भारत के आक्रामक होने का सही समय

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बात चाहे बलूचिस्तान में मानवाधिकार हनन के लंबे इतिहास और उसके कारण समाज के दिलो दिमाग पर खिंची दर्द की गहरी लकीरों की पृष्ठभूमि में उभरी मानवीय चिंता की हो

या फिर भावनाओं की दुनिया से एकदम परे कठोर रणनीतिक लक्ष्यों पर आधारित कूटनीतिक बाध्यताओं की, ऐसा लगता है कि भारत के लिए अपना दृष्टिकोण बदलने का समय आ गया है।

बलूचिस्तान में लोगों का गायब हो जाना और कभी न मिलना या फिर कभी किसी कब्र में लाशों के ढेर में मिलना, अब कोई नई बात नहीं। मानवाधिकार नाम की ‘चिडि़या’ वहां खोजे से नहीं मिलेगी।

दुनिया में मानवाधिकार के झंडाबरदारों की नजर पाकिस्तान के अवैध कब्जे में दशकों से क्रूरता का दंश झेल रहे इस इलाके की ओर जाती नहीं।

लेकिन क्या भारत को भी इनकी ओर से मुंह मोड़े रखना चाहिए?  बलूचिस्तान के साथ हमारा पुराना संबंध रहा है।

सिंधु घाटी सभ्यता के महत्वपूर्ण शहर मेहरगढ़ से लेकर भारत की आजादी से पहले तक हमारे उनसे करीबी सामाजिक-सांस्कृतिक रिश्ते रहे।

बलूचिस्तान में पहली जनगणना अंग्रेजों ने 1901 में कराई थी और तब उत्तर पश्चिम इलाके में सबसे ज्यादा आबादी बलूचों की थी, 80 हजार।

दूसरी बड़ी आबादी जाटों की थी, 66 हजार। दरअसल, तब बलूचिस्तान और राजपूताना में बेटी-रोटी का संबंध था। राजपूताना इलाके से गए लोग स्थानीय लोगों के साथ घुलते-मिलते चले गए।

तो क्या ऐसे में हमारा नैतिक दायित्व नहीं बनता कि इस क्षेत्र में पाकिस्तान के हाथों जातीय सफाये की तपिश झेल रहे इन लोगों के दर्द को आवाज दें?

रक्षा विशेषज्ञ रिटायर्ड मेजर जनरल जी.डी. बख्शी कहते हैं, ‘नैतिक जिम्मेदारी के आधार पर बात करें या फिर विशुद्ध कूटनीति के लिहाज से, बलूचिस्तान के प्रति हमारी नीति में आक्रामकता होनी चाहिए।

बलूचिस्तान की आजादी और वहां मानवाधिकार हनन की बात करने वाले स्थानीय नेता स्विट्जरलैंड, ब्रिटेन और तमाम अन्य देशों में मारे-मारे फिर रहे हैं।

नैतिक जिम्मेदारी के आधार पर बात करें या फिर विशुद्ध कूटनीति के लिहाज से, बलूचिस्तान के प्रति हमारी नीति में आक्रामकता होनी चाहिए।

– जीडी बक्शी, रक्षा विशेषज्ञ

पाकिस्तान और चीन उन्हें वहां भी जीने नहीं दे रहे। बरहमदाग बुगती के राजनीतिक शरण का आवेदन इन देशों ने स्विट्जरलैंड पर दबाव डालकर खारिज करा दिया।

दुनिया बैठी है, क्या हम भी बैठे रहेंगे ? पाकिस्तान की सेना वहां जिस तरह का कत्लेआम मचा रही है, ये बलूच तो गायब ही हो जाएंगे।’

दरअसल, बलूचिस्तान के प्रति नजरिये में बदलाव के रणनीतिक कारण भी हैं। हजार अमेरिकी दबाव के बाद भी पाकिस्तान कश्मीर में आतंकवाद फैलाने से बाज नहीं आ रहा है।

उसका सरकारी अमला आतंकवादियों से मिलीभगत करके यहां आग लगा रहा है और हमारी पूरी ऊर्जा उनकी चालों को काटने में ही खर्च हो जा रही है।

बख्शी कहते हैं, ‘सीमा पर आए दिन हमारे जवान शहीद हो रहे हैं। आखिर बिना युद्ध इस तरह जवानों की शहादत का क्या मतलब? यह सही है कि हमने सर्जिकल स्ट्राइक की, लेकिन यह क्यों थी?

वह इस बात के लिए थी कि उनमें खौफ पैदा हो और आतंकवादी घटनाएं रुकें। अगर ऐसा नहीं हो रहा है तो हमें अपनी रणनीति बदलनी चाहिए। आखिर हमें बलूचिस्तान को रणनीतिक दृष्टि से क्यों नहीं इस्तेमाल करना चाहिए?’

पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से अफगानिस्तान भी त्रस्त है और वह कई मौकों पर इस बात की खुली शिकायत भी कर चुका है।

जहां तक बलूचिस्तान पर पाकिस्तान के अवैध कब्जे की बात है, संयुक्त राष्ट्र में इसकी शिकायत अफगानिस्तान ही कर सकता है।

जी.डी. बख्शी का मानना है कि भारत को अपने कूटनीतिक रसूख का इस्तेमाल करके अफगानिस्तान को प्रेरित करना चाहिए कि वह बलूचिस्तान पर अवैध कब्जे का मामला उठाए।

“बलूचिस्तान में पहली जनगणना अंग्रेजों ने 1901 में कराई थी और तब उत्तर पश्चिम इलाके में सबसे ज्यादा आबादी बलूचों की थी, 80 हजार।”

वह कहते हैं, ‘आप चाहें तो कई तरह से उनके लिए मुसीबतें खड़ी कर सकते हैं। हमें उसी भाषा में बात करनी चाहिए जो सामने वाले की समझ में आए।

दुनिया भर में कुख्यात आतंकवादियों को पाकिस्तान शरण दे सकता है तो बरहमदाग बुगती को हम शरण क्यों नहीं दे सकते जिसे आतंकवादी बताने वाला खुद दुनिया में आतंकवाद का बड़ा पोषक हो? ‘

बलूचों की वेदना के प्रति संवेदना रखना, उसे जताना और उसके निदान की कोशिश करना न केवल वहां के लोगों के प्रकृति प्रदत्त जीने के अधिकार का सम्मान करना है बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी यह हमारे लिए अनुकूल है।

 

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