बेचारा पाकिस्तान

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पाकिस्तान रूपी ऊंट पहली बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जैसे पहाड़ के नीचे आया है। भारत पहले भी प्रमाण देता रहा है कि पकिस्तान से आतंकवाद फैलाया जा रहा है।

करीब 30 साल पहले पाकिस्तान ने अपने यहां आतंकवादी पनाहगाहें बनवाईं। तभी से भारत दुनिया के हर मंच पर कहता रहा है कि पाकिस्तान को इससे विमुख करने की जरूरत है। नहीं तो भारत सहित पूरे क्षेत्र में आतंकवाद का कोहराम बना रहेगा।

पाकिस्तान की सेना और उसकी एजेंसियां आतंकवादी गिरोहों को ट्रेनिंग देती हैं। हथियार से लैस करती हैं। रह-हर कर उनका इस्तेमाल भारत में हत्या, हमले और विस्फोट में किया जाता रहा है।

आतंकवादी हिंसा में मारे गए भारतीयों की संख्या हजारों में है। परिवार के परिवार उजड़े हैं। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से पाकिस्तान के चेहरे का नकाब उतर गया है। उसे बचाने वाले भी बेबस हैं, क्योंकि पाकिस्तान की आतंकवादी हरकतों के विरोध में विश्व जनमत को जगाने में भारत सफल हो गया है।

इसका महत्व कितना अधिक और दूरगामी है, इसे समझने के लिए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के पहले की पृष्ठभूमि पर एक नजर दौड़ाना काफी होगा।

डोकलाम विवाद अर्से बाद निपटा। उसे भारत की राजनयिक सफलता माना गया। ठीक उसके बाद शिखर सम्मेलन हुआ। उसके लिए प्रस्थान किया प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने। जब वे जा रहे थे, तब उन्हें मीडिया के जरिए एक समूह सलाह दे रहा था कि ब्रिक्स के मंच पर पाकिस्तान के आतंकवाद का मसला न उठाएं तो अच्छा होगा। यह सलाह सद्भावना में ही दी जा रही थी। जितनी यह सलाह थी उतनी ही चेतावनी भी थी।

पहली बार ऐसा हुआ कि चीन में ब्रिक्स देशों को पाकिस्तानी आतंकवाद के खिलाफ
एकजुट करने में भारत को सफलता मिली। सिर्फ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषण में ही
उल्लेख होता तो उसे सफलता नहीं माना जाता। लेकिन ब्रिक्स के घोषणा-पत्र में पाकिस्तान
प्रेरित और संचालित आतंकवादी संगठनों के नाम का उल्लेख होना बड़ी घटना हो गई।

क्यों यह सलाह दी जा रही थी? क्या इसलिए कि चीन की नाराजगी झेलना कठिन है? जो भी हो, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पूरी दुनिया को एक बार फिर चकित कर दिया। जब उनकी बारी आई तो वे बोले।

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की तस्वीर छपी है। वे एकटक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को देखते हुए पाए गए। वे चकित हुए। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन सलाहों को हवा में उछाल दिया जो उन्हें मीडिया दे रहा था। उन्होंने खुद को साबित किया।

उस मंच से फिर आह्वान किया कि आतंकवाद मानवता के लिए बड़ा खतरा है। पाकिस्तान अपने यहां उसे पाल-पोस रहा है।

पहली बार ऐसा हुआ कि चीन में ब्रिक्स देशों को पाकिस्तानी आतंकवाद के खिलाफ एकजुट करने में भारत को सफलता मिली। सिर्फ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषण में ही उल्लेख होता तो उसे सफलता नहीं माना जाता। उनका दृढ़ संकल्प व्यक्त होता। लेकिन ब्रिक्स के घोषणा-पत्र में पाकिस्तान प्रेरित और संचालित आतंकवादी संगठनों के नाम का उल्लेख होना बड़ी घटना हो गई।

घोषणा-पत्र में उल्लेख है कि ‘हम दुनिया के कई क्षेत्रों में तालिबान, आइएस, अलकायदा, हक्कानी नेटवर्क, लश्कर-ए-तोएबा, जैश-ए-मुहम्मद और टीटीपी आदि के हिंसा फैलाने से उपजे हालात पर चिंता जताते हैं।’

जो काम गोवा के ब्रिक्स सम्मेलन में नहीं हो सका, वह चीन में संभव हो गया। यह भी बड़े महत्व की बात है। चीन को झुकना पड़ा है। तभी यह घोषणा-पत्र जारी हो सका। इसका दूरगामी प्रभाव पड़ेगा।

पाकिस्तान के शासकों में इससे बेचैनी बढ़ गई है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख्वाजा मुहम्मद आसिफ भागे-भागे चीन पहुंचे हैं। पहली बार यह भी हुआ है कि उसके रक्षा मंत्री जहां ब्रिक्स की घोषणा को खारिज कर रहे हैं, वहीं पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने माना है कि आतंकवादी संगठनों को अगर अब भी हम समर्थन, सहयोग और संरक्षण देते रहे तो हमें विश्व मंच पर इसी तरह अपमानित होना पड़ेगा।

इसे पाकिस्तान का कबूलनामा भी कह सकते हैं। हमेशा वह आरोपों और प्रमाणों को नकारता रहा है। पहली बार उसे कबूलना पड़ा है। इसे ही कहते हैं, ऊंट का पहाड़ के नीचे आना।

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विश्वसनीयता और प्रामाणिकता राय की पत्रकारिता की जान है। हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषीय न्यूज एजेंसी से उन्होंने पत्रकारिता में कदम रखा था। वे जनसत्ता के चुने हुए शुरुआती सदस्यों में एक रहे हैं। राय ‘जनसत्ता’ के ‘संपादक, समाचार सेवा’ के रूप में संबद्ध रहे। चार वर्षों तक पाक्षिक पत्रिका ‘प्रथम प्रवक्ता’ का संपादन किया। फिलहाल ‘यथावत’ के संपादक हैं।

1 टिप्पणी

  1. पाकिस्तान में लोकतन्त्र/प्रजातन्त्र/जनतन्त्र/जनता का शासन नहीं है।
    पार्टीतन्त्र/दलतन्त्र है। इसलिये सभी राजनैतिक दल आतंकवाद का समर्थन करने के लिये विवश रहते हैं।

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