मिथ नहीं, सच

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राहुल गांधी से ऐसी उम्मीद नहीं थी। बेहतर की थी। कांग्रेस का अध्यक्ष पद संभालते ही उन्हें सरदार पटेल संबंधी नेहरू परिवार की भूलों के लिए माफी मांगनी चाहिए थी। इससे वे राजनीति में एक नया उदाहरण पेश करते। वह एक आदर्श स्थिति होती। ऐसा न कर अध्यक्ष बनने पर अपने पहले इंटरव्यू में उन्होंने परिवार की भूलों पर लीपापोती की। जफर आगा ने सवाल कुछ और पूछा था। राहुल गांधी ने जवाब दूसरा दिया।

नेशनल हेराल्ड को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि ‘गुजरात में मैंने अनुभव किया कि एक मिथ बना दिया गया है कि सरदार पटेल और नेहरू में गहरे मतभेद थे। यह सरासर झूठ है।’ राहुल गांधी की समझ से नेहरू और पटेल मित्र थे। राहुल गांधी का यह कहना उनके अज्ञान का द्योतक है। थोड़ी सी कोशिश और पढ़ाई से वे अपना यह अज्ञान दूर कर सकते थे। राजमोहन गांधी की सरदार पटेल पर लिखी किताब को उन्हें सिर्फ पढ़ना भर पड़ता। अभी भी देर नहीं हुई है।

वे अगर सरदार पटेल की जीवनी पढ़ सकें तो उन्हें दो बातें सबसे पहले मालूम होगी। पहली कि महात्मा गांधी ने सरदार पटेल के साथ जो अन्याय किया उसकी भरपाई करने के लिए उनके पोते राजमोहन गांधी ने यह किताब लिखी।

“महात्मा गांधी ने कैसे, कब और क्यों सरदार पटेल के साथ अन्याय
किया ? इसका जवाब कांग्रेस के इतिहास में छिपा हुआ है।”

सरदार पटेल की यह सबसे प्रामाणिक जीवनी है। जैसे राजमोहन गांधी ने प्रायश्चित किया है वैसा ही राहुल गांधी कर सकते थे।इस किताब से उनको दूसरी बात यह समझ में आएगी कि जवाहर लाल नेहरू ने सरदार पटेल की भ्रामक छवि बनाई और बनवाई।

उनके तीनमूर्ति स्थित निवास से सरदार पटेल के विरूद्ध षड़यंत्र हुए। मनिबेन की डायरी में इसके प्रमाण कदम-कदम पर हैं। जिसका सहारा लेखक राजमोहन गांधी ने अपनी किताब में जगह-जगह लिया है। अपने साथ हुए अन्यायों के प्रति सरदार पटेल का रूख क्या था, यह जानना उनके बड़प्पन से साक्षात्कार करना है।

महात्मा गांधी ने कैसे, कब और क्यों सरदार पटेल के साथ अन्याय किया? इसका जवाब कांग्रेस के इतिहास में छिपा हुआ है। बारदोली के सफल सत्याग्रह से वल्लभ भाई पटेल को देश का सरदार माना गया। उनके नेतृत्व में किसानों ने अपनी लड़ाई जीती थी।

उसका पूरे देश पर चमत्कारिक प्रभाव पड़ा था। सरदार पटेल को इसके लिए बधाई देने वालों में लाला लाजपत राय सहित उस समय के सभी बड़े नेता थे। इसी से उनकी ख्याति के शिखर का अनुमान लगाया जा सकता है।  

ऐसे ख्यातिलब्ध नेता का हक बनता था कि 1929 में उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष पद सौंपा जाता। यही तब सर्वसम्मत इच्छा भी थी। लेकिन उनका हक मारकर महात्मा गांधी ने मोती लाल नेहरू के बेटे को अध्यक्ष बनवाया।

इसी तरह महात्मा गांधी के कारण दो बार और उन्हें अध्यक्ष बनने से वंचित रहना पड़ा। 1946 में तो हद ही हो गई। जब ज्यादातर प्रदेश कांग्रेस कमेटियों से सरदार पटेल का नाम आया, लेकिन अध्यक्ष बनाए गए जवाहरलाल नेहरू। उस समय कांग्रेस का अध्यक्ष बनने का अर्थ ही दूसरा था। जो अध्यक्ष बनता वही प्रधानमंत्री पद पाता। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने ठीक ही टिप्पणी की कि ‘पटेल को प्रधानमंत्री बनाया जाना चाहिए था और जवाहरलाल नेहरू को विदेश मंत्री।’

“सरदार पटेल पर राहुल गांधी का कथन उनके अज्ञान का
द्योतक है। थोड़ी सी कोशिश और पढ़ाई से वे अपना यह अज्ञान
दूरकर सकते थे। राजमोहन गांधी की सरदार पटेल पर लिखी किताब
को उन्हें सिर्फ पढ़ना भर पड़ता।”

इन अवसरों पर सरदार पटेल ने गांधी जी का फैसला माना। कोई शिकवा-शिकायत नहीं की। क्या जवाहरलाल नेहरू भी ऐसा करते? इसमें गांधीजी को ही संदेह था। सरदार के इस महामना व्यक्तित्व का जैसा आदर होना चाहिए वैसा न तो नेहरू की सरकार ने किया और न कांग्रेस ने। यह अब रहस्य नहीं रहा।

कांग्रेस के अध्यक्ष रहे एस. निजलिंगप्पा ने जब देखा कि सरदार पटेल की कांग्रेस सरकार उपेक्षा कर रही है तब उन्होंने एक सोसायटी बनवाई। जिसने सरदार पटेल के वांगमय को पंद्रह खंडों में छपवाया। जिसकी देशभर में प्रसंशा हुई। मनिबेन की डायरी को भी एक खंड में शामिल किया गया।

राहुल गांधी उस डायरी को पढ़ें तो उन्हें अपने कहे का खोखलापन नजर आएगा। नेहरू और पटेल में बड़े सवालों पर वैचारिक मतभेद बहुत गहरे थे। विचारों की खाई के आर-पार वे खड़े थे। कश्मीर, हैदराबाद, विदेश नीति, हिन्दू-मुस्लिम समस्या-खासकर शरणार्थियों को लेकर और तिब्बत के सवाल पर सरदार सही थे और नेहरू भ्रम में थे। इसी मतभेद के चलते सरदार पटेल नेहरू मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना चाहते थे। गांधीजी ने रोका। उनकी हत्या के बाद सरदार पटेल ने उन्हें दिया हुआ वचन निभाया। क्या राहुल गांधी इस सरदार को कभी समझ सकेंगे?

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विश्वसनीयता और प्रामाणिकता राय की पत्रकारिता की जान है। हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषीय न्यूज एजेंसी से उन्होंने पत्रकारिता में कदम रखा था। वे जनसत्ता के चुने हुए शुरुआती सदस्यों में एक रहे हैं। राय ‘जनसत्ता’ के ‘संपादक, समाचार सेवा’ के रूप में संबद्ध रहे। चार वर्षों तक पाक्षिक पत्रिका ‘प्रथम प्रवक्ता’ का संपादन किया। फिलहाल ‘यथावत’ के संपादक हैं।

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