‘अगस्त क्रांति’ से पहले का समय

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सबसे कठिन समय था। आजादी के आंदोलन के लंबे इतिहास में 1942 का वह समय विकट समस्याओं से घिरा हुआ था। कभी उतना विकट समय नहीं आया।

विश्व युद्ध का वह समय था। नेतृत्व दुविधा में था। अंग्रेज भारत का सहयोग अपनी शर्तों पर चाहते थे। लोग अंग्रेजों से मुक्ति चाहते थे। वे अंग्रेजों के मुकाबले जापानियों की तरफ झुक रहे थे। ऐसे समय में अकेले महात्मा गांधी ही थे जो पूरे संकट को ठीक से समझ पा रहे थे।

विश्व युद्ध के दौरान भारत से सुदूर पूर्व ब्रिटेन की बुरी हालत हो रही थी। उस समय अपने मित्र देशों के दबाव में अंग्रेजों ने स्टेफर्ड क्रिप्स को भारत भेजा। वह मात्र दिखावा और छलावा था। उसका आजादी देने से कोई सीधा वास्ता नहीं था।

क्रिप्स मिशन फेल हुआ। उसके आने और उसके खोखलेपन को अनुभव कर लेने के बाद महात्मा गांधी का अंग्रेजों के प्रति दृष्टिकोण बदला। वे इस बात पर विचार करने लगे कि क्या होना चाहिए? उस समय भारत पर जापानी हमले का खतरा भी मंडरा रहा था। इस कारण कांग्रेस का नेतृत्व बड़े असमंजस में था। लेकिन महात्मा गांधी ने सोचसमझकर कहा कि अंग्रेजों को भारत तत्काल छोड़ देना चाहिए। इसी में पूरी दुनिया का हित है।

क्रिप्स मिशन फेल हुआ। उसके आने और उसके खोखलेपन को अनुभव
कर लेने के बाद महात्मा गांधी का अंग्रेजों के प्रति दृष्टिकोण बदला। महात्मा गांधी
ने सोचसमझकर कहा कि अंग्रेजों को भारत तत्काल छोड़ देना चाहिए।

वे यह समझते थे कि अंग्रेज अगर भारत से चले जाएंगे तो नई परिस्थिति पैदा होगी। लेकिन उनके इस मत पर कांग्रेस नेतृत्व में ही कई संदेह थे। इस अर्थ में भी वह कठिन समय था। उसमें बिना धीरज खोये गांधीजी ने अपने सहयोगियों को समझाया। लोगों को तैयार किया। यही प्रक्रियाभारत छोड़ो आंदोलनमें जाकर पूरी हुई।

उसका विवरण रोचक भी है और इतिहास की विडंबना को उजागर करने वाला भी है। इसकी शुरुआत अप्रैल में हुई। 1942 के अप्रैल में कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना अब्दुल कलाम आजाद ने कार्यसमिति बुलाई। वह इलाहाबाद में हुई। वे चाहते थे कि गांधीजी भी उसमें शरीक हों। पर गांधीजी उसमें गए नहीं।

इस बारे में गांधीजी ने तीन पत्र लिखे। उनसे जाने के कारण सामने आते हैं। सबसे बड़ा कारण कांग्रेस नेतृत्व से उनका मतभेद था। उन्होंने इसे कहा भी कि– ‘मैं आकर भी क्या करूंगा?’ यह एक वाक्य ही पूरी बात बताने के लिए काफी है। जैसा गांधीजी सोचते थे, वैसा ही सरदार पटेल का विचार था।

उन्हीं दिनों सरदार पटेल ने गांधीजी से पूछा कि मुझे क्या करना चाहिए तो जवाब में उन्होंने लिखा कि– ‘तुम्हें जाना चाहिए। वहां दृढ़ता से काम लो। अगर अहिंसक असहयोग का स्पष्ट प्रस्ताव स्वीकर हो तो तुम्हारा धर्म कांग्रेस से निकल जाने का ही है।

इन दो नेताओं के पत्र व्यवहार से पता चलता है कि कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना अब्दुल कलाम आजाद और पंडित नेहरू कुछ दूसरा ही सोच रहे थे, जबकि गांधी आंदोलन के पक्ष में थे। कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हुई। उसमें महात्मा गांधी ने हिस्सा नहीं लिया। उन्होंने मीरा बहन के हाथों एक मसौदा भिजवाया। उसे उसी तरह से कांग्रेस ने पारित नहीं किया। काफी फेरबदल कर दिया।

उस प्रस्ताव के पारित होने से गांधीजी खिन्न थे। उन्होंने पंडित नेहरू को लिखा किहमारे लिए मौका ऐसा आया है कि हरेक को अपना मार्ग सोच लेना है।ऐसा नहीं है कि यह बात सिर्फ कांग्रेस नेताओं की आपसी और भीतरी बात थी। वह सार्वजनिक हो गई थी। इसके दो तरह के प्रमाण मिलते हैं। कांग्रेस कार्यसमिति में किसने क्या कहा इसकी जानकारी अंग्रेजी शासन को हो गई थी। स्वयं गांधीजी ने एक ऑस्ट्रेलियाई पत्रकार से बातचीत में कहा किमुझे आपको यह बताने में कोई झिझक नहीं है कि कार्यसमिति और मेरे बीच मतभेद हैं।

नौ अगस्त की सुबह 5 बजे सोते समय गांधीजी को गिरफ्तार कर
लिया गया।तब उन्होंने एक संदेश देशवासियों को दिया किस्वतंत्रता के लिए हर
सिपाही को चाहिए कि कागज या कपड़े के एक टुकड़े परकरेंगे या मरेंगेका नारा
लिखकर उसे अपने पहनावे पर चिपका लें।

वह समय इस दृष्टि से भी विकट था कि हिन्दूमुस्लिम संबंध बिगड़ता जा रहा था। मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग कर दी थी। वह इसे हर अवसर उठाता था। जिसका अंग्रेज फायदा उठाते थे। उस समय गांधीजी मानते थे कि हिन्दूमुस्लिम एकता की जरूरत पहले से ज्यादा है। वे कोशिश भी कर रहे थे कि लोग आपसी झगड़े भुला दें। ऐसी परिस्थिति में बड़ेबड़े नेता भी दिगभ्रमित थे।

मुस्लिम लीग के दो राष्ट्र के सिद्धान्त का राजगोपालाचारी ने समर्थन किया। तब गांधीजी ने साफ शब्दों में कहा कि ब्रिटिश शासन को पहले समाप्त होना चाहिए। लेकिन मुस्लिम लीग ने गांधीजी के बारे में खूब जहर उगाला। विकट समय का एक पहलू देशी रियासतों से जुड़ा हुआ है। कुछ रियासतों में अत्याचार बढ़ गए थे। वहां स्वतंत्रता के आंदोलन का दमन हो रहा था। त्रावणकोर, मैसूर, जोधपुर जैसी रियासतों को इसी श्रेणी में मान सकते हैं।

पंजाब, राजस्थान और बंगाल के कुछ क्षेत्रों में अकाल था। वहां अंग्रेजी शासन ने जनता को सबक सिखाने के लिए अकाल को बढ़ने दिया। जो अनाज था, उसे बाहर भेजा और जो बचा वह कालाबाजारियों के हवाले हो गया। ऐसी विषम परिस्थिति में अंग्रेजी सैनिक लूटपाट में लगे थे। बंगाल में मुसीबत ज्यादा ही थी। पहले दंगे हुए और फिर अकाल पड़ा। जापानी हमले का खतरा उसके अलावा था।

ऐसी विकट परिस्थिति में देश गांधीजी के अहिंसक आंदोलन के लिए तैयार नहीं दिख रहा था। दूसरी तरफ गांधीजी यह मानते थे कि उन परिस्थितियों पर पार पाने के लिए भारत छोड़ो आंदोलन जरूरी है।

उन्होंने इस बारे में अपना मत स्पष्ट किया कि– ‘मैं हमेशा सोचता रहा कि जब तक देश अहिंसक संघर्ष के लिए तैयार नहीं है, तब तक मुझे रुकना होगा। लेकिन अब मेरे रुख में परिवर्तन हो गया है। मुझे लगता है कि अगर मैं तैयारी के लिए रुका रहा तो शायद मुझे प्रलय काल तक रुके रहना होगा, क्योंकि जिस तैयारी के लिए मैंने दुआ मांगी है और काम किया है, वह कभी हो सकता है कि हो पाए, और शायद इस बीच चारों तरफ फैलने वाली हिंसा की ज्वालाएं मुझे भी घेर लें निगल लें।

कांग्रेस में मतभेद बना हुआ ही था। उसे दूर करने के लिए जुलाई के दूसरे हफ्ते में वर्धा में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हुई। वह बैठक इसलिए बुलाई गई, क्योंकि गांधीजी ने आंदोलन छेड़ने का मन बना लिया था। वे कांग्रेस के बगैर भी आंदोलन करने के लिए तैयार हो गए थे। 14 जुलाई, 1942 को कार्यसमिति ने प्रस्ताव पारित किया। गांधीजी को आंदेालन की बागडोर दे दी।

इस अवसर को अंग्रेजों ने गवां दिया। वे बातचीत कर भारत को आजाद कर देने की घोषणा करने की बजाए दुष्प्रचार में लग गए। आरोप लगाया कि गांधी और कांग्रेस जापान समर्थक हैं। एक और योजना अंग्रेजों ने बनाई। वह यह कि गांधीजी को गिरफ्तार कर ब्रिटिश अफ्रीका के किसी स्थान पर नजरबंद कर दिया जाए। एमरी ने उस समय के वायसराय को सलाह दी कि कांग्रेस को तोड़ो। उसे बिखेरो। अंग्रेजों ने भांप लिया था कि आंदोलन छिड़ेगा।

दूसरी तरफ गांधीजी ने ब्रिटेन के मित्र देश चीन के च्यांग काई शेक और अमेरिकी राष्ट्रपति रूजवेल्ट को पत्र लिखे। उन पत्रों में एक आश्वासन था। यह बताने की कोशिश भी थी कि भारत को तुरंत स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। उन्होंने लिखा किअगर हिन्दुस्तान इसी समय आजाद हुआ तो लोगों का छिपा असंतोष जापानियों के हिन्दुस्तान की जमीन पर कदम रखने पर उनके स्वागत में टूट पड़ेगा।

पत्र व्यवहार से पता चलता है कि कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना अब्दुल कलाम आजाद
और पंडित नेहरू कुछ दूसरा ही सोच रहे थे, जबकि गांधी आंदोलन के पक्ष में थे।
कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक हुई। उसमें महात्मा गांधी ने हिस्सा नहीं लिया।

भारत छोड़ो आंदोलन जिसे कहा जाता है वह गांधीजी की नजर में खुला अहिंसक विद्रोह था। इसकी ही वे तैयारी कर रहे थे। उन्होंने बारबार यह चेतावनी भी दी कि उस आंदोलन में अगर हिंसा हुई तो उसका दोष सत्ता के सिर पर पड़ेगा। अंग्रेजी शासन इसके लिए जिम्मेदार होगा।

उन्होंने आंदोलन के लिए कुछ हिदायतें भी दी थीं। उन्होंने सरकारी दफ्तरों, कारखानों, रेलवे और डाकघर में काम करने वालों से कहा था कि वे आंदोलन में हिस्सा लें। लेकिन कोई विधिवत निर्देश उन्होंने नहीं दिए। ऐसे वातावरण में कांग्रेस का अखिल भारतीय सम्मेलन बंबई में हुआ। जिसकी तारीख थी– 7 और 8 अगस्त, 1942 भारत छोड़ो प्रस्ताव वहीं पारित हुआ।

उसके बाद 8 अगस्त को गांधीजी ने अपने संबोधन में कहा किमैं चाहूंगा कि आप अहिंसा को अपनी नीति की तरह अपनाएं। मैं इसे तो अपना धर्म समझता हूं।

गांधीजी की योजना कुछ और थी। वे समझते थे कि प्रस्ताव पारित हो जाने से ही आंदोलन शुरू नहीं हो जाएगा। उन्होंने अपने भाषण में कहा भी कि आपने अपने सारे अधिकार मुझे सौंप दिए हैं। वे वायसराय से मिलकर कांग्रेस की मांग को स्वीकार करने का अनुरोध करना चाहते थे। इस काम में उनका अनुमान था कि दोतीन हफ्ते लगेंगे। लेकिन अंग्रेजों ने उन्हें थोड़ा भी समय नहीं दिया।

जहां प्रस्ताव पारित हुआ था, वहगवालिया टैंक का मैदानथा, जिसे अबअगस्त क्रांति मैदानकहा जाता है। उसके पास ही वे ठहरे हुए थे। वहां उन्हें 5 बजे सोते से जगाया गया। गिरफ्तार कर लिए गए, तब उन्होंने एक संदेश देशवासियों को दिया किस्वतंत्रता के लिए हर सिपाही को चाहिए कि कागज या कपड़े के एक टुकड़े परकरेंगे या मरेंगेका नारा लिखकर उसे अपने पहनावे पर चिपका लें।

इस संदेश को हर आदमी ने अपनी तरह से सुना और समझा। उससे ही अगस्त क्रांति घटित हुई। जिससे देश को जल्दी ही आजादी मिलने का रास्ता साफ हुआ। अगस्त क्रांति के समय नेताजी सुभाष चंद्र बोस जर्मनी में थे। उन्होंने आजाद हिन्द रेडियो की स्थापना की थी। उन्होंने समयसमय पर अगस्त क्रांति के लिए अपील की। अगस्त में उनके दो भाषण रेडियो से आए और लोगों ने सुनकर अमल किया। 

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विश्वसनीयता और प्रामाणिकता राय की पत्रकारिता की जान है। हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषीय न्यूज एजेंसी से उन्होंने पत्रकारिता में कदम रखा था। वे जनसत्ता के चुने हुए शुरुआती सदस्यों में एक रहे हैं। राय ‘जनसत्ता’ के ‘संपादक, समाचार सेवा’ के रूप में संबद्ध रहे। चार वर्षों तक पाक्षिक पत्रिका ‘प्रथम प्रवक्ता’ का संपादन किया। फिलहाल ‘यथावत’ के संपादक हैं।

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