मोदी की नेपाल तीर्थ-यात्रा

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह राजनीति ही नहीं, राजनय की भी शैली बदल दी है, उनकी 11-12 मई की नेपाल यात्रा से समझा जा सकता है। अब तक कांग्रेस राजनीति और धर्म को अलग-अलग खानों में रखकर देखती रही। देश की राजनीति से बहुसंख्यक हिंदू समाज के धार्मिक आग्रहों को अलग रखने के लिए इंदिरा गांधी ने संविधान में संशोधन करके राज्य को सेक्युलर भी घोषित करवा दिया था।

इन सब विधायी व्यवस्थाओं को बिना बदले नरेंद्र मोदी ने भारत में राजनीति का स्वरूप ही बदल दिया। उन्होंने गुजरात छोड़कर काशी से चुनाव लड़ा और राजनीति व धर्म के बीच खींची जाती रही रेखा निरर्थक कर दी। वही उन्होंने राजनय में भी किया है।

नरेंद्र मोदी की इस बार की नेपाल यात्रा को अनेक टिप्पणीकारों ने तीर्थ-यात्रा कहा है। उनकी इस यात्रा के दौरान जितनी चर्चा उनकी जनकपुर धाम मंदिर, मुक्तिनाथ और पशुपतिनाथ मंदिरों में भक्तिभाव से की गई पूजा-अर्चना की हुई, उतनी दोनों सरकारों के बीच हुए समझौतों की नहीं हुई।

इन तीनों तीर्थों में जितनी श्रद्धा नेपालवासियों की है, उतनी ही भारतवासियों की भी है। समूचे भारत से प्रति वर्ष हजारों श्रद्धालु भारतीय इन तीर्थों में जाते हैं। उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक इन तीर्थों की एक-सी प्रसिद्धि रही है। पिछले सात दशक में दोनों देशों के राजनैतिक प्रतिष्ठान में एक-दूसरे के प्रति भले ही कुछ पूर्वाग्रह बने रहे हों, भारत और नेपाल की जनता को दोनों देशों के तीर्थों ने एक सूत्र में बांधे रखा है।

 नरेंद्र मोदी की पिछले चार वर्षों में यह तीसरी नेपाल यात्रा थी। अपनी पिछली यात्राओं में हो सकता है, उन्होंने इन तीर्थों में जाने की इच्छा प्रकट की हो। लेकिन नेपाल का प्रधानमंत्री बनने के बाद अपनी पहली यात्रा पर आए खड़्ग प्रसाद शर्मा ओली ने स्वयं नरेंद्र मोदी को जनकपुर और मुक्तिनाथ मंदिर में आने का निमंत्रण दिया था।

यह उल्लेखनीय है कि एक कम्युनिस्ट होने के बावजूद उन्हें यह निमंत्रण देने में कोई दुविधा नहीं हुई। नरेंद्र मोदी ने भी अपने आपको केवल विग्रह दर्शन और औपचारिक पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं रखा।

“जनकपुर के बाद नरेंद्र मोदी मुक्तिनाथ गए, जिसे वैष्णव और बौद्ध एक सी श्रद्धा से देखते हैं। इस अत्यंत प्राचीन मंदिर में भगवान विष्णु का स्वर्ण विग्रह है और मुक्तिनाथ के गीत दक्षिण के आलवारों ने भी गाए हैं।”

उन्होंने मुक्तिनाथ मंदिर में ढोल बजाया और जानकीनाथ मंदिर में मंजीरा। उन्होंने सभी मंदिरों में पूरे भक्तिभाव से पूजा की। संघ और भाजपा में इस शैली को सांस्कृतिक बताने की परंपरा रही है। लेकिन तीर्थों में विराजमान देव सत्ताओं के प्रति समर्पण एक धार्मिक क्रिया है। भारतीय सभ्यता में राजनीति, संस्कृति और धर्म अलग-अलग करके नहीं देखे गए क्योंकि जीवन को एक नैतिक अनुशासन से जोड़ना ही राजनीति, संस्कृति और धर्म तीनों का अंतर-भाव है।

भारत के प्रधानमंत्री को हमारी इसी सभ्यता का वाहक होना चाहिए। लेकिन यह परिपाटी आरंभ करने में सात दशक व्यतीत हो गए। नरेंद्र मोदी को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने बिना किसी विवाद को छेड़े सहज भाव से हमारी राजनीति और राजनय की यह दिशा स्थिर कर दी है। भारत और उसके आस-पड़ोस के वृहत समाज को हमारी सभ्यता की इन्हीं प्रवृत्तियों ने अनंतकाल से एक सूत्र में बांधे रखा है।

नरेंद्र मोदी की नेपाल में बरती गई राजनय की इस शैली के निश्चय ही बहुत गंभीर राजनीतिक उद्देश्य भी थे। पिछले चुनाव ने नेपाल की कम्युनिस्ट धारा को बहुत ताकतवर बना दिया है। पिछला चुनाव नेपाल की दो बड़ी कम्युनिस्ट पार्टियों ने मिलकर लड़ा था और यह घोषणा की थी कि चुनाव के बाद दोनों कम्युनिस्ट पार्टियां परस्पर विलय के द्वारा एक हो जाएंगी।

इससे नेपाल के लोगों में यह संदेश गया कि कम्युनिस्ट शासन नेपाल को राजनीतिक स्थिरता दे सकता है, जो राजशाही की विदाई के बाद अनुपस्थित रही है। चुनाव में दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों को दो तिहाई से थोड़ा ही कम बहुमत मिला। सात महीने लंबी खींचतान के बाद नरेंद्र मोदी की नेपाल यात्रा के एक सप्ताह बाद दोनों पार्टियों का औपचारिक विलय भी हो गया। नेपाल के कम्युनिस्टों का एक बड़ा वर्ग चीन के प्रति झुका रहा है।

भारत से निकटता जताने वाली नेपाली कांग्रेस की शक्ति सीमित हो गई है। नेपाल के कम्युनिस्टों की इस सर्वग्रासी शक्ति को संतुलित करने के लिए राजनीति से बाहर की किसी शक्ति का ही सहारा लिया जा सकता था। यह शक्ति लोगों के धार्मिक विश्वासों में ही खोजी जा सकती है। नरेंद्र मोदी ने अपनी इस नेपाल यात्रा में उसी का सहारा लिया है।

भारत का शक्तिशाली प्रधानमंत्री नेपाल की देव सत्ताओं की अनुकूलता प्राप्त करता दिखाई दे, यह साधारण बात नहीं है। इससे नेपाली समाज अपनी सभ्यतागत निष्ठाओं की ओर मुड़ने के लिए निश्चय ही प्रेरित होगा। इसलिए नरेंद्र मोदी के इस धार्मिक अनुष्ठान के अत्यंत महत्वपूर्ण राजनीतिक उद्देश्य थे।

 नरेंद्र मोदी इस बार की यात्रा में पहले सीधे जनकपुर गए। जनकपुर नेपाल में तराई का, विराट नगर और वीरगंज के बाद तीसरा सबसे बड़ा नगर है। उसकी प्राचीन ख्याति महाराजा जनक की राजधानी के रूप में रही है। जनकपुर का पुराना नाम भी जनकपुर धाम ही था। यहीं जानकी जी का भव्य मंदिर है।

वह मंदिर तो प्राचीन है, लेकिन अभी के भव्य मंदिर को 1910 में भारत में मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ की महारानी वृषभानु ने बनवाया था। यह ख्याति है कि महाराजा जनक को हल जोतते हुए सीताजी प्राप्त हुईं थीं। यहीं जनकपुर में उनका विवाह हुआ। इसलिए इस क्षेत्र की विशेष प्रतिष्ठा रही है।

भारत में बिहार में सीतामढ़ी को भी जानकी जी के जन्म स्थान के रूप में देखा जाता रहा है। लेकिन उस तरह की समानांतर मान्यताएं होती हैं। नरेंद्र मोदी ने मंदिर जाकर न केवल पूजा-अर्चना की, बल्कि सीताराम जप भी किया। इससे निश्चय ही उनके प्रति विशेष रूप से तराई के लोगों में गहरी आत्मीयता जगी होगी। भारत और नेपाल के संबंधों में तराई के कारण दरार पड़ती रही है।

1950 में भारत सरकार और नेपाल की राणाशाही के बीच मैत्री संधि हुई थी। बाद में भारत की सहायता से वहां शाह वंश का राज्य बहाल हुआ। लेकिन नेपाली राजा निरंतर यह ग्रंथि पाले रहे कि तराई में आकर बसे लोगों

के भारत से सामाजिक संबंध हैं और उनके द्वारा भारत-नेपाल को आत्मसात कर सकता है। भारत में विलय का प्रस्ताव राणाशाही ने दिया था, जिसे ठुकरा दिया गया था। इसलिए इस आशंका की कोई जगह नहीं होनी चाहिए थी।

“यूरोपीय शक्तियां नेपाल पर यह दबाव डाल रही हैं कि वह अपने संविधान में धर्मांतरण की छूट को स्थायी बनाने की व्यवस्था करे। धर्मांतरण पर अंकुश लगाने में पिछले दिनों चीन के कम्युनिस्ट नेता भी सक्रिय रहे हैं। नेपाल के कम्युनिस्ट नेता भी धर्मांतरण के खतरे को पहचानते हैं।”

तराई नेपाल की 20-30 किलोमीटर चौड़ी वह मैदानी पट्टी है, जो भारत और नेपाल के बीच की सीमा को बिल्कुल अनौपचारिक बनाए हुए हैं। दोनों देशों के बीच हुई संधि के अनुसार उनके नागरिक बिना किसी रोक-टोक एक-दूसरे के देश में आ-जा सकते हैं। तराई के लोगों का भारतीय सीमा में रहने वाले लोगों से नित्य परिवार जैसा संबंध है।

इसलिए नेपाल का पूरा राजनैतिक प्रतिष्ठान उनके प्रति पूर्वाग्रह पाले रहा है और उन्हें नागरिकता देने से हिचकिचाता रहा है। जबकि तराई के जंगलों को काटकर यहीं के लोगों ने तराई को कृषि योग्य बनाया। तराई ही नेपाल के आर्थिक जीवन की रीढ़ है। कृषि से लगाकर कल-कारखानों तक नेपाल का अधिकांश अर्थतंत्र तराई में ही है। भारत इस मधेश क्षेत्र के लोगों के राजनैतिक अधिकारों के लिए सदा आग्रहशील रहा है।

पहले लोकतांत्रिक और फिर कम्युनिस्ट जन-आंदोलनों के दौरान तराईवासियों को राजनीतिक अधिकार देने के वायदे किए गए। उन पर अमल भी हुआ, लेकिन तराई के लोग पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं। नए संविधान में अपने राजनीतिक अधिकारों के समावेश के लिए 2015 में तराई के संगठनों ने जो आंदोलन किया था, उसने सीमावर्ती व्यापार को ठप कर दिया।

ओली सरकार ने उसका दोष भारत सरकार पर डाला और तब से ओली और भारत सरकार के बीच कुछ मन-मुटाव बना हुआ था। अपनी इस यात्रा में नरेंद्र मोदी ने जनकपुर जाकर तराई के लोगों को आश्वस्त किया कि भारत उनके साथ खड़ा है और काठमाड़ौ में नेपाली राजनीतिक प्रतिष्ठान की यह गलतफहमी दूर की कि भारत उनके आर्थिक विकास की बाधा है। नरेंद्र मोदी ने अपने अभिनंदन के उत्तर में कांठमांडो की सभा को संबोधित करते हुए कहा कि भारत विकास के शिखर पर चढ़ने में नेपाल का शेरपा होना चाहता है।

 जनकपुर के बाद नरेंद्र मोदी मुक्तिनाथ गए, जिसे वैष्णव और बौद्ध एक सी श्रद्धा से देखते हैं। इस अत्यंत प्राचीन मंदिर में भगवान विष्णु का स्वर्ण विग्रह है और मुक्तिनाथ के गीत दक्षिण के आलवारों ने भी गाए हैं। नरेंद्र मोदी पर यह आरोप तक लगा कि वे कर्नाटक चुनाव को प्रभावित करने के लिए 12 मई को मुक्तिनाथ मंदिर गए। बौद्धों में यह मान्यता है कि आठवीं शताब्दी के बौद्ध आचार्य पद्मसंभव, जिन्हें तिब्बती गुरू रिनपञ्चे, कहते हैं, ने यहां तपस्या की थी।

इसलिए यह बौद्धों का भी अत्यंत पवित्र तीर्थ है। नेपाल के जनजातीय क्षेत्रों में बौद्ध धर्म का ही प्रचार है। इसलिए यह तीर्थ वैष्णव और बौद्धों में समान रूप से लोकप्रिय रहा है। नरेंद्र मोदी ने यहां आकर न केवल वैष्णव रीति से पूजा-अर्चना की बल्कि बौद्ध रीति से भी पूजा-अर्चना की।

किसी हिन्दू के लिए यह सामान्य बात ही है क्योंकि स्वयं भगवान बुद्ध ने अपने मार्ग को सनातन धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा ही बतायाथा। मुक्तिनाथ मंदिर में बौद्ध रीति से पूजा-अर्चना करके मोदी ने नेपाल के जनजातीय समाज से भी अपने आत्मीय संबंध बना लिए। नेपाल में बौद्ध आबादी नौ प्रतिशत से अधिक है।

मुक्तिनाथ मंदिर के बाद नरेंद्र मोदी ने काठमाड़ौ आकर पशुपतिनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना की। यहां वे अपनी पिछली नेपाल यात्राओं में भी पूजा-अर्चना करते रहे थे। पशुपतिनाथ शैव तीर्थ है और उसकी नेपाल के साधारण लोगों से लगाकर नेपाल राजपरिवार तक में गहरी प्रतिष्ठा है। भारत के लोगों के लिए भी पशुपतिनाथ मंदिर उनके केंद्रीय तीर्थों में गिना जाता रहा है।

 मोदी की इस नेपाल यात्रा में आर्थिक और राजनैतिक विषयों का भी समावेश था। कुछ समय पहले जब नेपाल के प्रधानमंत्री ओली भारत की यात्रा पर आए थे तो दोनों देशों के बीच बिहार के रक्सौल से नेपाल की राजधानी काठमाड़ौ तक रेल लाइन बिछाने का समझौता हुआ था।

इस यात्रा के दौरान उस पर तेजी से आगे बढ़ने का निर्णय हुआ। दरअसल चीन पहले ही तिब्बत में ल्हासा से कांठमाडो तक रेल लाइन बिछाने की परियोजना शुरू कर चुका है। चीन उसे 2022 तक पूरी कर लेना चाहता है। इससे चीन और नेपाल के बीच न केवल व्यापार सुगम होगा, बल्कि चीन की इस क्षेत्र में सामरिक उपस्थिति भी आसान हो जाएगी।

इसी दृष्टि से भारत इस परियोजना को लेकर अपनी आपत्ति जता रहा है। नेपाल सरकार भारत को संतुष्ट करने के लिए रक्सौल-कांठमाड़ो रेल लाइन पर तेजी से काम शुरू करवाने के लिए तैयार हुई है। भारत ने नेपाल को जल मार्गों के जरिये अपने व्यापार में वृद्धि का प्रस्ताव रखा है। अभी वह कलकत्ता की गोदी का उपयोग करता है। भारत बिहार में कालूघाट से जल मार्ग विकसित कर नेपाल की व्यापारिक सुविधाओं में वृद्धि करना चाहता है। जल मार्ग से परिवहन और माल ढुलाई काफी सस्ती पड़ती है।

अपनी इस यात्रा के दौरान नरेंद्र मोदी ने अरुण जल विद्युत परियोजना के तीसरे चरण का भी उद्घाटन किया। इस परियोजना से 900 मेगावाट बिजली पैदा होगी। इस परियोजना से नेपाल को न केवल बिजली मिलेगी, बल्कि वह भारत को भी दी जाने वाली बिजली पर करों के जरिये अरबों डॉलर कमा सकेगा। नेपाल में जल विद्युत परियोजनाओं के विस्तार की काफी गुंजाइश है। लेकिन बीच-बीच में छिड़ते रहने वाले राजनैतिक विवादों के कारण नेपाल की इस क्षमता का पूरा लाभ नहीं उठाया जा पाता।

इन सब आर्थिक योजनाओं का नेपाल के विकास दृष्टि से बहुत महत्व है। लेकिन उनकी अधिक चर्चा राजनीतिक प्रतिष्ठान में ही हुई। रेल लाइन को लेकर अवश्य नेपाल के सामान्य लोगों में उत्साह दिखा। पर नरेंद्र मोदी को अधिक उत्साह जनकपुर में दिखाई दिया, जहां से अयोध्या तक के लिए एक विशेष बस सेवा शुरू की गई है। इस बस सेवा को मैत्री बस सेवा का नाम दिया गया है।

मोदी ने कहा कि वे जनकपुर को रामायणकालीन पंद्रह क्षेत्रों की परिक्रमा से जोड़ना चाहते हैं। इससे धार्मिक पर्यटन को काफी गति मिलेगी। नरेंद्र मोदी द्वारा अपनी यात्रा को एक विशेष तीर्थयात्रा बनाने में नेपाल के कम्युनिस्टों ने एक और कारण से कोई आपत्ति नहीं की।

नेपाल में सक्रिय यूरोपीय शक्तियां उस पर यह दबाव डाल रही हैं कि नेपाल के संविधान में धर्मांतरण की छूट को स्थायी बनाने की व्यवस्था की जाए। धर्मांतरण पर अंकुश लगाने में पिछले दिनों चीन के कम्युनिस्ट नेता भी सक्रिय रहे हैं। नेपाल के कम्युनिस्ट नेता भी धर्मांतरण के खतरे को पहचानते हैं। इसलिए वे संविधान में नेपाल को सेक्युलर घोषित करने के बावजूद धर्मांतरण संबंधी छूट के लिए तैयार नहीं हैं।

भारत ने नेपाल की लोकतांत्रिक शक्तियों को बढ़ावा देने में यूरोपीय शक्तियों से सहयोग किया, लेकिन भारत की वर्तमान सरकार यह नहीं चाहेगी कि सेक्युलर राजनीति के नाम पर नेपाल में धर्मांतरण की छूट दी जाए। इस दृष्टि से भी वहां के लोगों के धार्मिक विश्वास को और दृढ़ करना आवश्यक था। इन सब कारणों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह नेपाल यात्रा राजनय के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ने वाली सिद्ध होगी।

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