ममता बनर्जी की परेशानी

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Kolkata: TMC Supremo and WB CM Mamata Banerjee during a party rally in Kolkata, on Thursday. PTI Photo by Ashok Bhaumik(PTI1_30_2014_000102A)

पंचायतों में अपनी जीत से ममता बनर्जी संतुष्ट नहीं हैं। दूसरी पार्टियां अपनी पराजय को सहला रही हैं। पर्यवेक्षक कह रहे हैं कि तृणमूल ने 2013 की तुलना में बड़ी जीत हासिल कर ली है। दूसरी तरफ इस जीत से तृणमूल का चेहरा बेनकाब हुआ है।

उसकी राजनीतिक प्रतिष्ठा धूल में मिल गई है। लूटेरे और हत्यारे लोगों की वह पार्टी समझी जा रही है। पंचायत चुनावों में पहले तो उसने उम्मीदवार अपने निर्विरोध जिताए। विरोधियों को पर्चा दाखिल करने से रोका। शेष बची सीटों के लिए चुनाव हुए।

एक तिहाई सीटों पर उसने बिना चुनाव लड़े ही कब्जा कर लिया। दो तिहाई सीटों पर हुए चुनाव में तृणमूल को जिला परिषद में 95 फीसद, पंचायत समिति में 83 फीसद और गांव पंचायत में 68 फीसद सीटें बड़े खूनखराबे के बाद मिलीं। आज तक का यह सबसे ज्यादा खूनी चुनाव है।

इस चुनाव में भाजपा मुख्य प्रतिद्वंदी बनकर उभरी है। ममता बनर्जी की पीड़ा यही है। सीपीएम और कांग्रेस का सफाया हो गया है। भाजपा को जिला परिषद में चार फीसद सीटें मिली हैं। पंचायत समिति में यह आंकड़ा 10 तक पहुंच गया है। 18 फीसद ग्राम पंचायतों पर भाजपा ने तृणमूल की हत्यारी राजनीति के बावजूद कब्जा जमाया है। पश्चिम बंगाल के छ: जिलों में विपक्ष का नाम निशान नहीं भी है।

14 मई को चुनाव हुए। उससे पहले करीब 34 फीसद सीटें बिना चुनाव के तृणमूल की झोली में चली गई। साफ है कि ऐसा तृणमूल के अपने बलबूते पर नहीं हुआ। सरकार की पुलिस और शासन की मदद से तृणमूल चुनाव जीत सकी। 2013 में तृणमूल को 17 में से 13 जिला परिषदों पर कब्जा जमाने में सफलता मिली थी।

“पर्यवेक्षक कह रहे हैं कि तृणमूल ने 2013 की तुलना में बड़ी जीत हासिल कर ली है। दूसरी तरफ इस जीत से तृणमूल का चेहरा बेनकाब हुआ है।”

उस समय भी उसने ग्राम पंचायत की 6274 सीटें बिना लड़े हासिल कर लिया था। इस आधार पर देखें तो इस बार उसे बिना लड़े तीन गुनी सफलता मिली है। फिर भी ममता बनर्जी बौखलाई हुई हैं।

इस चुनाव में और उसके बाद हत्याओं का दौर जारी है। पूरे बंगाल में ऐसा दृश्य है। इसमें सीपीएम के नेता जहां मारे जा रहे हैं, वहीं, और उससे ज्यादा भाजपा के कार्यकर्ता और नेता मौत के घाट उतारे जा रहे हैं।

लेकिन तृणमूल के नेता इन हत्याओं में पार्टी के हाथ होने से इनकार करते हैं। हालात दिनों-दिन बिगड़ रहे हैं। चुनाव अफसरों की भी हत्या हुई है। एक स्कूल अध्यापक चुनाव के दिन मारा गया। यह उत्तरी दिनाजपुर की घटना है।

इस चुनाव में भाजपा ने अपनी कामयाबी से लोगों को चौंकाया। तृणमूल के गढ़ में उसका परचम लहरा रहा है। ममता बनर्जी की बौखलाहट इस कारण भी बढ़ी है। जंगल महल के पश्चिम मेदिनीपुर, बाकुरा, पुरलिया और झारग्राम में भाजपा ने तृणमूल को बड़ी चुनौती दे दी है।

झारग्राम में बीजेपी ने ग्राम पंचायतों की 328 सीटें जीती हैं। वहीं तृणमूल की 373 हैं। यहां बराबरी की टक्कर हुई है। इसी तरह बीजेपी ने उत्तर बंगाल के अलीपुरद्वार और जलपाई गुड़ी में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई है।

“इस चुनाव में भाजपा ने अपनी कामयाबी से लोगों को चौंकाया। तृणमूल के गढ़ में उसका परचम लहरा रहा है। ममता बनर्जी की बौखलाहट इस कारण भी बढ़ी है।”

राज्य की राजनीति में भाजपा ही तृणमूल की प्रतिद्वंद्वी होकर उभरी है। पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनाव से राज्य चुनाव आयोग पर सवाल खड़े हुए हैं। राज्य में हिंसा का इतिहास रहा है। हर पंचायत चुनाव में हिंसा और हत्या होती रही है।

इस बार हर पिछला रिकार्ड टूट गया है। दूसरी बात यह हुई है कि ट्राईबल इलाके में भाजपा का समर्थन बढ़ा है और तृणमूल के खिलाफ लोग खड़े हो रहे हैं।

इससे ममता बनर्जी की चिंता बढ़ गई है। जिन ट्राइबल इलाकों में भाजपा का जनसमर्थन बढ़ा है वहां के मंत्रियों को ममता बनर्जी सजा दे रही हैं। उन्हें मंत्रिमंडल से निकाल दिया गया है।

पांच जून को पिछड़े समुदाय के चूड़ामणि महतो, जेम्सकूजर और अबनीजोरदार मंत्रिमंडल से हटा दिए गए हैं। महतो पर झारग्राम में पराजय की गाज गिरी है तो कूजर पर अलीपुरद्वार की।

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विश्वसनीयता और प्रामाणिकता राय की पत्रकारिता की जान है। हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषीय न्यूज एजेंसी से उन्होंने पत्रकारिता में कदम रखा था। वे जनसत्ता के चुने हुए शुरुआती सदस्यों में एक रहे हैं। राय ‘जनसत्ता’ के ‘संपादक, समाचार सेवा’ के रूप में संबद्ध रहे। चार वर्षों तक पाक्षिक पत्रिका ‘प्रथम प्रवक्ता’ का संपादन किया। फिलहाल ‘यथावत’ के संपादक हैं।

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