ब्रेकिंग श्रद्धांजलि

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हफिल लूटने वाली एक विशेष प्रजाति होती है। बारात हो या वारदात हर जगह सबसे आगे खड़ी मिलती है।

बारात में दूल्हे के बाप के साथ-साथ चल रहे उस प्रजाति विशेष के व्यक्ति को देखते ही मैं पहचान गया- हां ये वही सज्जन हैं जो प्यारेलाल जी की मैय्यत में सबसे आगे थे।

जिस गेट से गणमान्य लोग आ रहे थे, ठीक वहीं हाथ जोड़कर खड़े थे। जैसे जनाजा उठने को हुआ इन्होंने दिवगंत प्यारेलाल जी के सगे भतीजे को धकियाकर अर्थी अपने कंधे पर उठाई थी और फोटोग्राफर के हटते ही मेरे कंधे पर टिकाई थी।

ऐसे लोग हर महानगर, हर शहर और हर कस्बे में होते हैं। लेकिन आजकल यह प्रजाति सबसे ज्यादा सोशल मीडिया पर पाई जाती है।

हाल ही में हिंदी के एक बड़े कवि का स्वर्गवास हुआ।

फेसबुक पर मातमी धुन बजी, उसके बाद दनादन फोटो के अंबार लगने शुरू हुए। आकुल जी के साथ खड़े हिंदी के सबसे बड़े कवि। व्याकुल जी के साथ बैठकर बतियाते हिंदी के सबसे बड़े कवि जो इस उदीयमान कवि के पहले संग्रह के छपने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे। लेकिन हिंदी का हतभाग्य!

नहीं कविश्रेष्ठ ऐसा नहीं हो सकता! आप मेरी पुस्तक का विमोचन किए बिना इस तरह दुनिया से कैसे जा सकते हैं? कितनी आशाएं थीं, आपको मुझसे। मैं वचन देता हूं, समस्त आशाएं पूर्ण करूंगा।

“ब्रेकिंग न्यूज की तरह आजकल ब्रेकिंग श्रद्धांजलि भी होती है। बड़े लोगों की मौत की खबर पक्की होने का इंतजार  आजकल कोई नहीं करता है। नवजोत सिंह सिद्धू की ‘ठोको ताली’ शैली में फेसबुक पर ‘ठोको श्रद्धांजलि’ का दौर है।”

आकुल जी और व्याकुल जी ही नहीं, दिवगंत कवि को हर कोई अश्रुपूरित शब्दों में श्रद्धांजलि दे रहा था, उनके साथ अपनी खिलखिलाती तस्वीर लगाकर।

सुबह से शाम तक फेसबुक पर आई इस तरह की तस्वीरों की बाढ़ को देखकर लगा कि प्रशंसकों के साथ सेल्फी खिंचवाना ही महाकवि का मुख्य काम रहा होगा, कविताएं तो बीच-बीच में यूं ही लिख दिया करते होंगे।

ब्रेकिंग न्यूज की तरह आजकल ब्रेकिंग श्रद्धांजलि भी होती है। बड़े लोगो की मौत की खबर पक्की होने का इंतजार  आजकल कोई नहीं करता है। नवजोत सिंह सिद्धू की ‘ठोको ताली’ शैली में फेसबुक पर ‘ठोको श्रद्धांजलि’ का दौर है।

मैंने कई ऐसी श्रद्धांजलियां देखी हैं, जिसमें फेसबुक पर माला पहनाए जाने के बाद व्यक्ति जी उठता है। यानी खबर गलत निकलती है। लेकिन श्रद्धांजलि देनेवाले बाज नहीं आते।

अगर यह बात पक्की हो जाए कि अस्पताल में पड़ा वीआईपी आसानी से दुनिया नहीं छोड़ेगा तब जातक मन में आए श्रद्धांजलि के सुंदर शब्दों को अलग से नोट करके आगे के लिए रख लेता है।

इसके बदले वह मार्मिक मैसेज लिखता है- दुनिया के लिए आप भले ही बहुत बड़ी शख्सियत हों। लेकिन मेरे लिए तो बड़े भाई जैसे हैं। दिल कहता है, आपको कुछ नहीं होगा।

पूरा देश आपके लिए प्रार्थना कर रहा है। मैने पिछले तीन दिन से कुछ नहीं खाया। जल्दी सेहतमंद होकर अस्पताल से बाहर आ जाइये प्लीज। मैसेज के साथ लगी होती है- मरणासन्न वीआईपीए के साथ सेल्फी धारक की तस्वीर।

65 साल से उपर वाले वीआईपी के साथ अगर कोई सेल्फी खिंचवाने के लिए दौड़ा चला आता है तो वह वीआईपी समझ जाता है कि यह मेरे श्रद्धांजलि कार्यक्रम की फारवर्ड प्लानिंग है।

फिर भी वह बेचारा शिष्टाचारवश चुपचाप खड़ा रहता है। सेल्फी ले रहा आदमी दांत निपोरता है,लेकिन साथ खड़े वीआईपी को लगता है कि वह शरीर नहीं बल्कि एक आत्मा है और अपना तर्पण होता हुआ देख रहा है।  

वीआईपी के साथ सेल्फी खिंचवाने वाले जानते हैं यह सिर्फ फोटो नहीं बल्कि एक तरह की  पॉलिसी है, जो आज नहीं तो कल मेच्योर जरूर होगी और सोशल मीडिया पर बहुत अच्छा रिटर्न देकर जाएगी।

“सेल्फी ले रहा आदमी दांत निपोरता है,लेकिन साथ खड़े वीआईपी को लगता है कि वह शरीर नहीं बल्कि एक आत्मा है और अपना तर्पण होता हुआ देख रहा है।”

लेकिन जिनके पास महापुरुषों के साथ खिंची तस्वीर नहीं है, वे क्या करें? ‘सेल्फी हीन तड़पत मन मोरा’ वाली सिचुएशन वाकई कष्टकारी है।  पुरानी पीढ़ी इस मामले में रास्ता दिखा गई है।

जिनकी पास तस्वीरें नहीं होतीं, उनके पास संस्मरण होते हैं। एक से बढ़कर एक यादें जिनसे नई पीढ़ी के लोग बहुत कुछ सीख सकते हैं। तरह-तरह के किस्से।

एक बड़े एक्टर की मौत हो गई। श्रद्धांजलि देने वाले ने लिखा- जब वे गर्दिश के दिनो में थे, तब मैंने उन्हे कुछ पैसे उधार दिए थे। वे बिना चुकाए चले गए।

लेकिन कर्ज तो असल में मेरा है, उनपर। मेरा ही नहीं पूरे देश का कर्ज है, उनपर। जो संस्मरण लेखक ज्यादा समझदार होते हैं वे जानते हैं कि उनकी बातों पर कोई आसानी से भरोसा नहीं करेगा।

इसलिए गवाह तैयार रखते हैं। दिल्ली की हर प्रेस कांफ्रेंस में दिखाई देने वाले एक अज्ञात कुलशील अखबार के मुख्य संवाददाता अक्सर दावा किया करते थे- ‘राजेंद्र माथुर मानते थे कि उनका सच्चा वारिस केवल मैं ही हूं। अगर हिंदी वालों ने कद्र नहीं की तो यह उनका दुर्भाग्य होगा।’  

अनगिनत दावों से आजिज आकर किसी ने एक बार पूछ लिया-  कब कहा था आपके बारे में राजेंद्र माथुर ने ऐसा? उन्होंने जवाब दिया- हमेशा कहा करते थे।

एक बार इंदौर में सार्वजनिक मंच से भी कहा था। उस पर मंच पर सुरेंद्र प्रताप सिंह,प्रभाष जोशी और उदयन शर्मा भी मौजूद थे। उन तीनों ने भी माथुर साहब की बात का पुरजोर तरीके से समर्थन किया था।

दावा अकाट्य ही नहीं बल्कि पुष्टि से परे था। आखिर दिवगंत चश्मदीदों के बयान कौन लेकर लौटा है आजतक?   

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