पोर्नोग्राफी की दुनिया में खोता बचपन

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ढ़ती तकनीक के इस दौर में बच्चों को उसके दुष्प्रभावों से बचाने का सवाल समाज और देश के सामने बड़ी चुनौती बन गया है। 127 करोड़ की आबादी वाले इस देश में 100 करोड़ से अधिक मोबाइल फोन तथा स्कूलों में इंटरनेट से जुड़कर बच्चे अब जल्दी बड़े हो रहे हैं।

इसकी गंभीरता को विचारक केएन. गोविंदाचार्य ने पांच वर्ष पहले ही समझ लिया था और सरकार से इंटरनेट के कानूनों का कड़ाई से पालन कराने की मांग को लेकर दिल्ली उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर की थी।

भारत में कॉन्ट्रैक्ट एक्ट कानून के अनुसार 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के साथ सोशल मीडिया कंपनियों द्वारा किए गए अनुबंध गैरकानूनी हैं। अमेरिका में 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चे कानून के अनुसार सोशल मीडिया जैसेफेसबुक, यूट्यूब इत्यादि से जुड़ नहीं सकते और 13-18 उम्र के बच्चे मातापिता के माध्यम से ही सोशल मीडिया से जुड़ सकते हैं।

इन नियमों का सोशल मीडिया कंपनियों के अनुबंध में भी उल्लेख रहता है, जिन्हें केन्द्र सरकार ने दिल्ली उच्च न्यायालय में हलफनामा दायर कर भारत में भी मान्यता दे दी। गोविंदाचार्य मामले में बच्चों को साइबर संसार में सुरक्षा देने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय ने सरकार को अनेक आदेश दिए थे, जिन्हें लागू करने में पूर्ववर्ती संप्रग और वर्तमान राजग सरकार पूर्णत: विफल रही हैं।

भारत में स्मार्ट फोन और मोबाइल से 25 करोड़ लोग एडल्ट कंटेन्ट
देखते हैं, जो डिजिटल इंडिया में सबसे तेजी से बढ़ता बाजार है।

सोशल मीडिया कंपनियां अपना कारोबार और लाभ बढ़ाने के लिए छोटे बच्चों को गलत जन्म तारीख के विवरण के माध्यम से फर्जी अकाउंट बनाने की खुली छूट देती हैं। इस बात के सबूत बीबीसी और टीसीएस के सर्वे में मिलता है, जिसके अनुसार 10 से 12 वर्ष के तीन चौथाई बच्चे तथा 13 से 18 के 96 फीसदी बच्चे सोशल मीडिया से जुड़े हुए हैं।

स्कूलों में पढ़ाई का अजब तरीका बन गया है, जहां शिक्षकों द्वारा बच्चों को इंटरनेट से होमवर्क करने के लिए प्रेरित किया जाता है। इससे बच्चों की पढ़ने की क्षमता के साथ मस्तिष्क के क्रियाशील विकास को काफी क्षति पहुंचती है। एसोचम की ओर से किए गए सर्वे के अनुसार सोशल मीडिया के अधिक इस्तेमाल से बच्चों में खेलकूद के साथ पढ़ाई में एकाग्रता की कमी, खराब खानपान की प्रवृत्ति और अवसाद के मामलों में बढ़ोत्तरी हो रही है। इसके अलावा सोशल मीडिया में फेकन्यूज से एक भारत और इसके दुष्प्रभावों से श्रेष्ठ भारत का सपना भी दरक रहा है।   

इंटरनेट के वहशी बाजार में बच्चों का नग्नता तथा अश्लीलता के लिए बढ़ता इस्तेमाल सोचनीय है। डिजीटल इंडिया के दौर में इंटरनेट तथा मोबाइल कनेक्टविटी के विस्तार के साथ बच्चों को पोर्नोग्राफी के खतरे से बचाने की जिम्मेदारी भी तो केन्द्र सरकार की है।

पोर्नोग्राफी रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा पिछले चार वर्षों में अनेक निर्देशों के पालन में विफलता से, कानूनों की लचरता के साथ सरकार की निरीहता भी स्पष्ट हो रही है। इंटरनेट के मामलों में केन्द्र सरकार ही प्रभावी कार्यवाही कर सकती है, पर पोर्न वेबसाइटस को रोकने में सरकार पूर्णत: विफल रही। गैरकानूनी होने के बावजूद पोर्नोग्राफी का विस्तार इस बात से जाहिर है कि पोर्न स्टार रही सनी लियोनी गूगल में सर्वाधिक सर्च होने की वजह से भारत की सबसे चर्चित सेलिब्रिटी हैं।

विदेशों में यौन पिपासु लोगों द्वारा बच्चों का पोर्नोग्राफी के लिए इस्तेमाल होता है, जो भारतीय कानून के अनुसार पूर्ण प्रतिबंधित है।

भारत में आईपीसी, आईटी एक्ट तथा अन्य कानूनों के अनुसार पोर्नोग्राफिक साहित्य या वीडियो का निर्माण, प्रकाशन तथा प्रसारण गैरकानूनी है। बच्चों की सुरक्षा के लिए पास्को जैसा सख्त कानून होने के साथ पोर्नोग्राफी के लिए पांच साल की सजा और दस लाख तक के जुर्माने का प्रावधान है।

इसके बावजूद भारतीय बाजार में 20 लाख से अधिक वीडियो तथा अनेक वेबसाइट्स के माध्यम से पोर्नोग्राफी की सहज उपलब्धता से बच्चों का जीवन नर्क बन रहा है। आंकड़ों के अनुसार बलात्कार तथा टीन प्रेग्नेंसी की संख्या में वृद्धि का बड़ा कारण अश्लील वीडियो का बढ़ता चलन है।

पोर्नोग्राफी का निर्माण और प्रसारण ही गैरकानूनी है, जिसे रोकने में सरकार विफल रही तो फिर पोर्नोग्राफी देखने को ही अपराध बनाने की बेतुकी मांग की जाने लगी। पोर्नोग्राफी बनाने तथा वितरण के खिलाफ कानून का पालन कराने में सरकार विफल रही तो फिर पोर्नोग्राफी देखने के विरुद्ध यदि कानून बन भी जाए तो उसका पालन कौन सी सरकारी मशीनरी कराएगी?

सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसके पहले भी इंटरनेट कंपनियों को लिंग जांच संबंधी विज्ञापन रोकने के आदेश दिए गए थे, पर उनका पालन अभी तक सुनिश्चित नहीं हो सका है। संताबंता जैसे आपत्तिजनक चुटकुलों को इंटरनेट में रोकने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट कोई फैसला नहीं ले पाई, क्योंकि सरकार के पास इंटरनेट के नियमन के लिए तकनीक और इच्छाशक्ति का अभाव है।

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह बताया कि बाल पोर्नोग्राफी के मुद्दे से निपटने के लिए समग्र कदमों के तहत पिछले महीने 3,500 बेवसाइट्स को ब्लॉक किया गया। सरकार को यह भी बताना चाहिए कि ब्लॉक की गई बेवसाइट्स नए तरीके से कैसे फिर बाजार में गई और यूट्यूब जैसे चैनलों में पोर्नोग्राफी कितनी आसानी से उपलब्ध है? पोर्नोग्राफी बच्चे और बड़े सभी के लिए गैरकानूनी है। फिर ऐसी सभी बेवसाइट्स पर सख्ती से प्रतिबन्ध लगाने की बजाए, सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में मामले को बेवजह भटकाया जा रहा है।

सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने स्टेट्स रिपोर्ट दायर करके बताया कि भारत में पोर्नोग्राफी पर लगाम लगाने के लिए अमेरिका स्थित एक निजी संस्था की मदद ली जा रही है। हकीकत यह है कि अमेरिकी संस्था नेशनल सेंटर फॉर मिसिंग एण्ड एक्स्प्लॉयटिड चिल्ड्रन (एनसीएमईसी) लापता और पीडि़त बच्चों के बारे में 99 देशों की कानून परिवर्तन एजेंसियों को नि:शुल्क जानकारी देती है, जिसके साथ सीबीआई पिछले पांच वर्षों में अभी तक ठोस सम्पर्क ही नहीं कर पाई।

केन्द्र सरकार की तरफ से पेश एएसजी ने सुप्रीम कोर्ट में बताया कि स्कूल की बसों में जैमर लगाना संभव नहीं है, परन्तु स्कूलों में सीबीएसई द्वारा जैमर लगाने पर विचार किया जा रहा है। आईटी एक्ट तथा 2011 में बनाए गए नियमों के अनुसार पोर्नोग्राफिक कंटेंट तथा वेबसाइट्स को रोकने की जवाबदेही इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स (आईएसपी) की है, जिन्हें कानूनी भाषा में इंटरमीडियरी कहा जाता है।

टीवी तथा अखबार में आपत्तिजनक सामग्री के प्रसारण के लिए संपादक की
जवाबदेही का कानून है। सेंसर बोर्ड के पुराने कानूनों का पालन करके फिल्मों में गालियां
रोकने का हास्यास्पद प्रयास हो रहा है। वहीं दूसरी ओर इंटरनेट कंपनियों के नियमन
में सरकार पूर्णत: विफल हो रही है।

सरकार द्वारा यदि आईएसपी को पोर्नोग्राफी वेबसाइटों का प्रसारण रोकने का आदेश दिया जाए, तो स्कूल और बसों में जैमर लगाने की जरूरत क्यों पड़ेगी

इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स खरबों का कारोबार कर रहे हैं, जिनसे नियमों का पालन कराने की बजाए सरकार द्वारा ऑनलाइन चाइल्ड एब्यूज के एडवांस सॉफ्टवेयर बनाने का दावा किया जा रहा है। स्कूलों के 100 मीटर के दायरे में तंबाकू, गुटखा और सिगरेट बेचने पर प्रतिबंध है। महाराष्ट्र में स्कूल के कैंटीनों में जंगफूड की बिक्री पर प्रतिबंध है।

दरअसल इन अधकचरे प्रतिबंधों से भ्रष्टाचार, पोर्नोग्राफी का गैरकानूनी कारोबार के साथ चीन में बने सीसीटीवी एवं जैमर आदि का कारोबार बढ़ जाता है। अश्लील वीडियो यदि गैरकानूनी है तो उन्हें सिर्फ बच्चों के ग्रुप में देखने से कैसे रोका जा सकता है। यदि पोर्नोग्राफी इंटरनेट में उपलब्ध है तो बच्चों को घर या अन्य स्थानों में पोर्नोग्राफी देखने से कैसे रोका जा सकेगा? बच्चों को इस खतरे से कैसे बचाया जाए, जबकि बड़े अफसर तथा माननीय भी विधान मण्डल में पोर्नोग्राफी देखते हुए पकड़े गए हैं!

नवीनतम सर्वे के अनुसार मुंबई मेट्रो में फ्री वाईफाई सुविधा का पोर्न देखने के लिए बहुतायत में इस्तेमाल होता है। एक अन्य सर्वे के अनुसार देश के सार्वजनिक स्थानों में उपलब्ध फ्री वाईफाई सुविधा का हर तीन में एक व्यक्ति नग्नता देखने के लिए इस्तेमाल करता है। सरकारी दफ्तरों, स्कूल, कॉलेजों के कंप्यूटरों में पोर्नोग्राफिक वेबसाइट्स को चलाना गैरकानूनी है, जिन्हें ब्लॉक करके देश में बेहतर कार्य संस्कृति की शुरुआत क्यों नहीं की जाती?

टीवी तथा अखबार में आपत्तिजनक सामग्री के प्रसारण के लिए संपादक की जवाबदेही का कानून है। सेंसर बोर्ड के पुराने कानूनों का पालन करके फिल्मों में गालियां रोकने का हास्यास्पद प्रयास हो रहा है। वहीं दूसरी ओर इंटरनेट कंपनियों के नियमन में सरकार पूर्णत: विफल हो रही है।

दरअसल, अश्लील वीडियोज और पोर्नोग्राफी का खरबों डॉलर का विश्व बाजार है, जिसकी खपत के मामले में भारत की पांचवी रैंक है। एक अनुमान के अनुसार भारत में स्मार्ट फोन और मोबाइल से 25 करोड़ लोग एडल्ट कंटेन्ट देखते हैं, जो डिजिटल इंडिया में सबसे तेजी से बढ़ता बाजार है।

इंटरनेट में पोर्नोग्राफी को रोकने से देश की टेलीकॉम कंपनियों द्वारा डेटा बिक्री से आमदनी में 30 से 70 फीसदी तक की कमी हो जाएगी। कानून के अनुसार सरकार द्वारा इन बेवसाइट्स को यदि बंद कर दिया गया तो खरबों डॉलर का गैरकानूनी कारोबार ठप्प हो जाएगा।

ध्यान रहे कि छोटेमोटे सटोरियों के खिलाफ कार्रवाई होती है, पर खरबों डॉलर के पोर्नोग्राफी व्यापार को रोकने में रिजर्व बैंक, वित्त मंत्रालय समेत सभी सुरक्षा एजेंसियां विफल हो रही हैं। भारत में छोटेबड़े सभी व्यापारी जीएसटी के दायरे में रजिस्ट्रेशन कराने के लिए विवश हैं। भारत में व्यापार कर रही इंटरनेट कंपनियों और वेबसाइट्स का जीएसटी के तहत रजिस्ट्रेशन की अनिवार्यता का नियम यदि बन जाए, तो पोर्नोग्राफी के गैरकानूनी तन्त्र की कमर ही टूट जाएगी।

सेंसर बोर्ड के कट पर हल्ला बोलने वाले देश में इंटरनेट के पोर्नोग्राफिक संसार पर बवाल क्यों नहीं होता? भारत में इंटरनेट के विस्तार के साथ सरकार अपनी जवाबदेही निभाने में विफल रही है, पर बच्चों के चरित्र का कानून से ही नियमन भी तो संभव नहीं है। इस बारे में अध्यापकों और अभिभावकों को भी अपनी जवाबदेही निभाने के साथ सामाजिक जागरुकता बढ़ानी होगी।

इंटरनेट सूचना ज्ञान का महासागर है, जिसमें नग्नता की गन्दगी के अनेक द्वीपों में समाज रम रहा है। कंपनियों के बड़े मुनाफे की वजह से इस नग्नता और उसके दुष्प्रभावों से सरकार आंख मूंद रही है। फिर सुप्रीम कोर्ट के अजब गजब आदेश बच्चों को पोर्नोग्राफी की रंगीन दुनिया में जाने से कैसे रोक सकेंगे?

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