बाघों के 25 स्टार्ट-अप से अरबों की कमाई

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ह आपको अजीब लगे पर हकीकत यही है कि भारत में इस समय बाघों के अनेक स्टार्ट-अप हैं और हरेक की कमाई करोड़ों नहीं अरबों रुपए में हैं।

अपने इन 25 स्टार्ट-अप से वे हमें एक साल में करीब 80 अरब रुपए की सेवाएं दे रहे हैं। उनके स्थाई पूंजीगत लाभों का सामूहिक मूल्य तो 1500 अरब रुपए से भी ज्यादा होता है।

देश के छह टाइगर रिजर्वों के संदर्भ में उनसे होने वाले आर्थिक, सामाजिक, पारिस्थितिक व पर्यावरणीय संबंधी लाभों का यह मूल्यगत आकलन वन प्रबंधन से जुड़े भारत व ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों के एक साझा दल ने किया है, जिसकी रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय जर्नल ‘इकोसिस्टम सर्विसेज’ में छपी है।

‘मेकिंग द हिडन विजिबल: इकोनॉमिक वैल्यू ऑफ टाइगर रिजर्व इन इंडिया’ के नाम यह अध्ययन उसी तरह चौंकाने वाला है, जिस तरह 1987-88 में पूरा देश श्रमशक्ति की रिपोर्ट से अवाक रह गया था।

उस रिपोर्ट से पहली बार लोगों को पता चला था कि असंगठित क्षेत्र की जिस महिला को हम हमेशा गरीब व उपेक्षित निगाहों से देखते हैं, वास्तव में देश की अर्थव्यवस्था में उसका योगदान बड़े-बड़े उद्योगपतियों से भी कहीं ज्यादा है। बाघों के बसाहट से होने वाले लाभों का यह अध्ययन दुनिया में पहली बार किया गया है।

बाघों के बसाहट से होने वाले लाभों का अध्ययन दुनिया में पहली बार
किया गया है।रोजगार, पानी, खेती, लकड़ी, इंधन, घास, जड़ी-बूटी इत्यादि तो कुछ ऐसे हैं,
जिनका लाभ व्यापक स्तर पर लोगों को मिलता है।


बाघों की करोड़ों की कमाई

भोपाल के भारतीय वन प्रबंधन संस्थान की प्रोफेसर मधु वर्मा के नेतृत्व में 11 वैज्ञानिकों के एक दल ने देश के छह टाइगर रिजर्व का अध्ययन कर उनके पारिस्थितिकीय, वानस्पतिक व अन्य कार्यों से होने वाले लाभों का आर्थिक आकलन इस आधार पर किया कि हमारे लिए जो काम यहां प्रकृति कर रही है, इन्हीं को अगर हमें करवाना पड़े तो कितना खर्च आएगा।

इसमें पेड़ पौधें, वन उपज, खेती, सिंचाई, जंगलों में से बहने वाले नदी-नाले, भूजल, मृदा संरक्षण, आदि के अलावा बाघों के संरक्षण के बाद से उनकी इन रिहायशों में बढ़ी हर प्रकार की जैव विविधिता का खास तौर से उल्लेख किया गया है। यही वह चीज है जिसके बारे में कुदरत में कैसे काम होता है और वह किस तरह हमारे पूरे वातावरण व पारिस्थितिकी को प्रभावित करती है, हम नहीं जानते या फिर बहुत कम जानते हैं।

किसी भी नेशनल पार्क की सर्वाधिक कीमती पूंजी यही है जिसको बचाए रखने का काम बाघ करते हैं। नेशनल पार्क ही क्यों किसी भी देश व समाज की समृद्धि व मजबूती का भी यह एक खरा आधार है। रिपोर्ट में सभी छह पार्कों से होने वाले चल-अचल पूंजीगत लाभों के अलावा ऐसे लाभों का भी उल्लेख किया गया है, जो सामने दिखते नहीं पर वे हमारे सामाजिक आर्थिक जीवन को बहुत दूर तक प्रभावित करते हैं।

मगर इन्हें बाजार में खरीदा या बेचा नहीं जा सकता। मसलन पश्चिम बंगाल के सुंदरबन कोलकाता के कचरे का बड़ा हिस्सा अपने में पचा जाते हैं। यह एक ऐसा काम है, जिसे बाजार नहीं कर सकता। पर अगर बाजार से करवाना ही पड़े तो जितना कचरा सुंदरबन एक साल में साफ करते हैं, उतने का प्रबंधन करने में डेढ़ अरब रुपए का खर्च आएगा। अर्थात् नगरपरिषद का सारा बजट इस एक काम में ही खर्च हो जाएगा।

इसी तरह काजीरंगा नेशनल पार्क की दलदली पारिस्थितिकी में विभिन्न प्रकार की मछलियां अपने घर बनाकर रहती है। बाढ़ आने पर वे उन घरों में से बाहर आकर अंडे देती हैं। तभी बहुत-सी मछलियां पानी के साथ ब्रहमपुत्र व उसकी सहायक नदियों में भी पहुंच जाती हैं। इस तरह ये नदियां मछलियों से भर जाती हैं।

यह ऐसा काम है जिसे बाजार या व्यक्ति नहीं कर सकता। यह तो उसी पारिस्थितिकी में होता है। पर उससे मछलियों के नदियों और जहां-जहां से वे नदियां बहती हैं, वहां के लोगें को होने वाले लाभों को वस्तु या मुद्रा में नाप पाना आसान नहीं।

जंगल से रोजगार

काजीरंगा व सुंदरबन के अलावा जिन चार टाइगर रिजर्वों का अध्ययन किया गया, वे हैं- उत्तराखंड का जिम कार्बेट, राजस्थान का रणथंभौर, मध्य प्रदेश का कान्हा, व केरल का पेरियार। देश के अलग-अलग कोनों में बसे और अलग-अलग जलवायु व वातावरण में पले-बढ़े इन नेशनल पार्कों की वनस्पति व पारिस्थितिकी में काफी अंतर है।

फिर भी अध्ययन दल ने ऐसी पच्चीस गतिविधियों को चुना है जो हर जंगल किसी न किसी रूप में कम या ज्यादा करता ही है। इनमें से कुछ काम ऐसे हैं जिनका लाभ स्थानीय लोगों को मिलता है, जैसे कि रोजगार, पानी, खेती, लकड़ी, इंधन, घास, जड़ी-बूटी इत्यादि तो कुछ ऐसे हैं जिनका लाभ व्यापक स्तर पर लोगों को मिलता है।

मसलन देश-विदेश से पर्यटक बाघों को देखने के लिए इन जंगलों में आते हैं। जंगलों से बहती नदियां या उनके भीतर के खोह दूर तक भूजल को रिचार्ज करते रहते हैं। पेड़ों की वजह से मिट्टी का कटाव रूकता है तो उसके पोषक तत्व पानी के साथ बह नहीं जाते। इससे वहां की मिट्टी और उपज दोनों की गुणवत्ता बढ़ती है। और सबसे बढ़ी बात इनके पेड़ कार्बन का संचय करते हैं।

यह वह काम है जिसे कृत्रिम तरीके से किसी सूरत में नहीं किया जा सकता। क्लाइमेट चेंज के सभी विवादों की जड़ में यह एक मुख्य मुद्दा है। पर क्या किसी भी नेशनल पार्क में भ्रमण करते हुए हमने कभी सोचा है कि जंगल में सिर ऊंचा किए ये लंबे-लंबे पेड़ सारी दुनिया की सुध ले रहे हैं?

पीने का पानी आज लगातार महंगा होता जा रहा है। दिल्ली के लोग यह तो जानते हैं
कि उन्हें उत्तर प्रदेश से गंगा का ‘प्योर-पानी’ मिलता है पर उन्हें यह जानकर हैरानी होगी
कि यह प्योर पानी उन्हें जिम कार्बेट नेशनल पार्क की वजह से मिल पा रहा है।

सौ मील के दायरे में स्थानीय संसाधनों के संवर्धन से समाज का विकास करके दुनिया की गरीबी, भूख व जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं से निपटा जा सकता है, समाजसेविका इला भट्ट की इस बात में भरोसा होते हुए भी सोचती थी उसमें समय कितना लगेगा। तब तक तो कार्पोरेट जगत सब साफ कर चुका होगा। पर इस अध्ययन से साफ हो गया कि स्थानीय स्तर पर पारिस्थितिकी के अनुकूल अगर काम किए जाएं तो उनका हजारों मील दूर तक असर होने में समय नहीं लगता।

अध्ययन के मुताबिक कार्बन संचयन का सर्वाधिक 70 प्रतिशत लाभ वैश्विक ही है। कार्बन पृथककरण का भी 70 प्रतिश्त लाभ उसी के खाते में है। देश के हिस्से में यह लाभ मात्र तीस प्रतिशत ही आता है। पर अगर ये वन कार्बन संचयन का यह काम नहीं करते तो उससे होने वाली ग्लोबल वार्मिंग के एक साल के सामाजिक व आर्थिक नुकसानों की कीमत करीब आठ अरब रुपए से ज्यादा होती।

इसी तरह जीन पूल संरक्षण के लाभ स्थानीय कम वैश्विक ज्यादा हैं। अध्ययन के मुताबिक बाघों के इस काम का मूल्य भी चार अरब रुपए से ज्यादा है।

पीने का पानी आज लगातार महंगा होता जा रहा है। दिल्ली के लोग यह तो जानते हैं कि उन्हें उत्तर प्रदेश से गंगा का ‘प्योर-पानी’ मिलता है पर उन्हें यह जानकर हैरानी होगी कि यह प्योर पानी उन्हें जिम कार्बेट नेशनल पार्क की वजह से मिल पा रहा है। इस पार्क के रामगंगा रिजरवायर से करीब दो करोड़ क्यूबिक मीटर शुद्ध पानी मिलता है।

यही पानी अगर आरओ से साफ करना पड़ता तो इसकी कीमत अध्ययन के मुताबिक 190 करोड़ रुपए आती। हम दिल्ली के लोग जब मन आता है गाड़ी उठा नैनीताल चल देते हैं। कभी सोचा ही नहीं कि रास्ते में पड़ने वाले रामगंगा रिजरवायर का हमसे कोई सीधा वास्ता भी है।

नैनीताल की सूखती झीलों से हम कभी चिंतित नहीं हुए। पर अब हमें यह समझ आ जाना चाहिए कि अगर ये सूखती हैं तो असर हम पर भी आएगा।

अगर बाघ के संरक्षण पर एक रुपया खर्च किया जाता है तो वह 530
गुणा होकर हमारे पास लौटता है। मुनाफे की अंधी दौड़ के इस युग में कौन-सा
कार्पोरेट हाउस है जो इस रिटर्न का दावा कर सकता है?

जरूरी हैं बाघ

कोई पूछ सकता है कि ये काम तो हर किसी जंगल के होते हैं इसमें बाघों की क्या भूमिका? इस बात को हम अमेरिका के यैलो स्टोन नेशनल पार्क से जान  सकते हैं। अमेरिकी सरकार ने पार्क के सारे भेडि़यों को खत्म कर दिया। नतीजन शाकाहारी पशुओं ने वहां की सारी वनस्पति को तहस-नहस कर समाप्त कर दिया। जिससे मिट्टी कमजोर पड़ गई।

पानी के अभाव में बची-खुची वनस्पति भी सूखने लगी। चारे व पानी के अभाव में पशु-पक्षी, जीव-जंतु सभी लुप्त होते चले गए। हरा-भरा जंगल सूखकर रेगिस्तान में बदलने लगा। दुर्दशा देख 1995 में फिर से भेडि़यों को यहां लाया गया और आज वही पार्क अपनी पूरी शानो-शौकत से वहां सिर उठाए आने वालों का स्वागत करता है। यैलो स्टोन पार्क के लिए जिस तरह मांसभक्षी भेडि़ए जरूरी थे, हमारे वनों के लिए बाघ जरूरी है। 

बाघों से कमाई

भारत में कभी 40 हजार से ज्यादा बाघ हुआ करते थे। पर बीसवीं सदी के अंत में इनकी संख्या मात्र 1800 ही रह गई। बेखौफ हुए लोगों ने नृशंसता से वन संपदा को लूटा, जिससे वन भी खत्म हो गए। तब 1973 में इंदिरा गांधी के काल में प्रोजेक्ट टाइगर की शुरूआत की गई। इसमें बाघों के शिकार पर 1972 में रोक लगाई थी।

उस समय नौ टाइगर रिजर्व बनाए गए, आज 47 टाइगर रिजर्व हैं। पत्रकार पल्लव बाघले ने इस अध्ययन के आधार पर निष्कर्ष निकाला है कि एक मंगलयान अंतरिक्ष में भेजने पर 420 करोड़ रुपए का खर्च आता है, जबकि दो बाघों से एक साल में होने वाले स्थायी लाभों का मूल्य 530 करोड़ रुपए है।

अध्ययन दल की प्रमुख मधु के अनुसार उनका निष्कर्ष है कि अगर बाघ के संरक्षण पर एक रुपया खर्च किया जाता है तो वह 530 गुणा होकर हमारे पास लौटता है। मुनाफे की अंधी दौड़ के इस युग में कौन-सा कार्पोरेट हाउस है जो इस रिटर्न का दावा कर सकता है? कौन सा स्टार्ट अप है जो हमें एक साथ इतनी सेवाएं, वह भी मुफ्त दे सकता है।

आज एक के साथ एक फ्री का जमाना है। यहां तो एक रुपए के बदले में पांच सौ मिल रहे हैं। पानी, बिजली, कचरा प्रबंधन, खेती, सिंचाई, स्वास्थ्य कौन-सी समस्या है जिसका हल हमें ये वन नहीं दे रहे। शर्त एक ही है-संरक्षण। तो ज्यादा निवेश कहां होना चाहिए? कार्पोरेट नीतियों में बाघों व वन संरक्षण को घोंचा न लगे यह देखना जितना सरकारों का काम है, उससे ज्यादा हमारा है।

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