भाजपा पर बयान तक सिमटे नीतीश

0
77

नीतीश कुमार का दावा है कि भ्रष्टाचार और सांप्रदायिकता से कोई समझौता नहीं कर सकते। मगर यह हो रहा है, बिहार में क्योंकि नवादा जेल में जाकर गिरिराज सिंह ने अपने समर्थकों से भेंट ही नहीं की बल्कि दावा भी किया कि उन्हें फंसाया गया है।

नीतीश कुमार ने पटना जाकर बस एक बयान भर दिया। असल नीतीश कुमार का संकट यह है कि भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह से मुलाकात के बाद वह क्या कहेंगे। भ्रष्टाचार और सांप्रदायिकता वाला बयान बुनियादी तौर पर अमित शाह के लिए ही था कि वह अपने लोगों को काबू में रखें।   

नीतीश कुमार जानते हैं कि मीडिया, खास तौर पर भाजपा प्रेरित मीडिया बार-बार कह रहा है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में उनकी जदयू को सिर्फ दो स्थान ही मिले थे। उसके बाद की राजनीति ही असल खेल है जो नीतीश कुमार खेल रहे हैं।

इस खेल में लालू प्रसाद का राजद और राहुल गांधी का कांग्रेस का भी उन्हें उस समय समर्थन मिला। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद विधान सभा की 10 सीटों पर हुए उपचुनाव भारतीय जनता पार्टी को 4 सीटें मिलीं। 3 पर राजद, 2 पर जदयू और 1 पर कांग्रेस जीती थी।

इससे नीतीश कुमार के मन में यह बात बैठ गई कि भाजपा से डरने की कोई जरूरत नहीं। फिर भी प्रशांत किशोर की सहायता उन्होंने ली और लालू प्रसाद का साथ भी।

“नीतीश कुमार का असल संकट यह है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से मुलाकात के बाद वह क्या कहेंगे। भ्रष्टाचार और सांप्रदायिकता वाला बयान बुनियादी तौर पर अमित शाह के लिए ही था कि वह अपने लोगों को काबू में रखें। लेकिन यह नहीं हो पा रहा है।”

फिर हुआ 2015 का विधान सभा का चुनाव। जो 2014 के उपचुनाव का नतीजा था, जिसका नतीजा वही था जो विधान सभा के उपचुनाव में हुआ था।

लगभग उसी आधार पर विधान सभा में राजद को 80,जदयू को 71 और कांग्रेस को 27 सीटें मिलीं। यहां दो बातें हुई -एक तो नीतीश कुमार के मन से नरेन्द्र मोदी का आतंक निकल गया।

बिहार में मिलीजुली सरकार बनी। लोगों को अचरज हुआ कि लालू प्रसाद से कैसे नीतीश कुमार मिल गए। इसमें आश्चर्य कि कोई बात नहीं थी। 2014 में हुए राज्य सभा के उपचुनाव से लेकर जीतनराम मांझी को हटाने तक उन्होंने लालू प्रसाद का साथ लिया था।

पर लालू प्रसाद का आतंक उनके मन में बैठा हुआ था। उनके राजनीतिक जीवन के चढ़ाव -उतार में भी लालू प्रसाद का आतंक रहा है। इसलिए जब 2015 के चुनाव के बाद उन्हें तीन दलों के साथ मिलकर सरकार बनानी पड़ी तो वह उनके लिए मुश्किल सा काम था। पहली बार विभागों के बंटवारे में उनकी कम चली।

एक वक्त ऐसा आ गया कि लालू प्रसाद के परिवार से मुक्त होने के लिए वह परेशान हो चुके थे। ऐसे में उनकी मदद सुशील मोदी और अरुण जेटली ने की।

“भाजपा के साथ सरकार बनाने के बाद अचानक मीडिया में नीतीश कुमार की छवि सांप्रदायिक नेता की बन गई। नीतीश कुमार को यह पता है कि अब नरेंद्र मोदी से डरने की कोई जरूरत नहीं।”

लालू परिवार पर लगातार भ्रष्टाचार के आरोप लगे, उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों पर आरोप लगे। अब यह संकट का काल था नीतीश कुमार के सामने। बिहार विधान सभा का जो गणित था, उसमें सिर्फ भाजपा के साथ ही सरकार बन सकती थी।

भाजपा के साथ सरकार बनाने के बाद अचानक मीडिया में नीतीश कुमार की छवि सांप्रदायिक नेता की बन गई। नीतीश कुमार को यह पता है कि अब नरेंद्र मोदी से डरने की कोई जरूरत नहीं।

बिहार भाजपा में कोई ऐसा नेता नहीं जो उनका मुकाबला कर सके। अब उनके सामने दो प्रश्न है कि लोकसभा चुनाव के आंकड़ो के आधार पर ही भाजपा उन्हें सीटें देती है तो वह स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ें। तब वह बिहार विधान सभा का चुनाव भी लोकसभा के चुनाव के साथ करवा सकते हैं।

एक और प्रश्न है कि बिहार की 40 लोकसभा सीटों में भाजपा अपने कितने लोगों की छुट्टी कर रही है। हो सकता है कि उन संभावित नामों के आधार पर भी दो पार्टी के अध्यक्षों की मुलाकात है और न भी हो। पर नीतीश कुमार को पता होगा कि किन किन लोगों का टिकट कट रहा है। 

पाठक की प्रतिक्रिया

Please enter your comment!
Please enter your name here