मेवाणी कांग्रेस का दलित कार्ड!

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हाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव हिंसा की आग में घी डालने वाले गुजरात के निर्दलीय विधायक जिग्नेश मेवाणी अब राहुल गांधी की भावी दलित राजनीति का चेहरा बनने जा रहे हैं।

जनाधार वाले दलित नेताओं की कमी से जूझ रही कांग्रेस मेवाणी को दलितों का नया मसीहा मानकर चल रही है। 2019 के लोकसभा चुनाव में वह उन्हें दलित नेता के रूप में प्रस्तुत कर जीतने की जुगत भिड़ा रही है।

हालांकि जिग्नेश कांग्रेस के लिए ‘शेर की सवारी’ साबित हो सकते हैं। बताते चलें, जिग्नेश गुजरात में कांग्रेस की मदद से ही निर्दलीय विधायक बने हैं। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को समझना चाहिए कि मेवाणी में एक राजनीतिज्ञ बनने के लक्षण नहीं हैं।

वह जेएनयू के कन्हैया कुमार की तरह एक आंदोलनकारी हो सकते हैं, राजनीतिज्ञ नहीं। मेवाणी सड़क पर संघर्ष कर न्याय पाना चाहते हैं। उन्हें यह बताना चाहिए कि आखिर न्याय किससे और संघर्ष किससे?

राहुल गांधी को भी समझना चाहिए कि आपत्तिजनक भाषा, संभव है कि दलितों के एक हिस्से को प्रभावित करे, लेकिन उसके कारण अन्य जातियों का बड़ा हिस्सा कांग्रेस से छिटक सकता है।

“मेवाणी को ध्यान रखना होगा कि राजनीति में उम्र की कोई सीमा नहीं होती है। केवल युवा होना किसी पार्टी का नेतृत्व करने के लिए पर्याप्त नहीं है।”

यह सही है कि दलितों के साथ वर्षों तक अन्याय  हुआ लेकिन यह भी सही है कि इस देश में छह दशक तक कांग्रेस का ही शासन रहा लेकिन उसने उनकी पीड़ा को खत्म करने का प्रयास नहीं किया।

केंद्र में उसकी सरकार रही, राज्यों में उसने काफी समय तक शासन किया। लेकिन उसने दलितों के साथ अन्याय के मूल कारणों को न खोजा और न ही खत्म किया। वह उन्हें केवल वोट बैंक समझती रही।

बाबू जगजीवन राम और के कामराज जैसे बड़े नेता भी कांग्रेस में रहे, शासन में रहे, तब भी दलितों पर अत्याचार को नहीं रोका जा सका। कांग्रेस देश में अपने जनाधार का विस्तार करने के लिए बेताब है। दलित, ब्राह्मण और मुसलमान इसका वोट बैंक रहे और उनके सहारे सालों तक शासन किया।

लेकिन समय के साथ उसका यह जातीय गठजोड़ छीजता गया। यह वोट बैंक क्षेत्रीय दलों और नेताओं के साथ चला गया। दलितों का बड़ा हिस्सा अब कांग्रेस के पास नहीं है।

इसी तरह मुसलमान भी क्षेत्रीय स्तर पर उन दलों के पास चला गया जिन्होंने उसका तुष्टीकरण किया। हालांकि कांग्रेस भी मुस्लिम तुष्टीकरण में पीछे नहीं रही। 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद समीक्षा के लिए बनी एके. एंटनी समिति ने भी इस ओर संकेत किया था।

कहा गया था कि हार के कारणों में यह बड़ा कारण था। इसलिए राहुल गांधी ने गुजरात चुनाव में इससे किनारा कर लिया। उन्होंने नरम हिंदुत्व का सहारा लिया। पूरे चुनाव प्रचार में उन्होंने कई मंदिरों में दर्शन किया लेकिन मुस्लिम बहुल इलाकों की ओर झांका तक नहीं।

“राहुल गांधी को भी समझना चाहिए कि आपत्तिजनक भाषा, संभव है कि दलितों के एक हिस्से को प्रभावित करे, लेकिन उसके कारण अन्य जातियों का बड़ा हिस्सा कांग्रेस से छिटक सकता है।”

कांग्रेस के साथ एक बड़ी दिक्कत है। इस समय उसके पास कोई बड़ा जनाधार वाला दलित नेता नहीं है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और केंद्र में मंत्री रहे सुशाल कुमार शिंदे कभी बड़े दलित नेता नहीं रहे। उनका सीमित प्रभाव महाराष्ट्र तक है।

उसी प्रकार मल्लिकार्जुन खड़गे भी भले ही लोकसभा में कांग्रेस संसदीय दल के नेता हैं लेकिन दलितों में उनकी सीमित ‘अपील’ है। हरियाणा की रहने वाली पूर्व केंद्रीय मंत्री कुमारी शैलजा की ‘अपील’ भी हरियाणा से बाहर नहीं है।

ऐसे में जिग्नेश मेवाणी में कांग्रेस बड़े दलित नेता की संभावना तलाश रही है।मेवाणी इधर कई कारणों से चर्चा में रहे हैं। उना की घटना के बाद विवाद में आए जिग्नेश पर भीमा कोरेगांव में हिंसा भड़काने का आरोप है।

उन्होंने विधायक बनने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर विवादास्पद बयान दिया। उन्होंने कहा कि मोदी बूढ़े हो चले हैं, उन्हें हिमालय जाकर हड्डियां गलानी चाहिए।

मेवाणी को ध्यान में रखना होगा कि राजनीति में उम्र की कोई सीमा नहीं होती है। केवल युवा होना किसी पार्टी का नेतृत्व करने के लिए पर्याप्त नहीं है, उस युवा के लिए तो कतई नहीं संभव है जो जाति, धर्म और क्षेत्र के संकीर्ण दायरे में रहता है।

बेहतर होगा कि राहुल गांधी सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने वाले ‘शेर’ की सवारी करने से परहेज करें।  

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दैनिक अखबार ‘स्टेट्समैन’ से श्री सहाय ने पत्रकारीय जीवन की शुरुआत की। वे करीब तीन दशक तक स्टेट्समैन से जुड़े रहे। इस दौरान सहाय ने जो खबरें की, उससे उनकी स्वतंत्र पहचान बनी। ‘यथावत’ के शुरुआती दिनों से ही मोहन सहाय बतौर सलाहकार संपादक पत्रिका से जुड़े हैं।

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