बहुमत दो, मगर इतना मत दो

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अंग्रेजी में कहावत है-  प्रॉब्लेम ऑफ प्लेंटी। हिंदी में अधिकता का संकट। यही इकलौती चीज है जो अरविंद केजरीवाल को नरेंद्र मोदी के करीब लाती है। मामला ‘जो गति तोरी सो गति मोरी’ वाला है। 2014 में नरेंद्र मोदी को प्रचंड बहुमत मिला।

बीजेपी को जनता ने ऐसा आशीर्वाद दिया कि उसके लिए एनडीए की जरूरत ही खत्म हो गई। अपार जनसमर्थन के रथ पर सवार मोदीजी राजपथ पहुंचे तो उन्हें महसूस हुआ कि रथ की चाल थोड़ी सी धीमी है।

पीछे मुड़कर देखा तो नजर आया रथ में जुता विशाल गठबंधन। एक के बाद एक कई गांठे। गठबंधन की हर गांठ से आवाज आ रही थी-  पोर्टफोलियो अच्छा वाला चाहिए।

सरकार बीजेपी के दम पर चल सकती थी। लेकिन गठबंधन धर्म निभाते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने हर दल के कोटे से मंत्री बनाए । शिवसेना, लोक जनशक्ति और अकाली दल से लेकर अपना दल तक।

किसी को यह मौका नहीं दिया गया कि वह कह सके कि हमें तो ‘पराया दल’ समझा गया। सरकार बनी और सरकार चल पड़ी। उसके बाद ज्यादातर राज्यों में भी विजय पताका फहराने लगी।

बीजेपी में एक तरह से सांसद और विधायकों का ‘जनसंख्या विस्फोट’ हो गया। देश के संदर्भ में प्रधानमंत्री हमेशा ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ की बात करते हैं। लेकिन राजनीति में यह कहानी उल्टी हो गई। बड़े-बड़े वीआईपी आम आदमी के भाव हो गये।

“साईं इतना दीजिये जा में बहुमत समाये

               मैं भी अगुआ बनूं, कोई रूठा ना जाये ”

प्रधानमंत्री तो दूर अरुण जेटली तक से अप्वाइंटमेंट के लिए राजनीति के सूरमा तरसने लगे। सत्ता के गलियारे में मुंह लटका कर घूम रहे किसी भी आदमी को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता था कि यह कोई मंत्री है।

उधर विपक्ष भी कमजोर था, इसलिए बीजेपी के कई सांसदो ने विपक्ष की भूमिका निभाने का फैसला किया। लेकिन बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व बेपरवाह रहा।

नेताओं की इतनी बड़ी फौज है, अगर हरेक की बात सुनी जाने लगी तो चल गई सरकार! उधर बात ना सुनने की शिकायत गठबंधन के साझीदार भी करने लगे। चंद्रबाबू नायडू ने आंध्र-प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने का मुद्दा उठाया और उसके बाद पैर पटकते हुए एनडीए से बाहर चले आए ।

पार्टनरशिप तोड़ते हुए उन्होने इल्जाम मढ़ा-  प्रधानमंत्री के पास गठबंधन के नेताओं से मिलने का वक्त नहीं है। शिवसेना परमानेंटली शिकायती लहजे में है। बाकी गठबंधन साझीदारों का भी यही हाल है। लेकिन बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने कहा-  कोई समस्या नहीं है।

हमारे पास पर्याप्त संख्या में सांसद हैं। इस बीच एक के बाद एक करके लोकसभा उपचुनाव हुए और बीजेपी नौ सीटें हार गई। लेकिन केंद्रीय नेतृत्व के माथे पर शिकन नहीं क्योंकि संख्या पर्याप्त है।

बीजेपी के रूठे और लुटे-पिटे नेता सोच रहे हैं-  प्रचंड बहुमत बुरी चीज है। अपनी ही पार्टी में इज्जत घट जाती है। नेताओं के असली ठाठ तो अल्पमत वाली सरकार में ही होते हैं।

उधर अरविंद केजरीवाल की हालत एक बहुत बड़े गरीब परिवार के मुखिया जैसी है। विधानसभा चुनाव में दिल्ली की जनता ने आम आदमी पार्टी को इतनी सीटें दे दी कि केजरीवाल गिनना भूल गये।

“इतिहास गवाह है कि जिन पार्टियों को जरूरत से ज्यादा बहुमत मिलता है, वे उसे संभाल नहीं पाती हैं। देश की जनता ने राजीव गांधी को रिकॉर्ड तोड़ बहुमत दिया था। उन्हें समझ में नहीं आया कि आखिर इस बहुमत का करें तो क्या करें।”

उनकी हालत एक ऐसे बाप सरीखी हो गई जिसके दर्जन भर बच्चो में कोई पेड़ से गिरता है, किसी को ततैया काट खाती है तो कोई पड़ोसी के बाग से अमरूद चुराता पकड़ा जाता है।

बेबस बाप अकेला क्या-क्या करे? विधानसभा चुनाव जीतने के बाद केजरीवाल के पास पहला संकट यह था कि इतने विधायकों को कैसे संभालें। सबको मंत्री बना नहीं सकते। आखिरकार उन्होने एक रास्ता निकाला।

लगभग दो दर्जन विधायकों को उन्होने संसदीय सचिव का दर्जा दे दिया। लेकिन मामले में कानूनी पेंच फंस गया। संसदीय सचिव को लाभ का पद माना गया और इन विधायकों की सदस्यता रद्द हो गई।

हालांकि कोर्ट का फैसला पक्ष में गया है लेकिन मामला अब भी उलझा ही हुआ है। केजरीवाल मन ही मन सोच रहे होंगे-  अगर बीस सीटें कम ही मिली होती तो ज्यादा अच्छा होता। इन विधायकों को काम देने के चक्कर में इतने पापड़ ना बेलने पड़ते।

इतिहास गवाह है कि जिन पार्टियों को जरूरत से ज्यादा बहुमत मिलता है, वे उसे संभाल नहीं पाती हैं। देश की जनता ने राजीव गांधी को रिकॉर्ड तोड़ बहुमत दिया था।

उन्हे समझ में नहीं आया कि आखिर इस बहुमत का करें तो क्या करें। जब अगली बार चुनाव हुए तो सीटें घटकर आधी रह गईं। आंध्र प्रदेश की जनता ने 1995 में एन.टी.रामाराव को ऐतिहासिक बहुमत दिया था। राज्य में विपक्ष का नामो-निशान तक नहीं बचा था।

लेकिन रामाराव के घर से बेटी लाने वाले चंद्रबाबू नायूड रातो-रात बहुमत भी ले गए । सारे विधायक दामाद नायडू के पास और रामाराव बेचारे खाली हाथ। राजस्थान की जनता ने पिछले विधानसभा चुनाव में वसुंधरा राजे को प्रचंड बहुमत दिया।

जिन नेताओं को बढि़या कुर्सी और उचित सम्मान नहीं मिला उन सबने विरोध का झंडा उठा रखा है और महारानी का आसान डोल रहा है। अगर संख्या वाजिब हो तो संभालने में आसानी होती है। प्रचंड बहुमत सचमुच जी का जंजाल है।

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