माकपा की रामायण के मायने

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बात फरवरी 2018 की है। त्रिचूर में आयोजित माकपा के राज्य सम्मेलन में पार्टी के कामकाज पर एक आंतरिक रिपोर्ट पेश की गई थी। उसमें साफ तौर पर कहा गया था कि पार्टी को बड़े पैमाने पर लोगों के बीच जाना चाहिए।

रिपोर्ट का सार यह था कि माकपा के पारंपरिक मतदाता अलग-थलग महसूस कर रहे हैं और लोगों के बीच यह धारणा बन रही है कि पार्टी पर बुर्जुआ सोच हावी है।

खिसकते जनाधार को बचाने के लिए जिन उपायों पर चर्चा की गई, उसमें रामायण मासम का आयोजन भी था। रामायण पाठ में माकपा का प्रवेश इसी का परिणाम है।

हालांकि भारी बरसात के कारण सब कुछ तय कार्यक्रम के अनुसार नहीं हुआ फिर भी 17 जुलाई से 16 अगस्त तक राज्य भर में रामायण पाठ और परिचर्चाएं आयोजित की गयीं।

पार्टी के आनुसांगिक संगठन संस्कृत संघम के झंडे के तले संपन्न इस आयोजन की कमान राज्य समिति के सदस्य शिवदासन को दी गई थी। उन्होंने काफी पहले से वाम रुझान वाले शिक्षकों और संस्कृत के विशेषज्ञों को लामबंद करना शुरू कर दिया था।

“महाकली की पूजा के लिए फूल ले जा रहे सीताराम येचुरी की तस्वीर बताती है कि हिंदू वोटरों को लेकर पार्टी किस कदर गंभीर है। धर्म को अफीम मानने वाली माकपा के कार्यकर्ता राम-राम न कहें लेकिन रामायण पर चर्चा तो करने ही लगे हैं।”

उद्देश्य था मलयालम भाषा में रामायण के विभिन्न पक्षों पर चर्चा, लेकिन इस तरह कि हिंदू धर्म का प्रचार न लगे। ऐसा इसलिए क्योंकि माकपा रामायण को साहित्यिक कृति मानती है।

मंदिर मामलों के मंत्री के. सुरेंद्रन के अनुसार रामायण बताती है कि ‘सही अर्थों में पारिवारिक जीवन कैसे जिया जाए।’ पीडब्ल्यूडी मंत्री जी सुधाकरण के अनुसार ‘रामायण एक राजनीतिक गाइड है’।

माकपा ने जो रामायण मास आयोजित किया, मुख्य मकसद हिंदुओं को राम के ईश्वरीय प्रभाव से बाहर रखना था। सीधे-सीधे कहें तो आरएसएस और भाजपा द्वारा आयोजित रामायण मास के प्रभाव को कम करना था। लेकिन यह अकेला कारण नहीं था।

असल में 2009 के लोकसभा चुनाव में माकपा को जबरदस्त धक्का लगा, जब उसके सांसदों की संख्या 43 से घटकर मात्र 16 रह गई। तब पार्टी ने हार की समीक्षा कर एक दस्तावेज अंगीकार किया।

उसमें पार्टी को वैचारिक रूप से मजबूत बनाने पर जोर देते हुए कहा गया था कि माकपा को धर्म में आस्था रखने वालों से कोई विरोध नहीं है। शर्त यह है कि पार्टी मामलों में धर्म को नहीं लाया जाए।

वाम दलों की रिपोर्टिंग कर चुके उमाकांत लखेड़ा बताते हैं कि ‘वस्तुत: तभी पार्टी ने मान लिया था कि हिंदुओं के मन में भगवान के लिए जो आस्था है, उसे खत्म करना नामुमकिन है।’

“केरल के लोग पहले भी रामायण मासम मनाते रहे हैं, लेकिन यह कभी चर्चा का विषय नहीं रहा। इस बार इसमें माकपा कूद पड़ी, तो बहस स्वाभाविक है। ”

उल्टे इससे हिंदू खासकर निचली जातियों के लोग पार्टी से दूर होते जा रहे हैं। तबसे ही पार्टी ने धर्म को लेकर लचीला रुख अपनाना शुरू किया, लेकिन कुछ खास फायदा नहीं हुआ।

फिर 2014 के आम चुनाव के परिणाम ने रही-सही कसर भी पूरी कर दी। सिर्फ 9 सदस्य लोकसभा पहुंच पाए। इस साल हुए त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में लंबे समय से जमे माणिक सरकार भी हार गए।

अब सिर्फ केरल में माकपा की सरकार है। निश्चित रूप से पार्टी वहां हारना नहीं चाहेगी। इसके लिए बहुसंख्यक हिंदू समाज को साथ रखना आवश्यक है। लेकिन यह आसान नहीं है।  

मलयाली समाज एक कृषक समाज है। उसकी ईश्वर में गहरी आस्था है। इतने दिनों तक हिंसा के डर से अधिकांश हिंदू मंदिर जाने या पूजा-पाठ की बात से डरते थे, लेकिन अब समय बदल गया है।

तर्क और वैज्ञानिक समझ का हवाला देकर माकपा ने जिन हिंदू परंपराओं को दबाया, उस पर चर्चा होने लगी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखाओं के प्रसार और केंद्र में नरेंद्र मादी की सरकार ने लोगों को यह साहस दिया है कि वे फिर से अपनी परंपराओं की ओर लौट रहे हैं।

माकपा चाहकर भी लोगों को रोक नहीं पा रही है। खबरें बताती हैं कि पार्टी कार्यकर्ता आरएसएस में जा रहे हैं। माकपा काडर अब तक मंदिरों और उसकी गतिविधियों से दूर रहा, नतीजा हुआ कि मंदिरों के प्रबंधन और उससे जुड़े संघों पर कांग्रेस और आरएसएस के लोगों ने प्रभुत्व जमा लिया।

माकपा जानती है कि यह एक बड़ा वोट बैंक है, जिसे यूं ही नहीं छोड़ा जा सकता है। इसीलिए पार्टी ने धार्मिक आयोजनों में हिस्सा लेने का फैसला किया। वैसे इसका आरंभ 2015 में ही हो गया था, जब माकपा के आनुसांगिक संगठन बाल संघम ने कृष्ण जयंती मनायी और शोभा यात्राएं भी निकालीं।

…और अब रामायण मासम। लेकिन ये सब ऐसे किया जा रहा है, जिससे हिंदुओं को राम-नाम का चस्का लगे। क्योंकि जैसे ही धर्म हावी होगा, वाम प्रभाव कम होने लगेगा।

फिर भी यह एक बड़ा बदलाव है। 1940 के दशक में सीपी जोशी जैसे कद्दावर नेता को सिर्फ इसलिए हाशिए पर डाल दिया गया था कि वह रामायण और महाभारत पढ़ने की वकालत करते थे।

उनका मानना था कि असली भारत को जानने के लिए कार्यकर्ताओं को ये दोनों ग्रंथ पढ़ना चाहिए। जबकि पार्टी नेतृत्व इसके सख्त खिलाफ था।

वाम दल में विभाजन के बाद भी यह नीति जारी रही और 1980 के दशक तक पार्टी कॉडरों को मंदिर जाने या किसी धार्मिक आयोजन में भाग लेने की सख्त मनाही थी।

यह अलग बात है कि माकपा महासचिव ईएमएस नंबूदरीपाद की पत्नी को मंदिर जाने से कोई नहीं रोक पाया। तर्क यह दिया गया कि पत्नियों को कुछ छूट दी गई है।

इससे अधिक पूछने की हिम्मत तब किसी की नहीं थी। क्योंकि पार्टी नेतृत्व पर सवाल करने या पार्टी के निर्देशों के उल्लंघन का मतलब था मौत।

आज भी पार्टी की वैचारिक प्रतिबद्धता कम नहीं हुई है, लेकिन हिंदू वोटरों का खिसकना चिंता का विषय है। ऐसा इसलिए कि राजनीति में प्रासंगिक बने रहने के लिए कहीं न कहीं सत्ता में बने रहना आवश्यक है।

फिलहाल केरल के अलावा दूसरा ठौर नजर नहीं आता। तथ्य यह भी है कि अकेले मुसलमान वोटरों के सहारे केरल नहीं जीता जा सकता। माकपा को रणनीतिक बदलाव करना पड़ा है। बीती 15 जुलाई को हैदराबाद में आयोजित बोनालु महोत्सव में माकपा महासचिव सीताराम येचुरी के सिर पर फूलों की डाली काफी कुछ कह गई।

महाकली की पूजा के लिए फूल ले जा रहे सीताराम येचुरी की तस्वीर बताती है कि हिंदू वोटरों को लेकर पार्टी किस कदर गंभीर है। धर्म को अफीम मानने वाली माकपा के कार्यकर्ता राम-राम न कहें लेकिन रामायण पर चर्चा तो करने ही लगे हैं।

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