बेलगाम ई-कॉमर्स वेबसाइट

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भारत में ई-कॉमर्स का बाजार 9.5 बिलियन डॉलर का है। इस साल के अंत तक इसके 12.6 बिलियन डालर हो जाने की उम्मीद है। साथ ही 2020 तक यह देश की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में चार प्रतिशत का योगदान देगा।” यह बात ई-कॉमर्स के बढ़ते व्यवसाय का अध्ययन करने वाली संस्था ने अपने रिपोर्ट में कही है। हाल ही में ‘इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ व ‘केपीएमजी'(क्लेनवेल्ड पीट मारविक जॉर्जलर) ने ई-कॉमर्स व्यवसाय का अध्ययन कर संयुक्त रूप से इस रिपोर्ट को जारी किया है। वहीं ‘फॉरेस्टर रिसर्च’ नामक संस्था की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ‘भारत में लगभग 3.5 करोड़ लोग ऑनलाइन खरीदारी करते हैं, जिनकी संख्या 2018 तक 12.80 करोड़ हो जाने की उम्मीद है।

इन दोनों रिपोर्ट से यह साफ हो गया है कि भारत में ई-कॉमर्स का बाजार तेजी से बढ़ रहा है। किताबों से शुरू हुआ यह सिलसिला फर्नीचर, कपड़ों, इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरण, बीज, किराने के सामान से लेकर फल और सौंदर्य प्रसाधन तक पहुंच गया है। इसमें कोई दो राय नहीं कि यह सूची आगे और लंबी हो सकती है। ई-कॉमर्स वेबसाइटों के जरिए की जा रही ऑन-लाइन खरीदारी शहरी आबादी के लिए आम बात हो गई है। ऑनलाईन खरीददारी करना इतना आसान है कि इसे बेडरूम, दफ्तर या गाड़ी कहीं से भी किया जा सकता है। रोज-रोज नए-नए ई-कॉमर्स पोर्टल भी खुल रहे हैं जो दवा से लेकर जेवर तक उपलब्ध करवा रहे हैं।

भारत में इंटरनेट का आगमन 1995 में हुआ। तब यह सरकारी महकमें और बड़े शहरों में कुछ लोगों तक ही सीमित था। धीरे-धीरे इसका दायरा बढ़ा। आज दुनिया में भारत इंटरनेट के प्रयोग के मामले में तीसरे स्थान पर है। भारत में रेडिफ डॉट कॉम और इंडियाटाइम्स डॉट कॉम  ने बिजनस टू बिजनस (बी2बी) पोर्टल की शुरुआत की। फिर वैवाहिक साइटें, नौकरी दिलवाने वाली साइटें और फिर ऑनलाइन स्टोर खुलने लगे। खरीदारी के अनेक विकल्पों और कीमतों का तुलनात्मक रूप से मूल्याकंन की सुविधा और आसान मासिक किश्तों में चीजें खरीदने का विकल्प ग्राहकों को लुभाने लगा। कुल मिलाकर अब उपभोक्ताओं के लिए चीजें खरीदना काफी आसान हो गया है। ऑनलाइन खरीदारी ने किसी खास सामान की सिर्फ  बड़े शहरों में उपलब्धता की स्थिति को भी खत्म किया है। अब किसी भी शहर में रहकर कोई भी सामान खरीदा जा सकता है।  इंटरनेट के बाद स्मार्टफोन ने ई-कमर्स वेबसाइटों के लिए वरदान का काम किया। अब यहां तक कहा जाने लगा है कि ई-कॉमर्स का भविष्य मोबाइल के हाथों में है।

मार्केट रिसर्च संस्था आईडीसी के मुताबिक, भारत में स्मार्टफोन का बाजार 40 फीसदी की गति से बढ़ रहा है। ऑनलाइन खरीदारी के संदर्भ में तस्वीर का दूसरा रुख उतना चमकीला भी नहीं है। एक तो मोबाइल डाटा की कीमत ज्यादा और रफ्तार कम है। फिर बड़े शहरों को छोड़ दिया जाए, तो छोटे शहरों और कस्बों में इंटरनेट सुविधाजनक नहीं है। अंग्रेजी भाषा पर निर्भरता की वजह से ऑनलाइन करोबार का दायरा सीमित है। फिर इस क्षेत्र में उपभोक्ता के हितों की रक्षा के लिए नियम-कायदे अभी नहीं बने हैं। शिकायत निवारण जैसे इंतजाम भी नहीं हुए हैं।भारत में ई-कॉमर्स अच्छे और बुरे दोनों कारणों से सुर्खियों में है। यहां ई-कॉमर्स वेबसाइटों पर ई-कॉमर्स कानूनों का पालन नहीं करने के आरोप भी लग रहे हैं। कुछ महीने पहले ही प्रवर्तन निदेशालय  ने फ्लिपकार्ट को विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा) के प्रावधानों के उल्लंघन के खिलाफ नोटिस भेजा था।  इस उल्लंघन का ईडी जांच कर रही है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई)-2014 परिपत्र के अनुसार वैसे ई-कॉमर्स वेबसाइट जो ‘बी टू बी’ क्षेत्र में हैं उन्हें 100 फीसदी एफडीआई की अनुमति दी गई है। वे खुदरा व्यापार नहीं कर सकते। विदेशी पूंजी से चल रहे ई-कॉमर्स वेबसाइटों को ‘बी टू सी’ (बिजनेस टू कस्टमर) की इजाजत नहीं दी गई है। लेकिन  फ्लिपकार्ट, अमेजन इंडिया और कई ऐसी वेबसाइटें हैं जो कि सीधे तौर पर ग्राहकों को उत्पाद बेच रही हैं और उन तक पहुंचाने का काम भी कर रही हैं। ईडी इस पहलू पर भी जांच कर रही है कि कहीं इन वेबसाइटों के जरिए कोई हवाला या अवैध पैसों का लेन-देन तो नहीं हो रहा है। दरअसल ई-कॉमर्स वेबसाइटें और प्रौद्योगिकी कंपनियां दुनिया भर में कर चोरी और नियामक अधिकारियों की जांच के दायरे में हैं।

[quote font_size=”16″ bgcolor=”#eaeaea” arrow=”yes” align=”left”]भारत में ई-कॉमर्स अच्छे और बुरे दोनों कारणों से सुर्खियों में है। एक तरफ ऑन लाइन खरीदारी से ई-कॉमर्स उफान पर है, वहीं इस पर कर चोरी और हवाला से लेन-देन के आरोप भी लग रहे हैं। दूसरी तरफ खुदरा व्यापारी बेलगाम ई-कॉमर्स पर कानूनी शिकंजा लगाने की मांग कर रहे हैं। [/quote]

इंग्लैंड में अमेजन, गूगल और स्टारबक्स जैसे वेबसाइटों को ई-कॉमर्स कानून का उल्लंघन करते हुए पाया गया था। भारत में विदेशी कंपनियों और ई-कॉमर्स पोर्टलों को पंजीकरण करवाना और भारतीय कानूनों का पालन करने की आवश्यकता है। इसलिए खुदरा व्यापारी सरकार से इस दिशा में उचित कदम उठाने की मांग बार-बार कर रहे हैं। खुदरा बाजार के व्यापारियों को ई-कॉमर्स वेबसाइटों से सबसे ज्यादा नुकसान हो रहा है। इसलिए वे चाहते हैं कि सरकार जल्द से जल्द कानून बनाए और इन्हें नियंत्रित करे। खुदरा व्यापारी सुधीर साहू का कहना है कि ‘ई-कॉमर्स वेबसाइट लागत मूल्य से भी कम कीमत पर सामान उपलब्ध करवा रहे हैं। ऐसे में यह सोचनीय है कि वे इतना घाटा क्यों उठा रहे हैं। उन्हें पैसे कहां से मिल रहे हैं, कौन-कौन लोग इसमें शामिल हैं। यह जानना जरूरी है। हो सकता है कि इसमें कालाधन लगाया जा रहा हो।’ ईडी भी इस दिशा में सक्रियता दिखा  रही है। मिंत्रा, फ्लिपकार्ट और अन्य कई ई-कॉमर्स वेबसाइटें है जिन पर हवाला को बढ़ावा देने का संदेह है। इनके बारे में कहा जा रहा है कि इन्हें विदेशों से पैसे मिल रहे हैं।

बाजार के जानकार इसलिए चिंतित हैं कि भारत में सक्रिय बड़ी ई-कॉमर्स वेबसाइटों ने वस्तुओं का बाजार मूल्य निर्धारण करना शुरू कर दिया है। एक-दूसरे से प्रतियोगिता की होड़ में वे 50 से 60 फीसदी तक मूल्य में कमी कर रहे हैं। इससे खुदरा बाजार और छोटे और मध्यम व्यवसायी गंभीर रूप से प्रभावित हो रहे हैं। उनके सामने मूल्य निर्धारण की समस्या खड़ी हो गई है। उनका कहना है कि किसी भी व्यापारी या कंपनी के लिए इतने कम लागत पर सेवाएं एवं वस्तुएं उपलब्ध करवाना संभव नहीं है। इसका नतीजा यह हो रहा है कि छोटे व्यवसायियों के लिए बाजार में खरीददार नहीं मिल रहे हैं और वे बाजार छोड़ने के लिए मजबूर हो रहे हैं।  उनका कहना है बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारतीय बाजार पर एकाधिकार करना चाहती है। इसलिए वे आधी से भी कम कीमत पर सेवाएं एवं खरीदारी की पेशकश कर रही हैं। अर्थशास्त्री इसे भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए भी खतरा मान रहे हैं। उनका कहना है कि भारत में चल रही ई-कॉमर्स वेबसाइटों के अनुचित व्यवहार पर गौर किया जाना चाहिए। भारत सरकार को तत्काल इसे नियंत्रित करने के लिए नियम बनाने चाहिए। ई-कामर्स से भारतीय बाजार असंतुलित हो रहा है। हालांकि सजे हुए परंपरागत बाजार अभी इतिहास की चीज नहीं हुए हैं और भारत जैसे देश में शायद होंगे भी नहीं। परंतु ऑनलाइन खरीदारी ने उनको कड़ी टक्कर देनी शुरू कर दी है।  क्योंकि परंपरागत दुकानों की तरह ही ई-कामर्स वेबसाइटों के पास हर सामान उपलब्ध हैं।

भारत में ई-कॉमर्स का मामला पूरी तरह अलग है। कुछ लोगों का मानना है कि इसका उद्देश्य मात्र लाभ कमाना और ढीली वाणिज्यिक नियमों का फायदा उठाना है। यहां ई-कॉमर्स को न तो किसी कानून लारा नियंत्रित किया जा रहा है और ना ही यह आर्थिक और सामाजिक विकास की दिशा में ही कोई योगदान दे पा रहा है। साथ ही एफडीआई से संबंधित कानूनी प्रावधानों, विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा), राष्ट्रीय कराधान कानून, साइबर कानून, साइबर सुरक्षा आदि की भी ई-कॉमर्स वेबसाइटें खुले तौर पर अनदेखी कर रही हैं। इन वेबसाइटों के अनुचित व्यापार व्यवहार के खिलाफ पिछले दिनों खुदरा व्यापारियों ने जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन भी किया।  खुदरा दुकानदारों के बिक्री में पिछले एक साल में 60 प्रतिशत की गिरावट हुई है। उनका कहना है कि सरकार ने जल्द कुछ नहीं किया तो उन्हें अपने दुकान बंद करने पड़ेंगे और फिर लाखों लोग बेरोजगार हो जाएंगे।  कानून के जानकारों का कहना है कि सरकार सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (आईटी एक्ट) 2000 में संशोधन कर उपयुक्त ई-कॉमर्स कानून का मसौदा तैयार करना चाहिए और उसे शीतकालीन सत्र में पारित किया जाना चाहिए। देश की अर्थव्यवस्था खुदरा बाजार पर निर्भर करती है। ऐसे में ई-कॉमर्स बाजार के साथ-साथ खुदरा बाजार का भी ध्यान रखना जरूरी है।.

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