पार्टी फंड के लिए लूट

नलोकपाल के लिए छिड़े अन्ना आंदोलन के एक सिपाही अरविंद केजरीवाल उसी रास्ते पर चल पड़े हैं, जिस पर कभी लालू प्रसाद चले। चारा घोटाले में फंसे और अब लालू प्रसाद एक के बाद दूसरे मामले में सजा के बतौर जेल में हैं।

इस तुलना से चौंकिए मत। अरविंद केजरीवाल और गोपाल राय वही कर रहे हैं, जो चारा घोटाले में हुआ। दिल्ली में भवन निर्माण श्रमिकों के कल्याण के लिए बने कोष में 2300 करोड़ रुपए हैं।

ईमानदार होने का दावा करने वाले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ऐसा जुगाड़ बिठाया है, जिससे मजदूरों के कल्याण का पैसा, उनकी पार्टी के फंड में पहुंच रहा है।

यह पैसा उन गरीब मजदूरों का है जो दो वक्त की रोटी के लिए दर-दर की ठोकरे खाते हैं। उनके लिए ही 2002 में एक बोर्ड बना था। उसका नाम दिल्ली भवन और अन्य निर्माण कामगार कल्याण बोर्डहै। उसके कोष में 2300 करोड़ रुपए हैं। उसे ही हजम करने की फिराक में केजरीवाल सरकार है।

जो दस्तावेज मौजूद हैं उनसे यही जाहिर होता है। दस्तावेज बोलते हैं कि बोर्ड से अभी तक लगभग 150  करोड़ रुपए निकाले जा चुके हैं। पर विडंबना यह है कि उसमें से अधिकांश रकम असली हकदार तक नहीं पहुंचा है।

चौंकाने वाली बात यह है कि इसकी सूचना मुख्यमंत्री केजरीवाल और उनके सिपहसालार गोपाल राय को भी है। गोपाल राय ही श्रम मंत्री हैं।

उनके पास पिछले डेढ़ साल से इस तरह की शिकायतें श्रम अधिकारी भेज रहे हैं। बावजूद इसके ईमानदारपार्टी के ईमानदारमुखिया चुप हैं। कोई भी यह जानने की कोशिश नहीं कर रहा है कि तकरीबन 150 करोड़ रुपए कहां गए?

दस्तावेजों की माने तो केजरीवाल सरकार ने मजदूरों के हक पर लूट मचा रखी है। उसमें श्रम मंत्री गोपाल राय, विभाग के कई अधिकारी और कुछ चुनिंदा भवन निर्माण यूनियन शामिल हैं।

“मुनीश कुमार गौड वह शख्स हैं जिन्होंने श्रम बोर्ड में चल रहे यूनियन के फर्जीवाड़े का पदार्फाश किया। वे दिल्ली सरकार में संयुक्त श्रम आयुक्त हैं। उन्होंने जान की परवाह किए बिना,
घोटाला करने वालों के खिलाफ मोर्चा खोला।”

अब तक जो लगभग 150  करोड़ रुपए का गबन हुआ है, वह इसी सांठगांठ की देन है। जांच पड़ताल इस गठजोड़ का पर्दाफाश कर देती। इसलिए उसे होने नहीं दिया गया क्योंकि वह रकम तो पूरे घोटाले का एक हिस्सा भर है।

असली खेल तो 2300 करोड़ रुपए को झटकने का है। उसी के लिए पूरा तानाबाना बुना गया। बोर्ड के कानून को कूड़ेदान में फेंक दिया गया और मनमाने तरीके से उसका गठन किया।

कानून के मुताबिक बोर्ड का अध्यक्ष केन्द्र सरकार नियुक्त करती है। लेकिन केजरीवाल सरकार ने इसका ख्याल नहीं रखा। उनसे इसकी आशा भी नहीं की जा सकती थी। वजह साफ है।

उनका इरादा ही कायदे कानून को ताख पर रखकर मनमानी करने का है। उन्होंने वही किया। कानून के खिलाफ जाकर श्रम मंत्री को बोर्ड का अध्यक्ष बना दिया।

उसके बाद मन मुताबिक सरकार ने कुछ मैनेजर नियुक्ति किए। इनकी भी नियुक्ति  गैर-कानूनी है। पर इसका ध्यान नहीं रखा गया। रखते भी कैसे! योजना तो फंड के दुरुपयोग में आने वाली अड़चन को दूर करने की थी।

उसमें वे सफल रहे। इस तरह पहली बाधा दूर हो गई। अब दूसरा काम भवन निर्माण यूनियन खड़ा करना था। ऐसा नहीं है कि दिल्ली में भवन निर्माण यूनियनें नहीं हैं।

दिल्ली सरकार के दस्तावेजों के मुताबिक शहर में तकरीबन तीन दर्जन से ज्यादा यूनियनें हैं। पर वे केजरीवाल की धुन पर नाचने के लिए राजी नहीं थीं। लिहाजा यूनियन-यूनियन खेलने का एक दौर शुरू हुआ।

इस सरकारी षड़यंत्र को समझने के लिए कुछ बुनियादी बातों को जानना आवश्यक है। दिल्ली भवन और अन्य निर्माण कामगार कल्याण बोर्ड का फंड दो मदों में खर्च होता है। बोर्ड से फंड निकालने के लिए तीसरा रास्ता निकाला गया।

वह है यूनियन को प्रोत्साहन राशि देना। स्वघोषित ईमानदारसरकार ने फंड की हेराफेरी के लिए इन तीनों तरीकों का इस्तेमाल किया। मजदूर यूनियन से जुड़े कई नेताओं ने इस बात की पुष्टि की है।

उन लोगों का कहना है कि इधर कुछ सालों में कई निर्माण यूनियनें बनवाई गई हैं। इन यूनियनों ने फर्जी भवन निर्माण मजदूरों का पंजीकरण किया।

इरादा बस एक था बोर्ड से प्रोत्साहन राशि लेना।  इस राशि को केजरीवाल सरकार ने 30 अक्टूबर 2015 को 50 रुपए से बढ़ाकर 100 रुपए कर दिया था। कानूनन यह निर्णय लेने से पहले उप-राज्यपाल से अनुमति लेनी चाहिए थी।

पर जनलोकपाल और पारदर्शिता की वकालत करने वाले अरविंद केजरीवाल ने सरकार बनते ही गोपनीयता का जामा कब पहन लिया! किसी को खबर ही नहीं होने दी कि वह अचानक भवन निर्माण से जुड़ी  ट्रेड यूनियन पर इतने मेहरबान क्यों हो गए?

उप-राज्यपाल को इसकी जानकारी दो साल बाद हुई, जब इसकी अनुमति के लिए फाइल उनके पास पहुंची। वह तारीख 5 नवंबर 2017 है।  उसके पहले तक केजरीवाल सरकार बिना किसी अधिकार के मजदूरों के धन को लूटाती रही।

ट्रेड यूनियन से जुड़े तमाम नेता नाम न उजागर करने की शर्त पर कहते हैं कि यूनियन की आड़ में आम आदमी पार्टी जो हेराफेरी कर रही है, उससे सभी परिचित हैं।

उन लोगों का दावा है कि श्रमिक विकास संगठन बस एक उदाहरण है। इस तरह की कई यूनियनें आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने खड़ी की है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रदेश सचिव धीरेन्द्र शर्मा कहते है कि यूनियन का पंजीकरण बहुत कठिन काम है।

बिना किसी दबाव या सिफारिश के  जल्दी नहीं होता। उन्होंने संकेत बदले माहौल की तरफ इशारा किया। इस बदलाव की तस्दीक श्रम विभाग के अधिकारियों का पत्र भी करता है। 

27 नवंबर 2017 को श्रम विभाग के अधिकारियों ने श्रम सचिव को एक पत्र लिखा।  वह दरअसल पत्र नहीं, सरकार के खिलाफ खुला विद्रोह था।

उसमें उन लोगों ने यूनियन की अराजकता का ब्यौरा दिया था और सरकार से सहयोग की गुहार लगाई थी। उसमें श्रम विभाग के बाहर मौजूदा माहौल का पूरा ब्यौरा है। पत्र के मुताबिक सुबह से ही कुछ यूनियन के लोग अपनी दुकानखोल लेते हैं।

फिर वहां जो आता है, उसका बतौर निर्माण मजदूर पंजीकरण करने लगते हैं। जब अधिकारी इसका विरोध करते हैं तो गिरोह के लोग डराते धमकाते हैं।

इसकी पुष्टि श्रम विभाग के दफ्तर जाकर की गई। कई दफ्तरों के बाहर फर्जी पंजीकरण करने वालों का गिरोह सक्रिय मिला। बात अशोक विहार स्थिति श्रम विभाग कार्यालय की करते हैं।

वहां से कुछ दूर और डीएवी स्कूल के सामने एक गाड़ी खड़ी थी। उसके आसपास बहुत लोग खड़े थे। पास जाने पर पता चला कि उसमें किसी यूनियन के ठेकेदार बैठे हैं।

वे पैसे लेकर पंजीकरण कर रहे थे। उनके गुर्गे  पंजीकरण कराने वाले लोगों को बता रहे थे  कि वे अपना नाम क्या बताएंगे?  इससे अलग कहानी झिलमिल की नहीं थी।

यहां पर श्रम विभाग का उत्तर-पूर्वी मुख्यालय है। इसका परिसर काफी बड़ा है। यहां मुख्य दरवाजे के दोनों तरह यूनियन के लोग मिले। वे कुर्सी मेज लगाकर बैठे हुए थे।

हाथ में कलम थी और सामने मेज पर एक रजिस्टर व रसीद रखी थी। जो वहां जाता था उससे 100 रुपए लेकर रसीद थमा देते थे। यह सिलसिला चल रहा था तभी अधेड़ उम्र की महिला तकरीबन 60-65 साल के बुजुर्ग के साथ पहुंची।

वह उस बुजुर्ग का पंजीकरण करना चाहती थी। यूनियन ने बिना कोई पूछताछ किए, उसका पंजीकरण कर लिया। इस तरह के पंजीकरण की वैधता की जांच के लिए दफ्तर में बैठे सरकारी कर्मचारी का रवैया ढुलमुल दिखा।

हो भी क्यों न! वे संविदा पर रखे गए हैं। उन्हें तो बस अपने वेतन से मतलब है, बाकी और किसी बात से उनका कोई सरोकार नहीं है। इसलिए इन कर्मचारियों ने 80-90 फीसदी उन लोगों का लेबर कार्ड रेन्यू कर दिया जो निर्माण मजदूर नहीं हैं।

इन लोगों की मनमानी के खिलाफ श्रम विभाग के अधिकारियों ने एक पत्र श्रम सचिव को 17 अगस्त 2017 को लिखा। उसमें सरकार से कहा गया था कि श्रम विभाग में चल रहे फर्जीवाड़े की विजीलेंस जांच कराई जाए।

पर केजरीवाल सरकार ने उसे अनसुना कर दिया।  सूत्रों की मानें तो इसकी बड़ी वजह यूनियन और सरकार के बीच सांठगांठ रही है। बातचीत में कई अधिकारियों ने बताया कि यूनियन के पंजीकरण के लिए शीर्ष नेतृत्व दबाव बनाता है।

उन लोगों ने बताया कि बाकायदे फोन करके आदेश दिया जाता है कि उस यूनियन का काम जल्दी करिए।सूत्रों के मुताबिक यूनियन पंजीकृत होते ही निर्माण मजदूरों का पंजीकरण करने लगती है। जबकि नियमत: वह सक्षम नहीं होती।

बावजूद इसके पंजीकरण जारी है। चौंकाने वाली बात यह है कि कुछ चुनिंदा यूनियनें, मसलन श्रमजीवी निर्माण मजदूर संघ, दिल्ली भवन निर्माण संघ मजदूर यूनियन, दिल्ली भवन कामगार संगठन ने दुकानखोल रखी है।

वे मनमाने पैसे वसूल कर गैर-निर्माण मजदूर का पंजीकरण कर रही है। कई मामलों में तो पंजीकृत मजदूर और उनका पता दोनों फर्जी है। यूनियन नेता नारायण सिंह कहते हैं कि पिछले कुछ सालों से 90 फीसद फर्जी पंजीकरण हो रहे हैं।

दिल्ली भवन और अन्य निर्माण कामगार कल्याण बोर्ड के सदस्य भी मानते हैं कि फर्जी पंजीकरण हुआ है। सूत्रों की मानें तो पिछले साल दिसंबर माह में हुई बोर्ड मीटिंग में इसके सदस्यों ने इस मसले को उठाया था।

पर श्रम मंत्रालय के मिनट्स में इसे शामिल नहीं किया गया। सदस्यों की आवाज को दबा दिया गया। पर इससे सच छुपेगा नहीं।  सवाल यह है कि जिस फर्जीवाड़े से सरकार और बोर्ड दोनों परिचित हैं, उस पर कार्रवाई करने से ईमानदारमुख्यमंत्री क्यों परहेज कर रहे हैं?

इसकी वजह श्रमिक विकास संगठन है। यह संगठन आम आदमी पार्टी की ट्रेड यूनियन है। इसके गठन में भी गड़बड़ी हुई है। पर इसकी परवाह केजरीवाल सरकार को नहीं है।

“ट्रेड यूनियन से जुड़े तमाम नेता नाम न उजागर करने की शर्त पर कहते हैं कि यूनियन की आड़ में आम आदमी पार्टी जो हेराफेरी कर रही है, उससे सभी परिचित हैं।”

उन्हें तो बस यूनियन बनानी थी। इसलिए किसी नियम कानून की परवाह नहीं की। इसकी बागडोर श्रम मंत्री के विश्वासपात्र  कहे जाने वाले सतीश पांडे और कृष्ण कुमार यादव के पास है।

इसे राजनीतिक हित साधने के लिए पार्टी ने बनाया। यह बात सभी जानते हैं कि पार्टी बनाने के बाद केजरीवाल यूनियन बनाने की फिराक में थे।

कारण, वे अपना राजनीतिक दायरा बढ़ाना चाहते थे जो यूनियन के बिना संभव नहीं था। उसके लिए सत्ता और पैसा दोनों चाहिए था। वह चाहत 2015 में पूरी हो गई।  

ईमानदारकेजरीवाल मुख्यमंत्री बन गए। इसके बाद ट्रेड यूनियन बनाने में जुट गए। उसे खड़ा करने के लिए पैसे का जुगाड़ होने लगा। उन्हें दिल्ली भवन और अन्य निर्माण मजदूर कल्याण बोर्ड सबसे बेहतर विकल्प दिखा।

कारण यह था कि इसके कोष में 2300 करोड़ रुपए हैं। इसे निकालना बहुत सहज है। बस जरूरत इतनी ही होती है कि यूनियन में भवन निर्माण मजदूर पंजीकृत हों।

यह आम आदमी पार्टी के लिए बहुत बड़ी बात नहीं थी, क्योंकि 70 में से 67 विधायक उसके थे। अगर हर विधायक अपने क्षेत्र में कम से कम मजदूरों का पंजीकरण कराता तो भी श्रमिक विकास संगठन में मजदूरों की संख्या पर्याप्त हो जाती।

पंजीकरण के एवज में यूनियन को प्रोत्साहन राशि भी मिलती। इससे संगठन को खड़ा करने के लिए जरूरी धन भी मिल जाता। लिहाजा श्रमिक विकास संगठन को खड़ा किया गया।

इसमें अधिक से अधिक निर्माण मजदूर पंजीकृत हों और ज्यादा से ज्यादा प्रोत्साहन राशि मिले, दोनों का ख्याल रखा गया। पंजीकरण के लिए सभी विधायकों ने अपने-अपने क्षेत्र में श्रमिक विकास संगठन का कैम्प लगवाया।

दिल्ली असंगठित निर्माण मजदूर यूनियन के महासचिव अमजद हसन कहते हैं उन कैम्पों में बिना जांच पड़ताल किए, पंजीकरण हुआ। वे यह भी कहते हैं कि गांव के गांव को संगठन ने बतौर भवन निर्माण मजदूर पंजीकृत कर दिया।

उनका दावा है कि  यह सब महज फंड के लिए हुआ। वे बताते हैं कि एक तो फंड का इंतजाम मजदूरों के पंजीकरण से हुआ और दूसरा बोर्ड से प्रोत्साहन राशि के रूप में मिला।

इससे श्रमिक विकास संगठन को मजबूत करने में आम आदमी पार्टी को सहूलियत हुई। इसी वजह से ईमानदारसरकार तमाम शिकायतों के बाद भी खामोश है।

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पिछले चार सालों में जितेन्द्र ने जो रिपोर्ट लिखी है, उससे इनकी पहचान एक खोजी पत्रकार की बनी है। देश-दुनिया की आर्थिक गतिविधियों के साथ-साथ भारत के अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर भी वे मौलिक दृष्टि रखते हैं। सरकारी नीतियों के क्रियान्वयन का विषय चतुर्वेदी के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

1 टिप्पणी

  1. I know Chaturvedi for the last more than 4 years, I pray for his success and prosperity due to his dedication and laborious working in the field of media. What he writes carries lot of weight and truth, which he digs deep before writing and then sending it for publication. No external pressures has detered his faith in TRUTH, TRANSPARENCY and BOLDNESS.I once again wish him all success in days top come.

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