बिखर गया एक सपना

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श्रीदेवी के असमय निधन से वह सपना बिखर गया जो चार साल की नन्हीं आंखों ने देखा था और पांच दशक तक न सिर्फ उस सपने को संजोए रखा बल्कि उसे निरंतर विस्तार भी दिया। तमिल फिल्म ‘कंधन करुनाई’ में दिग्गज शिवाजी गणेशन के सामने पूरे आत्मविश्वास से भगवान मुरुगा के वेश में खड़ी हुई बच्ची श्रीअम्मा अयंगर अयप्पन ने स्टूडियो की तेज रोशनी में झुलसते हुए अभिनय किया तो सिर्फ इसलिए ही नहीं कि परिवार का गुजारा हो सके।

एक सपना भी था कि वह और बच्चों से अलग दिखे। यह उसे पता नहीं था कि परिवार उस पर आर्थिक रूप से आश्रित है। बस इतना जानती थी कि फिल्मों की वजह से नए चमकीले कपड़े उसे मिल रहे हैं और आदर सत्कार भी।

पैसों का हिसाब किताब उसकी समझ से तब भी बाहर था और सुपर स्टार बनने के बाद भी श्रीदेवी ने इस गोरखधंधे में खुद को उझलने नहीं दिया।

बहरहाल सात-आठ साल में तमिल, तेलुगू और मलयालम की करीब पचास फिल्मों में बाल कलाकार की भूमिका निभाने के बाद लंबा चौड़ा नाम सिकुड़ कर श्रीदेवी हो गया लेकिन अभिनय की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई।

हिंदी भाषी दर्शकों से उसका पहला परिचय ‘जूली’ फिल्म से हुआ और आभास दे गया कि ‘माय हार्ट इज बीटिंग’ पर थिरकने वाली यह लड़की लंबी पारी खेलेगी।

रजनीकांत और कमल हासन को स्टार बनाने वाले के बालाचंदर ने दोनों के साथ महज तेरह साल की श्रीदेवी को 1976 में ‘मुंदरु मुदिचु’ में लेकर इसका रास्ता खोल दिया। उसके बाद तो सपना बड़ा होता गया और श्रीदेवी का कद बढ़ता गया।

1979 में सोलह साल की उम्र में अपने दादा की उम्र के एनटी रामराव के सामने तेलुगू फिल्म ‘वेतेगाडु’ में जिस सहजता से सब पर भारी पड़ीं, उससे संकेत मिल गया कि सुपर हीरोज को दमदार टक्कर देने वाली सुपर हीरोइन का आगमन हो गया है। उसी दौरान ‘सोलहवां सावन’ से हिंदी फिल्मों में प्रवेश की उनकी कोशिश जरूर फीकी रही।

लेकिन तीन साल बाद बालु महेंद्र की तमिल फिल्म के हिंदी रीमेक ‘सदमा’ ने उनका खूंटा ऐसा गाड़ा कि 1997 में ‘जुदाई’ के बाद स्वेच्छा से रिटायर होने तक हर तरह की चुनौतियों को ध्वस्त कर वे लगातार आगे बढ़ती गईं।

“जैसे दिलीप कुमार एक, अमिताभ बच्चन एक,
उसी तरह श्रीदेवी सिर्फ एक।”

स्टार बनना श्रीदेवी का कभी सपना नहीं रहा। चार साल की उम्र में पहली बार कैमरे का सामना करते समय ही उन्होंने खुद को स्टार घोषित कर दिया था।

उनका सपना था फिल्मों में एक लंबी पारी खेलने का और खुद को अद्वितीय साबित करने का। बोनी कपूर से शादी के बाद पंद्रह साल तक फिल्मी चकाचौंध से दूर रहते हुए भी उन्होंने अपना सपना मरने नहीं दिया।

‘इंगलिश विंगलिश’ और ‘मॉम’ में वे नए अवतार में दिखीं। ये फिल्में श्रीदेवी ने महज शौक के नाते नहीं की। साबित किया कि उम्र बढ़ने के बाद भी कोई हीरोइन अभिनय के नए आयाम गढ़ सकती है।

उम्र दराज हीरोइनों के लिए नया और सम्मानित रास्ता बनाने का उनका सपना उनके असामयिक निधन ने अधूरा छोड़ दिया। श्रीदेवी की फिल्मों में और उससे बाहर की यात्रा किसी परीकथा की तरह रोमांचक और उतार-चढ़ाव से भरपूर रही।

यह कथा उन्होंने खुद गढ़ी, अपने संकल्प और हर परिस्थिति का दृढ़ता से सामना करने की इच्छाशक्ति की वजह से। यह शायद उन्हें ईश्वरीय वरदान रहा कि निजी जीवन की त्रासदियों को उन्होंने अपने फिल्मी कॅरिअर पर हावी नहीं होने दिया।

एक परी की जिंदगी जीना चाहती थीं। हालात के थपेड़ों ने उन्हें जिस तरह झकझोरा, उसे देखते हुए कोई भी आम लड़की हताशा में डूब सकती थी।

लेकिन श्रीदेवी हर चुनौती के सामने जिस तरह डटी रहीं उससे उनके व्यक्तित्व का एक अलग ही पहलू सामने आया। फिल्मों के जरिए उन्होंने लोगों को हंसाया, रुलाया भी लेकिन अपने निजी जीवन की रुदन गाथा को वे अपने भीतर ही समेटे रहीं।

तमिल पिता अयप्पन और तेलुगू मां राजेश्वरी की इस पहली संतान को सामान्य बचपन ही कभी नसीब नहीं हो पाया। मां दूसरी पत्नी होने के दंश से विचलित रहीं तो पिता दो पत्नियों में उलझ कर किसी भी गृहस्थी को ठीक से नहीं बसा पाए।

आर्थिक नैया डगमगाने लगीं। गुजारे का संकट मुंह बाने लगा तो किताबों और गुडि़या का मोह त्याग कर श्रीदेवी को स्टूडियो के सख्त और अनुशासित जीवन में बंधना पड़ा।

श्रीदेवी ने ऐसे में अपनी सहजता और जीने का उत्साह नहीं छोड़ा। उन्होंने रूढ़ हो गई फिल्मी मानसिकता को लगातार झकझोरा और उसे बदला भी।

पिछले कुछ सालों से हीरोइन को हीरो के बराबर या उससे ज्यादा महत्व मिलने का जो सिलसिला शुरू हुआ है, उसकी नींव श्रीदेवी ने रखी।

‘सदमा’ में अभिनय के लिए जबर्दस्त सराहना पाने के बावजूद बॉक्स आफिस पर फिल्म के लुढ़कने के बाद जब उन्हें हिंदी फिल्मों के लिए अनुपयुक्त मान लिया गया तब 1983 में फिल्म ‘हिम्मत वाला’ से उन्होंने ऐसी धमाकेदार वापसी की कि उनके सामने लगभग सभी तत्कालीन हीरोइनें फीकी पड़ गईं।

चौदह साल तक उन्होंने हिंदी फिल्म जगत पर करीब-करीब एक छत्र राज किया। इस प्रचलित धारणा को भी तोड़ दिया कि दक्षिण की कोई हीरोइन हिंदी फिल्मों में नहीं खप सकती।

हालांकि उनसे पहले दक्षिण से रेखा और हेमामालिनी और उनसे भी पहले वैजयंती माला, पद्मिनी आदि भी आयात हुई थीं, लेकिन वे दक्षिण की फिल्मों में कोई खास दखल नहीं दे पाई थीं।

श्रीदेवी ने तमिल, मलयालम और तेलुगू की सौ से ज्यादा फिल्मों में झंडा गाड़ने के बाद हिंदी फिल्म जगत में प्रवेश किया और फतह हासिल की। समकालीन हीरोइनों में उनके सामने चुनौती सिर्फ माधुरी दीक्षित ही थीं।

दोनों ही सहज और स्वाभाविक अभिनय की माहिर लेकिन मील का पत्थर साबित होने वाली श्रीदेवी की फिल्मों की संख्या माधुरी से ज्यादा रहीं।

श्रीदेवी ने जो मौका मुहैया कराया था उसका फायदा उठा कर दक्षिणी कलेवर वाली जयाप्रदा, मीनाक्षी शेषाद्रि, भानुप्रिया, रामय्या, वैष्णवी, रंभा आदि एक दर्जन हीरोइनों ने हिंदी फिल्मों का दरवाजा खटखटाया।

पिछले कुछ सालों में ही आसिन, तापसी पन्नू, काजल अग्रवाल, श्रेया सरन, तमन्ना भाटिया, तृषा आदि ने भी दक्षिण में डंका बजाने के बाद हिंदी फिल्मों में परचम लहराने की कोशिश की लेकिन कोई भी अगली श्रीदेवी बनने लायक संभावना नहीं जगा पाई हैं।

फर्क पहली ‘हिम्मतवाला’ की श्रीदेवी और दोबारा बनी ‘हिम्मतवाला’ की तमन्ना भाटिया की तुलना करने से ही पता चल जाता है। कोई और हीरोइन दूसरी श्रीदेवी क्यों नहीं हो पाई? भविष्य में कोई और हो पाएगी, इसकी संभावना नहीं के बराबर है। जैसे दिलीप कुमार एक, अमिताभ बच्चन एक, उसी तरह श्रीदेवी सिर्फ एक।

बरसों तक नायक को सर्वोपरि मानने की धारणा को ध्वस्त कर श्रीदेवी ने जो मुकाम हासिल किया वह उन्हें संयोग से अथवा किसी की कृपा से नहीं मिला। दक्षिण के वरिष्ठ फिल्मकार के राघवेंद्र राव के दिशा निर्देशों का बस उन्होंने पूरी निष्ठा से पालन किया।

गुरू की सलाह सिर्फ यही थी कि फिल्मी चरित्र की आत्मा को समझ कर उसके अनुरूप खुद को ढाल लो। इसी सलाह पर चलते हुए श्रीदेवी ने कई यादगार फिल्में दीं।

अभिनय का श्रीदेवी का अंदाज सबसे अलग शायद इसलिए भी रहा क्योंकि उनमें जन्मजात प्रतिभा थी, स्थितियों को समझने और उन्हें पूरी स्वाभाविकता से साकार करने की।

नृत्य कौशल, संवाद अदायगी और भाव भंगिमाओं को श्रीदेवी की हमेशा खूबी माना गया। हालांकि नृत्य का उन्होंने कभी प्रशिक्षण नहीं लिया। लगभग सभी नृत्य निर्देशकों का कहना है कि उनके स्टेप्स कभी

“बरसों तक नायक को सर्वोपरि मानने की धारणा
को ध्वस्तकर श्रीदेवी ने जो मुकाम हासिल किया, वह उन्हें
संयोग से अथवा किसी की कृपा से नहीं मिला।”

परफेक्ट नहीं होते थे लेकिन अपने चेहरे के भावों में विविधता लाकर हर नृत्य गीत को आकर्षक बनाने की महारत उन्हें हासिल थी। शुरुआती दिनों में हिंदी ठीक से न बोल पाने के बावजूद उन्होंने अपने संवाद खुद बोलने का आग्रह किया।

उच्चारण दोष काफी समय तक बना रहा लेकिन इसका असर फिल्मी चरित्र पर नहीं दिखा। सुभाष घई की मानें तो शूटिंग से पहले रिहर्सल करने में उन्होंने कभी कोई रुचि नहीं दिखाई।

उस पर खासियत यह कि कैमरा चालू होते ही वे जो शॉट दे देती थीं, वह हर निर्देशक की उम्मीद से ज्यादा दमदार होता था। श्रीदेवी के व्यक्तित्व का सबसे बड़ा पहलू यह है कि अरसे तक सुपर स्टार रहते हुए भी स्टारडम के नशे में वे कभी डूबी नहीं।

एक अच्छी बेटी, सहृदय बहन और आदर्श पत्नी की भूमिका को भी उन्होंने सहजता से निभाया। बावजूद इसके कि एक अरसे तक पारिवारिक तनाव से वे जूझीं। सगी बहन श्रीलता ने संपत्ति को लेकर उन्हें अदालत में घसीटा।

मां ने उनकी कमाई में कथित रूप से हेराफेरी की। इसके बाद भी मां जब बीमार पड़ी तो शूटिंग छोड़कर वे लगातार उनके साथ रहीं। यही नहीं, पड़ोस के वार्ड में कैंसर से पीडि़त बच्ची की उनसे आशीर्वाद पाने की चाह को उन्होंने पूरा किया।

जब भी वे मां को देखने अस्पताल जातीं, उस बच्ची के साथ काफी वक्त गुजारतीं। मां के निधन के बाद बहन को सहारा देने में भी उन्होंने कोई गुरेज नहीं किया।

श्रीदेवी का आखिरी सपना अपनी बेटी जाह्नवी का एक्टिंग करिअर जमते देखने का था। अपने सफर में उन्होंने जो तनाव सहा था उससे वे बेटी को बचाना चाहती थीं।

पर बेटी ने फिल्मों में आने की जिद ठान ली तो श्रीदेवी ने उसके लिए उपयुक्त जमीन बनाई। लेकिन अब जाह्नवी की पहली फिल्म ‘धड़क’ देखने से पहले वे चली गईं।

एक त्रासद बचपन का ऐसा त्रासद अंत। पिछले कुछ सालों से हीरोइन को हीरो के बराबर या उससे ज्यादा महत्व मिलने का जो सिलसिंला शुरू हुआ है, उसकी नींव श्रीदेवी ने रखी।

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