहीं है, और न ही इसमें सुरक्षा बलों की अपनी कोई मजबूरी थी। यह शुद्ध रूप से एक राजनैतिक कदम है जिसकी आवश्यता केंद्र सरकार से अधिक राज्य सरकार को है । महबूबा के पिता ने दक्षिण कश्मीर में एक शक्तिशाली राजनैतिक संगठन खड़ा किया था। इसमें वे अलगावादी तत्व भी थे जिन्होंने अब आतंकवादी कामकाज से अवकाश लेकर अपने घर परिवार की चिंता करने का फैसला किया था।

उनसे पीडीपी ने कुछ वायदे किए थे। अधिसंख्य तो पुनर्वास के थे। लेकिन भले ही पीडीपी में शामिल इन पूर्व अलगाववादियों ने हथियार छोड़ दिया था लेकिन विचारधारा नहीं छोड़ी। दक्षिण कश्मीर मे जामाते इस्लामी का दबदबा पहले से रहा है। अनेक सार्वजनिक संगठनों पर परोक्ष रूप से आज भी इसी जमात का असर है। पिछले चार सालों में पीडीपी  का आधार खिसकता रहा है।

महबूबा में वह कुशलता नहीं कि वे अपने पिता की तरह विविध प्रकार के नौजवानों को अपने साथ रख पाएं, खासकर जब जमाते इस्लामी और दूसरे अलगाववादी संगठनों ने मान लिया है कि महबूबा की सरकार को हिलाने से परोक्ष रूप में आघात भाजपा को ही लगेगा। माहे रमजान में सुरक्षाबलों के दबाव को कम करने का कदम महबूबा की इसी स्थिति की मजबूरी है।

अब जब केंद्र सराकर ने सुरक्षा बलों की कार्रवाई को सीमित करने का फैसला किया है तो यह महत्वपूर्ण है कि सुंरक्षा बलों ने इसे अपनी समरनीति का ही एक अंग बन लिया। काफी समय से सुरक्षा बल एक ऐसी योजना पर विचार कर रहे थे कि जिससे आतंकवाद भी कमजारे हो और नौजवान भी कम मरें । इसे अब खोजो और पकड़ो का नाम दिया गया है। अब आतंकवादियों को जीवित पकड़ने की समरनीति पर अमल होगा।

हालांकि यह दावा नहीं किया जा सकता है कि इससे गोली का जवाब गोली से देने की आवश्यकता समाप्त होगी लेकिन इससे उन नौजवानों को वापस घर लौटने का मौका मिलेगा जो चाहकर भी निकल नही सकते। इस प्रकार के संकेत सुरक्षा बलों को मिलते रहे हैं कि कुछ युवक आतंकवाद छोड़ना चाहते हें लेकिन निश्चित आश्वासन और माहौल के बिना नहीं भाग पाते।

पहले भी एक ऐसा दौर आया था जिसमें बड़ी संख्या में आतंकवादी अपने-अपने संगठन छोड़कर वापस लौटे थे, लेकिल उन परिवर्तित आतंकवादियों का समुचित प्रबंध करने में तबकी सराकार की अकुशलता ने उस कामयाबी को भी बेकार साबित कर दिया। रमजान मास का यह प्रयोग अगर किसी बड़ी समरनीति को जन्म दे तो कुछ दिनों के लिए सेना की भूमिका में बदलाव में भी कोई आपत्ति नही होंनी चाहिए।

इस तरह का टकराव केवल एक मजहब का दूसरे मजहब के लोगों से ही नही होता, एक ही मजहब के दो वर्गोंे के बीच भी होता है और नाम, दीन की सेवा का ही दिया जाता  है। इस टकराव का अंत अपने विरोधी सभी वर्गों को समाप्त करने पर भी नही होता। वह नए-नए दुश्मन ईजाद करता ही रहता है।

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