मैं अडयार बोल रही हूं

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मैं अडयार नदी हूं। दक्षिण के महानगर चेन्नई की जीवन-रेखा भी कहते हैं मुझे। मैं भी जीवन-रेखा ही बनी रहना चाहती हूं लेकिन लोग हैं कि अपने जीवन को सुविधाजनक बनाने के लिए मेरी रेखा को ही छोटा करते जा रहे हैं।

कभी भी नहीं चाहा था मैंने कि हवाई जहाज और ट्रेन, नावों की तरह मुझ पर बहती नजर आएं। वे तो आसमान में और मुझ पर बनाए गए पुलों के ऊपर से गुजरती ही ठीक लगतीं हैं। मैंने कभी नहीं चाहा था कि यह महानगर टापू में तब्दील हो जाए और समुद्र का आर्थिक दोहन करते-करते सागर का ही एक हिस्सा नजर आने लगे।

आज हर शख्स मुझे देख कर डर रहा है। अपनी मां को देखकर डर रहा है? मेरे इन बच्चों को मुझ पर तब दया नहीं आई, जब मेरे पाट पर ही पूरा हवाई अड्डा तैयार किया जा रहा था। क्या स्मार्ट सिटी के रास्ते पर तेजी से दौड़ते इस शहर को नहीं पता कि पूरा महानगर ही नमभूमि और कच्छ-भूमि पर बसा है? मुझे लगातार मेरे प्राकृतिक चरित्र से दूर करने की कोशिश की जा रही है।

धरती की तरह ही मेरा धर्म है सहना, तो सह रही हूं, लेकिन एक करोड़ से अधिक की आबादी का बोझ ढोते-ढोते मेरे आस-पास की आर्द्र जमीन की सोखने की क्षमता बेहद कम हो गई है। सुप्रीम कोर्ट भी इस पर चिंता जाहिर कर चुका है। एक करोड़ में से करीब 30 लाख तो झुग्गियों में रहते हैं। सबसे ज्यादा झुग्गियां तो मेरी जमीन पर अतिक्रमण करके ही बनी हैं।

यह आपदा मेरी लाई हुई नहीं है, यह तो उन किसानों का श्राप है, जिनका पानी चेन्नई ने छीना है। मैं तो बस यही कहना चाहती हूं। मैं मां हूं, मैंने अपने बच्चों को नहीं मारा। मैं तो चेन्नई की जीवन-रेखा हूं और जीवन-रेखा बनी रहना ही चाहती हूं।

इस महानगर के करीब हजार किमी लंबे सीवेज तंत्र में हजारों छेद हैं, कई जगह तो सीवेज का मुंह मेरी धारा में लाकर छोड़ दिया गया है, मौजूदा सीवेज सिस्टम भी मात्र दस लाख लोगों के जल मल को संभाल पाता है। बाकियों का मल-मूत्र शहर के बीचों-बीच बहने वाली कूवम नदी, मेरे और भगवान भरोसे है।

अब सोचिए मेरे पास विकल्प क्या था, लगातार होती बारिश से इन नालों में बहाव बढ़ गया। खुद मेरा पाट लबा-लब भर गया। अब बहने की जगह पहले ही कम थी, रास्ते में कई जगह बाधाएं खड़ी थी। गाद सफाई का सिर्फ बजट होता है, गाद निकाली नहीं जाती। गाद जमा होने के कारण मेरी गहराई कम हो गई, जिससे पानी को बहाकर समुद्र तक ले जाने की मेरी क्षमता भी कम हो गई।

एक शोध संस्था के मुताबिक 1980 में चेन्नई में 600 जल-निकाय थे जो समय के साथ गायब हो गए। सिर्फ दो दशक पहले तक 150 से ज्यादा जलाशय अत्यधिक बारिश को मेरे साथ मिलकर संभाल लेते थे, लेकिन अब मात्र 30 जलाशय ही बचे हैं। बाकि 120 जलाशय विकास का शिकार हो गए। इन जलाशयों पर अब विकास की पताकाएं नजर आती हैं।

हालात इस कदर खराब हो गए हैं कि तमिलनाडु प्रोटेक्शन ऑफ टैंक एंड इविक्शन ऑफ इंक्रोचमेंट एक्ट पूरी तरह नाकाम साबित हुआ। जलाशयों पर अतिक्रमण बढ़ता ही गया। यहां तक कि मद्रास हाईकोर्ट ने पल्लीकरनाड़ झील के आस-पास सभी अवैध कब्जे को हटाने का सीधा आदेश दिया, लेकिन अफसोस, सब बेकार।

Heavy rains in Chennai

नदी अपना रास्ता खुद बनाती है, उसके रास्ते में कोई छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए। तलाब, कुंए, नहर बनाए जाते हैं, लेकिन मैं नदी हूं। मुझे बनाया नहीं जा सकता। मैं अवतार लेती हूं।

और जब मकान बनने लगते हैं, तो उनमें रहने वालों के लिए सड़क, बिजली, पानी जैसी मूलभूत चीजों की व्यवस्था करनी पड़ती है। अब इन व्यवस्थाओं में शहर के अधिकारी, प्रशासन, बिल्डर सभी ने अपना हित साधने के लिए सांठ-गांठ की और मेरी प्रकृति की अनदेखी की।

सोच कर देखिए, यह शहर प्राकृतिक आपदाओं को झेले तो कैसे झेले। इन आपदाओं को संभालना तो दूर यहां तो स्थिति आपदाओं को आमंत्रित करने जैसी है। 2003 में सरकार ने सभी घरों के लिए रेन वाटर हारवेस्टिंग को अनिवार्य बना दिया था, लेकिन यह जानने की कभी कोशिश ही नहीं हुई कि कितने लोग इस अनिवार्यता पर वास्तव में अमल कर रहे हैं।

जो लोग अपने सीवेज की चिंता नहीं करते, वे रेनवाटर की क्या करेंगे? यह आपदा मेरी लाई हुई नहीं है, यह तो उन किसानों का श्राप है जिनका पानी चेन्नई ने छीना है। मैं तो बस यही कहना चाहती हूं। मैं मां हूं। मैंने अपने बच्चों को नहीं मारा। मेरी झीलें वापस कर दो मैं तुम्हे हमेशा बाढ़ जैसी विभीषिका से बचाऊंगी। तुम्हें दूर-दराज के लोगों का पानी भी नहीं छीनना पड़ेगा।

अंत में एक सबक, जिसे इंसान सदियों से जानता है, लेकिन मानता नहीं। नदी अपना रास्ता खुद बनाती है, उसके रास्ते में कोई छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए। तलाब, कुंए, नहर बनाए जाते हैं, लेकिन मैं नदी हूं। मुझे बनाया नहीं जा सकता। मैं अवतार लेती हूं। मैं तुम्हारे लिए अवतरित हुई हूं। अब यह तुम पर निर्भर है कि तुम मेरे साथ कैसा सुलूक करते हो।.

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