यही समय क्यों ?

0
95

द्धव ठाकरे बेचैन हैं। सोच नहीं पा रहे हैं कि क्या करें। उधेड़बुन में हैं। तभी तो ऐसी घोषणा की कि भाजपा से 2019 में कोई तालमेल नहीं रहेगा। उनका विचार और शिवसेना की घोषणा एक है।

इससे यह सिद्ध होता है कि उद्धव ठाकरे जो चाहते हैं वैसा फैसला करवा लेते हैं। किसी ने इसका खुलेआम विरोध नहीं किया है। जाहिर है, उनके नेतृत्व को कोई चुनौती नहीं है। लेकिन वे अपना भरोसा खोने लगे हैं।

पर असली सवाल दूसरा है। भाजपा से शिवसेना का नाता पुराना है। करीब 22 साल पुराना। जब भाजपा में प्रमोद महाजन नेता होते थे तब की ही बात है। उन्होंने शिवसेना के प्रमुख बाल ठाकरे से बात चलाई।

एक समझौता हुआ। उस समय शिवसेना की देश में छवि ऊधमी समूह की थी। भाजपा की छवि इसके विपरीत थी। इसलिए भाजपा के नेताओं को फैसले का औचित्य ठहराने के लिए बहुत प्रयास करने पड़े।

उन्हें स्पष्टीकरण देना पड़ा कि यह समझौता क्यों हुआ? क्योंकि विचार में एकता के बावजूद व्यवहार में आकड़ा 36 का था। ऐसे पुराने संबंधों को एक झटके में शिवसेना ने तोड़ने का फैसला किया है। उसकी समय सीमा निर्धारित कर दी है। सवाल यही है कि इसका मूल कारण क्या है?

“भाजपा से शिवसेना का नाता पुराना है। करीब 22 साल पुराना। जब भाजपा में प्रमोद महाजन नेता होते थे तब की ही बात है। उन्होंने शिवसेना के प्रमुख बाल ठाकरे से बात चलाई।
एक समझौता हुआ।”

यह तो समझ में किसी के भी आ रहा था कि शिवसेना और भाजपा में खटास है। महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव में शिवसेना और भाजपा में तालमेल नहीं हो सका था। दोनों अलग चुनाव लड़े थे।

भाजपा दूसरे नंबर की पार्टी बनने के लिए तैयार हो जाती तो तालमेल भी हो जाता। उसी समय से उद्धव ठाकरे परेशान हैं। हालांकि चुनाव साथ नहीं लड़े पर महाराष्ट्र सरकार में शिवसेना और भाजपा साझेदार हैं। गठबंधन सरकार है।

भाजपा महाराष्ट्र में सबसे बड़ी पार्टी है। शिवसेना सहयोगी पार्टी बनकर संतुष्ट नहीं है।शिवसेना की कार्यकारिणी समिति में उद्धव ठाकरे जो बोले, वही फैसला हो गया।

सफाई में उन्होंने इतना ही कहा कि यह फैसला बहुत सोच-विचार के बाद हुआ है। हो सकता है कि वे लंबे समय से सोच-विचार कर रहे हों। लेकिन जो फैसला किया है उसके समय के चयन पर हर किसी को आश्चर्य है।

यही समय क्यों चुना? 2019 का चुनाव एक साल से भी ज्यादा समय बाद होना है। फिर भी इसी समय यह फैसला करना यह बताता है कि उद्धव ठाकरे बेहद बेचैन हैं। न होते तो इसे उचित समय पर घोषित करते।

इस समय का चयन क्यों किया? इस बारे में अनुमान लगाए जा सकते हैं। अपने नेतृत्व के बारे में भ्रम दूर करने का यह एक अवसर उन्होंने समझा।

उद्धव ठाकरे समझते हैं कि उनकी छवि समझौतावादी हो गई है। अपने पिता और शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे की छवि को वे जीना चाहते हैं।

“यही समय क्यों चुना? 2019 का चुनाव एक साल से भी ज्यादा समय बाद होना है। फिर भी इसी समय यह फैसला करना यह बताता है कि उद्धव ठाकरे बेहद बेचैन हैं।”

इसलिए औचक फैसला कर बताना चाहते हैं कि बाल ठाकरे जैसा कठोर निर्णय वे भी ले सकते हैं। महाराष्ट्र की राजनीति में बाल ठाकरे का उदय मराठी मानुष की आवाज बुलंद करने के कारण हुआ। उसे दूसरे तरह से भी लोग देखते रहे हैं।

लेकिन वह समय बीत गया है।जो बीत गया है उसे लौटाने का अर्थ है, एक त्रासदी को जन्म देना। क्या उद्धव ठाकरे उस तरफ बढ़ रहे हैं? भाजपा और शिवसेना के विचारों में टकराव नहीं है।

इस आधार पर इनमें  एकता मजबूत होनी चाहिए थी। लेकिन जब वह टूट के कगार पर है तो उसका असली कारण वर्चस्व का संघर्ष है। भाजपा की बढ़त से शिवसेना सजग हो गई है। उसको सूझ रहा है कि शिवसेना को भाजपा खा जाएगी।

जाहिर है, यह राजनीतिक दौड़ में पिछड़ने की खीझ है। शिवसेना इस नतीजे पर पहुंची है कि संबंध तोड़कर ही वह अपना अस्तित्व बचा सकेगी। ऐसी समझ को आत्मघाती ही माना जाएगा।

पाठक की प्रतिक्रिया

Please enter your comment!
Please enter your name here