भ्रष्टाचार का दलदल

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अंग्रेजी शासनकाल के दौरान 1886 में दयानंद एंग्लो वैदिक कॉलेज (डीएवी) प्रबंध समिति का पंजीकरण हुआ था। उस वक्त किसी ने भी ये नहीं सोचा होगा कि अंग्रेजों से लड़ने के लिए देश को शैक्षणिक मजबूती देने के उद्देश्य से समाज सुधारक महर्षि दयानंद सरस्वती के नाम पर शुरू की जा रही संस्था बाजारवाद के चक्रव्यूह में फंसकर ऐसे भ्रष्टाचार की दलदल में तब्दील हो जाएगी कि एक दिन यह देश की शिक्षण व्यवस्था को ही कमजोर करने के रास्ते पर चल पड़ेगी।

अब तो समिति ऐसे कुछ स्वार्थी तत्वों के चंगुल में फंस गई है जो मौका आने पर अपने स्वार्थ के लिए संस्था क्या, कुछ भी कर गुजरने से परहेज नहीं करेंगे।

पूनम सूरी जिम्मेदार!

अगर डीएवी प्रबंध समिति पर लगाए जा रहे आरोपों पर भरोसा किया जाए तो लगता है कि समिति के मौजूदा अध्यक्ष व तत्कालीन सचिव पूनम सूरी की संस्थानों के विकास को लेकर की गई कारगुजारी संदेह के घेरे में है। कंप्युटरीकरण की दौड़ में डीएवी को भी कंप्युटरीकृत करने का प्रस्ताव प्रबंध समिति ने पारित किया लेकिन यहां संस्थान के विकास की राह का रोड़ा सूरी सहित समिति के कुछ बड़े अधिकारियों का निजी स्वार्थ ही बन गया। आरोपों के मुताबिक सूरी और कुछ अधिकारियों के परिजनों ने मिलीभगत कर रातों-रात आईएनएसई साल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी बना ली। प्रबंध समिति की 24 जुलाई 2012 को आहूत बैठक के प्रस्ताव संख्या-1 के तहत लिए गए फैसले के मुताबिक विप्रो कंपनी से कंप्यूटर खरीदने का फैसला इसलिए लिया गया क्योंकि इस कंपनी की ओर से प्रस्तुत की गई कोटेशन की राशि सबसे कम (16.000 रुपये, साथ में कर) थी। हालांकि कोटेशन एचपी कम्पैक, आईबीएम- लिनोवो, एसर, एचसीएल व डेल कंपनियों से भी मंगवाए गए थे। बाद में इस खरीद में आईएनएसई साल्यूशन लिमिटेड को क्यों शामिल किया गया? इसका जवाब इस मामले के एक शिकायतकर्ता ओपी मेहता के पास है। मेहता कहते हैं कि कंपनी के शेयरधारकों की सूची में शामिल पहला, दूसरा व तीसरा व्यक्ति क्रमश: विवेक महाजन पुत्र विक्रमचंद महाजन, मधु महाजन पत्नी विक्रमचंद महाजन, अऩुश्री महाजन पत्नी विवेक महाजन, सभी डीएवी प्रबंध समिति के वरिष्ठ अधिकारी प्रबोध महाजन के पारिवारिक रिश्तेदार (विवेक महाजन प्रबोध महाजन के भतीजे हैं) हैं।  उल्लेखनीय है कि प्रबोध महाजन कंप्यूटर खरीद के लिए बनाई गई उप समिति के भी सदस्य थे। (वह कमेटी के मौजूदा उपाध्यक्ष भी हैं।)

इतना ही नहीं, मई 2011 को आहूत कंप्यूटर उपसमिति की बैठक की प्रस्ताव संख्या-2 के अनुसार ई-पाठशाला के गठन के लिए विभिन्न कंप्यूटर सर्वर व उपकरणों की खरीद भी आईएनएसई साल्यूशन से की गई। इस खरीद में समिति ने 16 करोड़ 92 लाख रुपये खर्च किए। इस भ्रष्टाचार की गाथा को आगे बढ़ाते हुए मेहता का आरोप है कि प्रबंध समिति के मौजूदा अध्यक्ष व तत्कालीन सचिव पूनम सूरी ने भी भ्रष्ट कारोबार में अपनी साझेदारी नहीं छोड़ी क्योंकि उक्त आईएनएसई साल्यूशन लिमिटेड के शेयरधारकों की सूची में शामिल चौथी शेयरधारक रितु सूरी पत्नी स्व.राज बहादुर सूरी हैं। रितु, पूनम सूरी की पत्नी की बहन हैं। लेकिन अब इस कहानी में लीक से हटने की जरूरत इसलिए है कि डीएवी प्रबंध समिति की पूर्व कारगुजारी कथा मौजूदा कहानी की कड़ी को जोड़ेगी। लेकिन इस कहानी में तो भारत सरकार की जांच एजेंसी आयकर विभाग शामिल है।

आयकर जांच का समर्थन

आयकर विभाग के दिल्ली स्थित मयूर भवन कार्यालय में पदस्थापित तत्कालीन सहायक निदेशक सुधीर शर्मा 18 अक्टूबर 2004 को डीएवी ट्रस्ट की आय के एसेसमेंट आर्डर में लिखते हैं कि पहाड़गंज के चित्रगुप्त रोड स्थित दयानंद एंग्लो वैदिक कॉलेज मैनेजमेंट ट्रस्ट एंड मैनेजमेंट सोसायटी की ओर से दाखिल ‘निल ( जीरो) रिटर्न’ में खामियां ही खामियां हैं। इसके चलते आयकर अधिनियम की धारा-148 के तहत सोसायटी को नोटिस भी दिया गया है लेकिन आदेश तामील नहीं करने के कारण इसे 10,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया। शर्मा अपने आदेश में आगे लिखते हैं कि समिति ने अपने 393 संस्थानों में से सिर्फ 383 संस्थानों का ही फाइनेंशियल स्टेटमेंट दाखिल करवाया। हालांकि शर्मा के इस आदेश में जो महत्वपूर्ण बिंदु उभरकर आया, वह दिल्ली के श्रेष्ठ विहार स्थित डीएवी स्कूल से संबंधित है। स्कूल के कंप्यूटर खरीद के एक मामले में फर्जी व्यावसायिक इकाइयों से लेन-देन किया। 22 मार्च 1999 को जारी इनवायस संख्या-526,527 और 528 के मुताबिक स्कूल ने नई दिल्ली के ईस्ट ऑफ कैलाश-435 स्थित मेसर्स, काम्पशाफ्ट इंडिया से कई आइबीएम कंप्यूटर खरीदे, लेकिन जांच में सामने आया कि कंपनी का उक्त पते पर कोई स्थायित्व ही नहीं था। मामले का आश्चर्यजनक पहलू ये था कि इस कंपनी के पास एक फोन भी नहीं था। टेलीफोन के नाम पर इस कंपनी के पास एक मोबाइल फोन का नंबर दिया गया था। उस नंबर पर बात करने पर पता चला कि यह किसी मेसर्स अरुण राजीव, प्रिंटिंग फर्म का है जिसका स्वामित्व उक्त स्कूल के प्रिंसिपल के पति व पुत्र के पास है। इसलिए अपने आदेश में आयकर विभाग के सहायक निदेशक सुधीर शर्मा ने प्रबंध समिति से आग्रह किया कि संस्थान के हित में राशि के गबन को रोकने के लिए स्कूल में कंप्यूटर की उपलब्धता का भौतिक सत्यापन किया जाए। शिकायतकर्ता ओपी मेहता की ओर से संज्ञान में लाए गए फर्जी कंप्यूटर खरीद का मामला अपने आप में इकलौता नहीं है। आयकर विभाग की जांच भी कंप्यूटर खरीद में किए जा रहे घपले का मजबूती से समर्थन कर रही है ।

अब ओपी मेहता की ओर से उठाए गए मामले में  शामिल राशि के परिमाण के बारे में चर्चा इसलिए जरूरी है कि इससे घोटाले में शामिल राशि के बारे में जानकारी मिल सकेगी। मेहता ने अपनी शिकायत में कहा है कि 2002 से 2012 तक 80 करोड़ 50 लाख रुपये के कंप्यूटर खरीदे गए। चूंकि कंप्यूटर की संस्थानों में उपलब्धता का भौतिक सत्यापन किसी ने किया ही नहीं है, इसलिए लगता है, लोगों ने इस राशि की सिर्फ बंदरबाट की होगी। यानी यह लगभग 80 करोड़ का घोटाला है। साथ ही अगर पाठशाला पर आए खर्च को इसमें जोड़ दिया जाए तो कुल राशि 97 करोड़ रुपये से अधिक होती है।

आयकर विभाग के सहायक निदेशक सुधीर के शर्मा के एसेसमेंट आर्डर में इस बात की चर्चा है कि हिमाचल प्रदेश के सोलन स्थित डीएवी सीनियर सेकेंडरी पब्लिक स्कूल की लेखा बही में 2,85,600/ रुपये की राशि से एक मारुति वैन की खरीद की बात की गई थी, लेकिन जब इसका भौतिक सत्यापन किया गया तो वैन कहीं नहीं मिली। यानी वैन कागज पर ही दौड़ रही थी। मेहता कहते हैं, कंप्यूटर खरीद के मामले में हेराफेऱी को इंगित करने वाला एक और पहलू है। खरीद में शामिल कंपनी आईएनएसई साल्यूशन लिमिटेड के दो पैन कार्ड हैं। एक का नबंर- ए.ए.ए.सी.18944 ई. व दूसरे का ए.ए.जी.सी.ए.7578 सी है।

रसूख के बूते दबा मामला

इतना सब होते हुए भी लगभग दो दशकों से इस मामले को राजनीतिक रसूख व पैसे के बूते दबाया जा रहा है और इसका खामियाजा डीएवी संस्थानों में अध्ययन करने वाले छात्रों को भुगतना पड़ता है। शैक्षणिक सत्र 2012-13 के दौरान डीएवी प्रबंध समिति की ओर से चलाए जा रहे पंजाब के जालंधर स्थित संस्थान डेविएट (डीएवी इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी) के छात्रों के प्रवेश पर रोक जैसी त्रासदी से गुजरना पड़ा डेविएट इंप्लाइज वेलफेयर एसोसिएशन (डेवा) के मुताबिक संस्थान के तत्कालीन प्रिंसिपल सह निदेशक सीएल कोचर ने संस्थान में कुछ ऐसे लोगों की नियुक्ति कर दी जो पद के लिए एआईसीटीई की ओर से निर्धारित योग्यता नहीं रखते थे। इसके चलते ‘डेवा’ से जुड़े लोगों ने इस नियुक्ति के खिलाफ पंजाब व हरियाणा हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर दी। फिर कोर्ट ने एआईसीटीई को मामले को देखने के लिए कहा। हालांकि कोचर अपनी जिद पर अड़े रहे और उन्होंने गलत ढंग से नियुक्त किए गए लोगों को हटाने से मना कर दिया। फिर एआईसीटीई ने संस्थान में प्रवेश पर रोक लगा दी। इस क्रम में एक बार तो ऐसा मौका आया जब एआईसीटीई ने संस्थान को बंद करने का ही आदेश दे दिया था।

हालांकि यह कहना भी सही होगा कि यह मामला कभी प्रकाश में आया ही नहीं। संसद की 14वीं लोक लेखा समिति ( 2005-06 ) ने आयकर विभाग से पूछा था कि जब डीआईटी ने डीएवी के आयकर के तहत छूट के आवेदन को खारिज कर दिया तो फिर एसेसमेंट अफसर ने संस्थान को आयकर अधिनियम की धारा 10 (23सी.6) के मुताबिक इसे छूट क्यों दे दी? समिति ने यह भी कहा कि डीएवी प्रबंध समिति ने 2000-01, 2001-02 व 2002-03 के दौरान 16.61 करोड़ रुपये के आयकर का वंचन किया। फिर वित्त मंत्रालय ने इसके जवाब में कहा था कि कर वंचन के मामले में 1.5 करोड़ की वसूली की जा चुकी है और डीएवी की अपील आयकर निदेशक के यहां लंबित है। इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि दिल्ली के दरिबाकलां निवासी अशोक खन्ना की ओर से दिल्ली उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दाखिल करने के बाद भी इसकी जांच नहीं हो। पाई जबकि न्यायालय ने दिल्ली पुलिस को खन्ना की शिकायत की जांच करने व विधि के मुताबिक कार्रवाई करने का निर्देश दिया था।

फिर दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा ने खन्ना के आवेदन को सीबीआई की आर्थिक अपराध शाखा के पुलिस अधीक्षक को भेज दिया। हालांकि खन्ना ने इससे पूर्व अप्रैल 2012 के दौरान इस मामले में एक आवेदन आयकर विभाग के निदेशक को भी दिया था जिसकी चर्चा खन्ना की याचिका में की गई है। आयकर विभाग ने भी इस आवेदन पर कार्रवाई करना अभी तक उचित नहीं समझा। शायद इस कारण यह मामला राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खी भी नहीं बना। जब सीबीआई के प्रवक्ता आरके गौड़ से संपर्क किया गया तो उन्होंने कहा कि मामला पुराना हो गया है, इसलिए इस पर कार्रवाई नहीं की  जा सकती। लेकिन डीएवी कालेज प्रबंध समिति के उपाध्यक्ष मोहन लाल बिना लाग लपेट  कहते हैं कि अगर कोई गलत कर रहा है तो वह उसके खिलाफ हैं।  प्रबंध समिति के अध्यक्ष से कई बार संपर्क करने का प्रयास किया गया लेकिन उनका पक्ष नहीं मिल पाया।

एक शिकायत में कहा गया है कि 2002 से 2012 तक 80 करोड़ 50 लाख  रुपये के कंप्यूटर खरीदे गए। चूंकि कंप्यूटर की संस्थानों में उपलब्धता का भौतिक सत्यापन किसी
ने किया ही नहीं है, इसलिए लगता है, लोगों ने इस राशि की सिर्फ बंदरबाट की होगी। साथ ही अगर पाठशाला पर आए खर्च को इसमें जोड़ दिया जाए तो कुल राशि 97 करोड़
रुपये से अधिक हो जाती है।

शिक्षण स्तर पर असर

देशभर में डीएवी के 750 स्कूल, कॉलेज और तकनीकी शैक्षणिक संस्थान हैं। ये सभी संस्थान उक्त प्रबंध समिति की देखरेख में ही चलाए जा रहे हैं। अगर इन संस्थानों में भ्रष्टाचार व्याप्त है तो इसका असर इनके शिक्षण स्तर पर भी पड़ रहा है क्योंकि निजी स्वार्थ के चलते यहां मानकों के विपरीत शिक्षा कर्मियों की नियुक्ति हो जाती है। कमेटी के सूत्र यह भी बताते हैं कि जब भी किसी व्यक्ति ने समिति में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर करने की कोशिश की तो प्रबंधन ने उसे या उसके परिजन को सारे नियम कायदों को दरकिनार कर डीएवी संस्थानों में नियुक्त कर दिया।

देशभर में डीएवी (दयानंद एंग्लो वैदिक कॉलेज) के 750 स्कूल, कॉलेज और तकनीकी शैक्षणिक संस्थान संचालित हो रहे हैं। लेकिन प्रबंध समिति की भ्रष्टाचारी कार्य प्रणाली के चलते ये शिक्षण संस्थान दुर्दशा को प्राप्त होते जा रहे हैं। प्रबंधन पर 100 करोड़ रुपये के कंप्यूटर घोटाले का आरोप है। राजनीतिक प्रभाव के चलते मामला दबता ही रहा है।

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