बस्तर के इतिहास का खूनी मोड़

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स्तर चार दशकों से चरम वामपंथी हिंसा का शिकार बना हुआ है। आस-पास के राज्यों की तरह नक्सली वहां भी ‘मनुष्यों का आखेट’ करते हैं। उनका साथ न देने वाले आदिवासियों को मुखबिरी का आरोप लगाकर मौत के घाट उतार देते हैं।

छत्तीसगढ़ की डॉ.रमन सिंह सरकार को यह जटिल समस्या विरासत में मिली थी। इस वनवासी अंचल में व्यापक विकास, शिक्षा के प्रसार तथा बड़े पैमाने पर सड़कों का निर्माण करके स्थानीय निवासियों का मन जीतने में शासन काफी हद तक सफल हुआ है।

पुलिस एवं सुरक्षा बल आक्रामक रणनीति बनाकर चरमपंथियों को खदेड़ने में सफल भी हुए हैं। फिर भी रोग पुराना और जटिल है। इसका निदान आसान नहीं।

नक्सल समस्या पर लिखते समय ध्यान उस दुर्भाग्यपूर्ण ऐतिहासिक गलती की ओर चला जाता है जब राजनीतिक स्वार्थ और व्यक्तिगत ईष्या के कारण सदियों से शांत, सुरम्य और अलमस्त रहे बस्तर की वादियों में बारूद का जहर घोल दिया गया।

वह मनहूस दिन था 25 मार्च 1966 का। उस दिन जगदलपुर के राजमहल में देवी दंतेश्वरी की पूजा करने जा रहे आदिवासियों के हृदय सम्राट प्रवीरचंद्र भंजदेव को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ.द्वारका प्रसाद मिश्र और मुख्य सचिव आर.सी.वी.पी.नरोन्हा के निर्देश पर पुलिस ने गोलियों से भून दिया था।

बस्तर के पूर्व नरेश प्रवीरचंद्र आदिवासियों में दो कारणों से अत्यंत लोकप्रिय थे। पहला, वह आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए शासन-प्रशासन से निरंतर जूझा करते थे।

“नहीं भूलेंगे 25 मार्च 1966 राजनीतिक स्वार्थ और व्यक्तिगत ईष्या के कारण सदियों से शांत, सुरम्य और अलमस्त रहे बस्तर की वादियों में 25 मार्च 1966 को बारूद का जहर घोल दिया गया।”

दूसरा देवी दंतेश्वरी का मुख्य पुजारी होने के नाते वह आदिवासियों की आस्था के केंद्र भी थे। उनके होते हुए आदिवासी अपने आपको सुरक्षित मानते थे। वस्तुत: शताब्दियों से बस्तर को एकजुट रखने में वहां की तीन संस्थाओं की भूमिका निर्णायक रहती थी।

प्रथम, देवी दंतेश्वरी, दूसरे बस्तर नरेश और तीसरे आदिवासियों को शिक्षित, दीक्षित और संस्कारित करने वाले घोटुल। पांच वर्ष की आयु पार करते ही सभी आदिवासी बच्चे और बच्चियां शाम ढलते घोटुल में पहुंच जाया करते थे।

वहां उन्हें नृत्य, गीत-संगीत और हस्तशिल्प का प्रशिक्षण दिया जाता था। भोर होने पर वे अपने घरों को लौट जाते।प्रवीर चंद्र भंजदेव की हत्या से इन तीनों संस्थाओं का बिखराव शुरू हो गया। बस्तर में एक महाशून्य निर्मित हो गया।

उसे भरने के लिए अनेक शक्तियां सक्रिय हो गयीं। इनमें सर्वाधिक संगठित संस्थान था आंध्र प्रदेश के वारंगल का काकतीय विश्वविद्यालय। उसके बारे में आम मान्यता थी कि वहां के विद्यार्थी से लेकर कुलपति तक वामपंथी रुझान के हुआ करते थे।

बस्तर का राजवंश भी काकतीय था और आम धारणा थी कि वारंगल से देवी दंतेश्वरी की प्रेरणा एवं कृपा से ही वह बस्तर पहुंचा था। नक्सलबाड़ी आंदोलन से भी पहले वारंगल में चरम वामपंथी विचारधारा का अंकुरण हो चुका था।

“उस दिन जगदलपुर के राजमहल में देवी दंतेश्वरी की पूजा करने जा रहे आदिवासियों के हृदय सम्राट प्रवीरचंद्र भंजदेव को  शासन के निर्देश पर पुलिस ने गोलियों से भून दिया था।”

वारंगल के प्राध्यापकों और युवकों ने आदिवासियों की आहत भावनाओं को सहलाते करते हुए उन्हें विश्वास दिलाया कि उनके नरेश के हत्यारों को वे अवश्य दंड दिलाएंगे।

चूंकि तब तक पुलिस और प्रवीर की हत्या की जांच के लिए गठित आयोग किसी भी अपराधी को कठघरे में खड़ा नहीं कर पाए थे, इसलिए आदिवासियों को सहसा उनकी बातों पर भरोसा होने लगा।

उन दिनों बस्तर में जल-जनित रोगों और मलेरिया से बड़ी संख्या में आदिवासी मारे जाते थे। संसद में उनकी खबरें अक्सर उछला करती थीं। शुरू में उन्होंने आदिवासियों में मलेरिया की दवाइयां बाटीं।

उनके लिए सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने के लिए जन-सहयोग से दो-एक तालाब भी खुदवा कर उनका विश्वास जीता। रफ्ता-रफ्ता बस्तर का घना वन-प्रांतर चरम वामपंथियों की सक्रियता का सुरक्षित ठिकाना बनता गया।

 प्रवीर चंद्र भंजदेव हत्याकांड की स्मृतियों को कुरेदता हूं तो सारा दृश्य आंखों के सामने कौंध जाता है। 27 मार्च 1966 को दो वरिष्ठ पत्रकारों- मधुकर खेर और गोविंद लाल वोरा के साथ इन पंक्तियों का लेखक रायपुर से जगदलपुर पहुंच पाया था।

प्रवीर के निजी सचिव गनपतलाल साव ‘बिलासपुरी’, उनके सहायक देवेश दत्त तिवारी, समाजवादी नेता रविशंकर वाजपेयी, पत्रकार किरीट दोशी और उस बर्बर गोलीकांड के प्रत्यक्षर्दिशयों ने जो कुछ बताया, उसके अनुसार प्रवीर चंद्र पूजा के वस्त्र में थे।

हथियारबंद पुलिस राजमहल में घुस गई। बिना कोई चेतावनी दिए उसने गोलीबारी शुरू कर दी। भंजदेव पुलिस से जान बचाने के लिए महल की सीढि़यों पर दौड़ने का प्रयास कर रहे थे।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार उनका पीछा करते हुए उनको गोलियों से भून दिया गया। प्रवीर के अनुज विजय चंद्र भंजदेव ने विस्तार से बताया कि कैसे उनकी नृशंसतापूर्वक हत्या की गई।

अंग्रेजी में उनका वाक्य था, ‘माय ब्रदर वाज चेज्ड लाइक एक डॉग, एंड बुचर्ड।’ यही साक्ष्य उन्होंने जस्टिस पांडेय जांच आयोग के सामने भी दिया। लेकिन प्रवीर की हत्या के किसी भी दोषी के खिलाफ सरकार ने कोई कार्रवाई नहीं की।

प्रवीर आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए तत्कालीन कांग्रेस सरकार से निरंतर जूझते रहते थे। अपनी आत्मकथा ‘आई प्रवीर दि आदिवासी गॉड’ में उन्होंने विस्तार से बस्तर के आदिवासी- हितों के हनन और उनके शोषण का वृत्तांत दिया है।

उन्होंने लिखा ‘वनोपज पर अधिकार से वंचित आदिवासी आंदोलनों को बार-बार बर्बर बल प्रयोग द्वारा कुचला गया। 31 मार्च 1961 को बस्तर के लोहांडीगुड़ा में शांतिपूर्ण सत्याग्रह के लिए एकत्र आदिवासियों पर लाठीचार्ज और फिर पुलिस गोली-चालन किया गया। उनमें कितने लोग मारे गए, इसके प्रामाणिक आंकड़े प्राप्त नहीं हो सके।’

 प्रवीर चंद्र भंजदेव मध्य प्रदेश सरकार की आंखों की किरकिरी मुख्यत: दो कारणों से थे। पहला, आदिवासी अपने ‘महाराजा’ प्रवीर पर अगाध आस्था रखते थे। उनके निर्देश पर ही चुनावों में उनकी पसंद के उम्मीदवारों को वोट देते थे।

दूसरा, बस्तर की प्रचुर वन और खनिज संपदा का लाभ स्थानीय आदिवासियों को दिलाए जाने के लिए सतत सक्रिय रहते थे। बैलाडीला की अकूत खनिज संपदा को बस्तर से बाहर ले जाए जाने तथा बड़ी मात्रा में विदेश भेजने के भी वह विरोधी थे।

अपनी आत्मकथा में प्रवीर ने लिखा था, ‘इस्पात का एक कारखाना बैलाडीला के आसपास लगाने का निर्णय केन्द्र सरकार ने लिया था, किन्तु दफ्तरी कमीशन ने आर.पी.नरोन्हा और रविशंकर शुक्ल के दबाव में इसे गोवा या विशाखापट्टनम में लगाने की सिफारिश कर दी।

इसका एक मात्र कारण क्षेत्रीय नेतृत्व की कमजोरी था। राष्ट्र को इस प्रकार की बड़ी योजनाएं अन्यत्र भेजने के प्रलोभनों से बचना चाहिए।’ आत्मकथा में प्रवीर ने यह भी लिखा है कि नरोन्हा, मुख्यमंत्री के राजनीतिक एजेंट का काम करते हुए उन्हें चुनावों में कांग्रेस का समर्थन करने के लिए कहा करते थे।

इनकार करने पर उनकी संपत्ति ‘कोर्ट ऑफ वार्ड’ की निगरानी में रख दी गई। प्रवीर बस्तर में छोटे-छोटे उद्योगों और हस्तशिल्प को बढ़ावा देने के पक्षधर थे।

आत्मकथा में उन्होंने लिखा, ‘बस्तर की तुलसी डोंगरी तथा बैलाडीला पर्वत श्रंखला के आधार स्थल के आसपास के मैदानों में इस प्रकार के छोटे-छोटे उद्योग बड़ी आसानी से लगाए जा सकते हैं।

किन्तु प्रशासन द्वारा बनाए गए जटिल नियमों और प्रक्रिया के कारण सीधे-सादे और अनपढ़ स्थानीय लोगों को ये सुविधाएं नहीं मिल पातीं। खनिज संपदा के दोहन के लिए बाहर के प्रभावशाली लोगों को प्राथमिकता के आधार पर खनिज के पट्टे दे दिए जाते हैं।

मैं दावे से कहता हूं कि राजनीतिक दबाव और हस्तक्षेप के कारण यहां की सहकारी समितियां भी स्थानीय लोगों की मदद करने में असफल रहती हैं। जिस क्षण हम इस मकड़जाल से मुक्त हो जाएंगे, उसी क्षण अपने क्षेत्र के विकास तथा सामाजिक पुनरुत्थान का लाभ हमारे लोगों को मिलना शरू हो जाएगा।’

 प्रवीर चाहते थे कि बस्तर में आदिवासियों की शिक्षा-दीक्षा के लिए एक विश्वविद्यालय खोला जाए, परंतु उनकी इस महत्वपूर्ण अभिलाषा को कांग्रेस ने अपने लंबे शासनकाल में कोई तवज्जो नहीं दी।

अंतत: सन 2003 के अंत में छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद इसे पूरा किया गया। प्रवीर ने यह भी लिखा, ‘आदिम समुदाय को कृषि एवं आवासीय भूखंड नि:शुल्क दिए जाने चाहिए। सिंचाई के साधनों के समुचित विकास को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।’

चेतावनी देते हुए उन्होंने लिखा था, ‘यह कटु सत्य है कि भारतीय जनमानस सत्ता के मद में चूर कांग्रेसियों का वर्तमान में बहिष्कार करने में सफल नहीं हो पा रहा है। प्रजातंत्र को सुनिश्चित करने के लिए यह एक गंभीर लक्ष्य है।

हमारा बहुत बड़ा दुर्भाग्य है कि देश के लोग स्वार्थी तथा नैतिक रूप से पतित लोगों के भुलावे में आ गए हैं। यह पूरे भारतीय समाज को पतित कर रहा है और जनसामान्य का भी नैतिक पतन निरंतर होते जा रहा है।…

मैं विश्व के अन्य गणतंत्रों तथा राष्ट्रों से अपील करता हूं कि वे यह देखें कि ऐसा कुछ किया जा सकता है या नहीं? अन्यथा सत्ता के सुख के लिए जनसामान्य को पतित करने वालों का मनोबल कभी भी कमजोर नहीं हो सकेगा। आजकल कांग्रेस के राजनीतिक छल की कलई खुलती जा रही है।…

जिस दिन इस अनैतिक राजनीतिक दर्शन की समाप्ति होगी, उसी दिन उसकी राख से इस देश के सामाजिक पुनरुत्थान के गुलाबों की कलियां खिल उठेंगी।’…

‘दूसरी ओर मैं देख रहा हूं कि कांग्रेस की यह सरकार बस्तर को एक और बेल्जियम या कांगो की तरह बना देना चाहती है। वही पुराने आश्वासनों का नवीनीकरण किया जा रहा है और वही अवसर प्रदान करने का औचित्य दिखाकर निरीह तथा शोषित लोगों को बहलाया जा रहा है। ठीक उसी तरह जैसे इस दंडकारण्य परियोजना के ठेकेदार अपने मजदूरों को बहलाते हैं।…

कृषिभूमि से केवल सात मील दूर उमरकोट बांध जैसी परियोजना पर अब तक करोड़ों रुपयों का अनावश्यक व्यय हो चुका है, परंतु अब भी वह केवल विचाराधीन है। यह कदापि आश्चर्यजनक नहीं है कि पंडित नेहरू ने अचानक इस परियोजना को निरस्त कर दिया है।’

बड़े आहत से मन से उन्होंने लिखा, ‘अब मैं इस पुस्तक में बड़ी वेदना से लिख रहा हूं कि भारत के वर्तमान सत्ताधारी अपने ही संविधान के तहत बस्तर के महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव काकतीय के साथ निष्पादित और हस्ताक्षरित संविदा तथा समझौते का सरासर उलंघन कर अपने ही पूर्वजों तथा भारतीय संविधान की घोर अवमानना कर रहे हैं। ऐसा करते हुए उन्होंने लोकतंत्र का घृणित अपमान किया है।…

सच पूछा जाए तो भारतीय संविधान के इस प्रकार किये गए हनन की जो भी जांच-पड़ताल की गई है वह लीपापोती मात्र है। इसे किसी भी प्रकार से निष्पक्ष नहीं कहा जा सकता।

हमारे महान राष्ट्र भारत के लोग कभी भी नहीं जान पाएंगे कि यह सब उन लोगों का प्रपंच मात्र है। ये षड्यंत्रकारी इस देश के निवासियों को मोहक आश्वासनों का झुनझुना थमा कर संपूर्ण भारत में वंशानुगत सत्ता को मजबूत करना चाहते हैं।’

प्रवीरचंद्र भंजदेव इन पंक्तियों के साथ अपनी आत्म कथा का समापन करते हैं, ‘महान भारतीय सनातन धर्म अपने उस महान राष्ट्र की सहायता करे, जो विश्व की सभी संस्कृतियों तथा धर्मों को सदा दीप्त करता आया है। इस देश को जड़ता तथा आज सर्वत्र व्याप्त अंधकार से बाहर निकाल कर इसे पूर्ववत तेजस्वी एवं प्रकाशमान बना कर पुन: शेष विश्व का मार्गदर्शन करने की सामर्थ्य प्रदान करे।’ (मूल अंग्रेजी से अनुदित)

प्रवीर चंद्र भंजदेव ने यह पुस्तक अपनी हत्या से कुछ ही दिन पूर्व लिखी थी। इसे पढ़ने से लगता है, उन्हें अपनी हत्या का पूर्वाभास था। प्रवीर चंद्र भंजदेव की हत्या के किसी भी दोषी को शासन-प्रशासन और न्यायालय ने दंडित नहीं किया, परंतु प्रामाणिक जानकारी के अनुसार

इस अमानुषिक गोलीकांड के बाद डी.पी. मिश्रा कभी सत्ता में नहीं आए। असाध्य रोग से ग्रस्त होकर अपने रक्त से भीगते हुए पीड़ादायक मृत्यु को प्राप्त हुए। हत्याकांड की योजना में शामिल बस्तर के जिला कलक्टर अकबर मनोसंताप से पीडि़त होकर अंतिम सांस तक संतप्त रहे।

मुख्य सचिव नरोन्हा का युवा पायलट पुत्र राजकीय विमान की उड़ान के दौरान बस्तर के आसपास दुर्घटनाग्रस्त होकर मारा गया। उनके साथ मध्य प्रदेश के गृहसचिव और पुलिस महानिरीक्षक की भी अकाल मृत्यु हो गई।

संभवत: आत्मग्लानि से ग्रस्त नरोन्हा ने प्रायश्चित के लिए भोपाल के निकट एक चर्च में पादरी बन कर शेष जीवन बिताया। उससे यह धारणा परिपुष्ट हो गई कि देवी दंतेश्वरी अपने किसी प्रिय पुजारी का अनिष्ट करने वाले को बख्शती नहीं।

लेखक का परिचय

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। दैनिक भास्कर रायपुर और संडे आब्जर्वर दिल्ली के संपादक रहे हैं।)

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