पाकिस्तानी पैसे की गिलानी राजनीति

गिलानी को गिरफ्तार करना कश्मीर की शांति के लिए जरूरी है।एनआईए ने अपने डोजियर में यही बात कही थी, लेकिन इस बात को नजरअंदाज कर दिया गया।

झुकने वाला गिलानी, बिकने वाला गिलानीकश्मीर में अलगाववादी नेता और हुर्रियत के मुखिया सैयद अली शाह गिलानी की यही छवि है। खुफिया एजेंसी की माने तो उन्होंने घाटी में कश्मीरियत को खत्म कर यह रुतबा बड़ी चतुराई से हासिल किया है। गिलानी के खिलाफ 1986-2015 के दरमियान 56 मामले दर्ज हुए, जिनमें 49 एफआईआर पर अभी तक जांच ही चल रही है।

सुरक्षा एजेंसियों की माने तो गिलानी ने लोगों में भारत के खिलाफ उन्माद भरा। इसके लिए पाकिस्तान से सौदा किया। फिर घाटी में आतंक की नर्सरी लगाई। हिज्बुल मुजाहिद्दीन जैसे संगठन को खड़ा किया। उनके फलनेफूलने के लिए धन की व्यवस्था की, जो हवाला के जरिए वादी में आता है। इस हवाला कारोबार के कर्ताधर्ता गिलानी स्वयं हैं। 

छानबीन में सुरक्षा एजेंसी को सनसनीखेज सुराग हाथ लगे। उनकी मानें तो गिलानी
और मीरवाइज उमर फारूक के संबंध आईएसआई से हैं। पाकिस्तान की इस खुफिया एजेंसी के
वरिष्ठ अधिकारी तनवीर अहमद से इन दोनों का सीधा संपर्क है।

बावजूद इसके घाटी में उनकी साख बनी हुई है। उनको मानने और सुनने वालों की बड़ी फौज वहां मौजूद है। आलम यह है कि उनकी एक आवाज पर पूरा कश्मीर खड़ा हो जाता है। इसकी बड़ी वजह गिलानी का धार्मिक चोला है। उसी की आड़ में वे आवाम को बरगला रहे हैं। खुफिया ब्यूरो और एनआईए (राष्ट्रीय जांच एजेंसी) बहुत समय से गिलानी के उसी चोलों को उतारने में जुटी है।

गिलानी के कारनामों की लंबी रिपोर्ट जांच एजेंसी के पास है। उसमें पूरी कहानी दर्ज है। पर राजनीतिक स्वार्थ में जकड़े कुछ दलों ने उसका कभी संज्ञान नहीं लिया। पर अब हालात बदल गए हैं। 2016 में हुई हिंसा के बाद से जांच एजेंसियां सक्रिय हो गई हैं।

पिछले कुछ दिनों से एजेंसी कश्मीर से लेकर दिल्ली तक छापेमारी कर रही है। मकसद बस एक है। आतंकी फंडिंग के उस रहस्य को उजागर करना है, जिनके तार गिलानी से जुड़े हैं। छानबीन में एजेंसी को सनसनीखेज सुराग हाथ लगे। उनकी मानें तो गिलानी और मीरवाइज उमर फारूक के संबंध आईएसआई से हैं।

पाकिस्तान की इस खुफिया एजेंसी के वरिष्ठ अधिकारी तनवीर अहमद से इनका सीधा संपर्क है। तनवीर दोनों से बराबर बात करते हैं। फिर भी घाटी में इनको माना जाता है। कहा तो यह भी जाता है कि कश्मीर की राजनीति में गिलानी का सिक्का चलता है। वजह वह सरकार के हाथों बिके नहीं। तनकर खड़े रहे।

जांच पड़ताल में जो सामने आया है, वह गिलानी की छवि से इत्तेफाक नहीं रखता। वे झुके भी हैं और बिके भी हैं। बस अंतर इतना है कि वह मुल्क भारत नहीं पाकिस्तान है। उसके सामने चंद रुपए के लिए वे झुक गए। कश्मीरियत को पाकिस्तान के हाथों बेच दिया। उन्हीं पैसों से अपना महल खड़ा किया। एनआईए के मुताबिक गिलानी के पास करोड़ों की संपत्ति है।

घाटी से लेकर दिल्ली तक उनके कई मकान हैं। कश्मीर में उनका स्कूल है। यह संपत्ति उन्होंने तब खड़ी की है, जबकि वे दशकों तक सरकार की हिरासत में रहे। उनका आनाजाना भी बहुत सीमित रहा। वे ज्यादातर  कश्मीर में रहे हैं। अगर उससे बाहर की बात करें तो उनका अगला पड़ाव दिल्ली हुआ करता है। दिल्ली इलाज के लिए आते हैं। वरना घाटी में ही रहते हैं। इसके बाद भी इतनी संपत्ति है।

एजेंसी इसकी एक बड़ी वजह हवाला कारोबार को मानती है, जिससे गिलानी का गहरा संबंध है। उनके पास पैसा पाकिस्तान, दुबई से होता हुआ दिल्ली आता है। फिर वहां से कश्मीर भेजा जाता है। इसमें बड़ी भूमिका दिल्ली और कश्मीर में बैठे व्यापारियों की होती है। यह बात अब खुलकर समाने गई है।

 

आज भी घाटी में गिलानी का मान बना हुआ है। कहा तो यह भी जाता है कि कश्मीर
की राजनीति में गिलानी का सिक्का चलता है। वजह एक ही है कि वे भारत
सरकार के हाथों बिके नहीं। तनकर खड़े रहे। उनकी कार्यशैली
भारत सरकार के लिए चुनौती है।

एजेंसी ने दिल्ली और कश्मीर के कई व्यापारियों के यहां छापा मारा है। उनमें से एकजाहोर वाटलीहै। वह श्रीनगर का बड़ा व्यापारी है। उसके घर से जो दस्तावेज बरामद हुए हैं, उससे पता चलता है कि वाटली अलगाववादियों को धन मुहैया कराता है। वह धन हवाला के जरिए, वाटली के पास पहुंचता है। इसे वे लोग भेजते है जो यह चाहते हैं कि कश्मीर सुलगता रहे। चूंकि घाटी को जलाने का ठेका गिलानी के पास है, इसलिए मेहनताना उन्हें भी मिलता है। एजेंसी ने जो छानबीन की है उससे यही बात निकलकर आती है।

इसका घाटी में क्या प्रभाव पड़ा है? उसे जानने की कोशिश की गई। क्योंकि मसला सैयद अली शाह गिलानी से जुड़ा है और उनका कद वहां के राजनीतिक और सामाजिक जीवन में बहुत ऊंचा है। इसलिए कौतूहल भी बहुत था। लिहाजा घाटी के कई लोगों से बात हुई। उनमें ज्यादातर लोगों का मत था कि एजेंसी की कार्रवाई से गिलानी पर दबाव तो बढ़ा है। लेकिन वे डर गए हैं, यह कहना गलत होगा।

कुछ लोगों का यह भी कहना है कि एजेंसी की छापेमारी के बाद लगा था कि घाटी में विरोध का स्वर तेज होगा। लोग गिलानी के पक्ष में सड़कों पर उतरेंगे और पूरे कश्मीर में फिर आंदोलन होगा। वे लोग कहते हैं कि ऐसा नहीं हुआ। उनकी माने तो यह बहुत बड़ी घटना है। घाटी के उन लोगों ने जिस तरह से आंदोलन होने पर आश्चर्य जाहिर किया, उससे साफ था कि गिलानी को लेकर घाटी में मत बदल रहा है। यह बदलाव पहले भी हो सकता था। पर कश्मीर की आग में राजनीतिक रोटी सेकने के लिए पूर्ववर्ती सरकार ने कुछ नहीं किया।

तत्कालीन कांग्रेस सरकार को 1992 से ही सैयद अली शाह गिलानी के बारे में पता था। खुफिया ब्यूरो के पास गिलानी के खिलाफ पुख्ता सबूत थे। उनके हवाला कारोबार और आईएसआई से उनके संबंध की पूरी खबर थी। इससे नेतृत्व अवगत भी था। सीबीआई (केंद्रीय जांच एजेंसी) ने गिलानी के खिलाफ बकायदा एफआईआर (फस्ट इन्फार्मेशन रिपोर्ट) दर्ज की थी। उसमें उन पर कश्मीर में आतंकवाद फैलाने का आरोप था।

लेकिन सीबीआई ने इस मामले को आगे नहीं बढ़ाया। वह भी तब जबकि कांग्रेसी सरकार को पता था कि हिज्बुल मुजाहिद्दीन से उनके तार जुड़े हुए हैं। वह उन्हें धन भी मुहैया करता है। फिर भी वह चुप रही। उस दौरान जो खबर हुई, उसकी माने तो कांग्रेस नहीं चाहती थी कि गिलानी पर कोई कार्रवाई हो। इसकी वजह राजनीतिक थी।

कांग्रेस कश्मीर की राजनीति में दखल बढ़ाने के लिए हुर्रियत के कुछ बड़े नेताओं के साथ गठजोड़ करना चाहती थी। इसी बात को पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल ने आगे बढ़ाया था। उन्होंने श्रीनगर में बतौर प्रधानमंत्री कहा था कि कुछ लोग नहीं चाहते कि उनके पुराने मित्र के खिलाफ हवाला रैकेट के मामले में कोई कार्रवाई की जाए। उसी दौरान जम्मू और कश्मीर मामलों के विशेष सचिव वीएस. माथुर ने गृह मंत्रालय की बैठक के दौरान कहा था कि अगर गिलानी और अन्य अलगाववादी नेताओं पर कार्रवाई नहीं की जाती है तो सरकार की साख पर धब्बा लग जाएगा।

एनआईए ने अपने डोजियर में कहा था ‘गिलानी को गिरफ्तार करना कश्मीर की शांति के लिए जरूरी है’। पर तत्कालीन कांग्रेस सरकार उन्हें गिफ्तार करने की बजाए संवाद
स्थापित करने में जुटी थी। गिलानी के खिलाफ 1986-2015 के दरमियान 56 मामले दर्ज
हुए हैं, जिनमें 49 एफआईआर पर अभी तक जांच ही चल रही है।

पर उसकी चिंता किसे थी। राजनीति हावी थी। गिलानी पर संगीन आरोप होने के बाद भी सीबीआई ने हाथियार डाल दिए थे। उन पर सीधा आरोप था कि उन्होंने कई फर्जी खाते खुलवाए हैं। उन खातों में हवाला के जरिए पैसे आते हैं। उनका हिज्बुल मुजाहिद्दीन से संबंध है।

खुफिया ब्यूरो का यहां तक दावा है कि इस संगठन के सर्वोच्च नेता गिलानी ही हैं। यह आतंकी संगठन जमातइस्लामी से जुड़ा है। जमातइस्लामी कश्मीर का राजनीतिक संगठन है। एक जमाने में सैयद अली शाह गिलानी इस पार्टी से जुड़े थे। इसी के टिकट पर वे तीन बार विधान सभा गए। इसका गठन 1941 में अबुल अला मउदोदी ने किया था।

यह कट्टरपंथी संगठन है जो इस्लाम की ही हुकूमत चाहता था। इससे गिलानी 1954 में जुड़े। वे संगठन की इस्लामिक विचारधारा से बहुत प्रभावित हुए। उनका पंथनिरपेक्षता से मोह भंग हो गया। उन्होंने इसकी कट्टरपंथी इस्लामिक धारा को आगे बढ़ाने का निश्चय किया। तब घाटी में सूफी इस्लाम का दौर था। उसमें इस्लामिक कट्टरपंथी के लिए कोई जगह नहीं थी। लेकिन यह दौर बहुत लंबे समय तक नहीं चला। गिलानी ने संगठन के साथ मिलकर स्कूलों का ऐसा जाल खड़ा किया, जो कट्टरपंथ की शिक्षा देने लगा। इससे घाटी में नई जमात खड़ी हुई।

1980 का दशक आतेआते घाटी की पूरी पीढ़ी ही बदल गई। कश्मीरियत के पैरोकार हाशिए पर चले गए। जेहाद के उन्मादी सिर उठाने लगे। उन्हें पालने पोसने और जेहाद को आगे बढ़ाने का जिम्मा गिलानी ने उठाया। बैलेट की बजाए बुलेट के पैरोकार बन गए। हिज्बुल मुजाहिद्दीन बनाया। पाकिस्तान से संपर्क साधा ताकि भारत सरकार से आजादी का जो सपना गिलानी ने देखा है, उसे पूरा किया जा सके। उसी लिहाज से आतंकियों के शिक्षणप्रशिक्षण की व्यूह रचना की गई। उसे चलाने के लिए पाकिस्तान और सउदी अरब से धन का प्रबंध किया गया।

घाटी के वैसे नेता जो उनके रवैए से असहमत थे, उनकी हत्या कर दी गई। ऐसे आरोप भी गिलानी पर लगे। मसलन अब्दुल गली लोन। उनके साहबजादे सज्जाद गनी लोन हमेशा यह आरोप गिलानी पर लगाते हैं। इन सबके बारे में पूरी जानकारी कांग्रेस सरकार और उसके समर्थन से बनी तमाम सरकारों को थी। मगर कांग्रेस के कश्मीरी नेतृत्व के दबाव की वजह से तमाम एजेंसियां खामोश थी।

90 के दशक से कांग्रेस ने गिलानी को बचाने का जो सिलसिला शुरू किया था, उस पर वह 2014 तक कायम रही। इस दौरान कश्मीर कई बार सुलगा। 2008 और 2010 तो सबको याद  होगा। इन सालों में घाटी आज की तरह धधकी थी। उस दरमियान एनआईए ने कुछ लोगों को पकड़ा था। उनके तार कश्मीर की आतंकी फंडिग से जुड़े थे। चौंकाने वाली बात यह है कि उसमें सैयद अली शाह गिलानी का भी नाम है।

एनआईए की उस चार्जशीट के मुताबिक 2007 से जनवरी 2011 तक करोड़ों रुपए कश्मीर भेजे गए। वह पैसा पाकिस्तान ने भेजा था जो हिज्बुल मुजाहिद्दीन और अलगाववादी नेताओं तक पहुंचाना था। मकसद बस एक था। घाटी में आतंकी घटनाओं को अंजाम देना। यही वह दौर था जब कश्मीर में पत्थरबाजी की घटना जोरों पर थी। इससे और हवा देने के लिए पाकिस्तान से धन भेजा जा रहा था जो दिल्ली के जरिए कश्मीर पहुंच रहा था। इसके लिए पूरी योजना बनी थी। हिज्बुल का एक आतंकवादी दिल्ली आया जो लश्करतैयबा से भी जुड़ा था।

कांग्रेस कश्मीर की राजनीति में दखल बढ़ाने के लिए हुर्रियत के कुछ बड़े नेताओं के साथ गठजोड़ करना चाहती थी। इसी बात को पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल ने आगे बढ़ाया था।
उन्होंने श्रीनगर में बतौर प्रधानमंत्री कहा था कि कुछ लोग नहीं चाहते कि उनके
पुराने मित्र के खिलाफ हवाला रैकेट के मामले में कोई कार्रवाई की जाए।

उसने यहां पर राजकुमार नाम के आदमी को चुना। वह बहुत गरीब था। पहले उसकी छोटेमोटे कामों में आर्थिक मदद करने लगा। जब उस आतंकी ने उसका विश्वास जीत लिया तो उसके घर में हवाला का पैसा रखा जाने लगा। राजकुमार को इस बात की खबर नहीं थी कि वह किन लोगों के चंगुल में फंस गया है।

उसे पता भी कैसे चलता? आतंकी मोहम्मद सिद्दीकी गनाई तो उससे छद्म नाम से मिला था। उसने अन्य आतंकी साथियों की पहचान भी उससे छुपाई थी। इससे बड़ी बात यह थी कि वह राजकुमार की आर्थिक मदद करता था। इसलिए राजकुमार आंतकियों पर आंख बंद करके भरोसा करता था। उनमें सैयद अली शाह गिलानी के कानूनी सलाहकार गुलाम मोहम्मद भट्ट का भी है। इन लोगों ने योजना के मुताबिक करोड़ों रूपया दिल्ली लाए। उसे राजकुमार इक्कठ्ठा करता था। फिर वह धन हवाला के जरिए श्रीनगर भेजा जाता था।

उस पैसे का एक हिस्सा गिलानी के पास भेजा जाता था। उसे खुद गुलाम मोहम्मद भट्ट का परिवार गिलानी तक पहुंचाता था। वह धन जिस लिफाफे में था, उस पर हिज्बुल मुजाहिद्दीन का लोगो लगा था। एनआईए के मुताबिक मकबोत पंडित ही वह आतंकी था जो पाकिस्तान से पैसा लेकर भारत आया था। वह हिज्बुल और लश्कर का गुर्गा है और गुलाम मोहम्मद भट्ट का समधी है। इन लोगों ने मिलकर 2008 और 2010 में कश्मीर को जलाने की साजिश रची।
एनआईए ने अपने डोजियर में कहा थागिलानी को गिरफ्तार करना कश्मीर की शांति के लिए जरूरी है पर तत्कालीन कांग्रेस सरकार उन्हें गिफ्तार करने की बजाए संवाद स्थापित करने में जुटी थी। यह कवायद तब हो रही थी, जब एजेंसियां कश्मीर में अशांति के लिए गिलानी को जिम्मेदार मान रही थी। उन पर 1986-2015 के दरमियान 56 मामले दर्ज हुए है। सभी आतंकी फंडिंग और देशद्रोह की धारा के तहत हुए है। पर राजनीति का यह आलम है कि उनमें से 49 एफआईआर पर अभी तक जांच ही चल रही है।

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पिछले चार सालों में जितेन्द्र ने जो रिपोर्ट लिखी है, उससे इनकी पहचान एक खोजी पत्रकार की बनी है। देश-दुनिया की आर्थिक गतिविधियों के साथ-साथ भारत के अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर भी वे मौलिक दृष्टि रखते हैं। सरकारी नीतियों के क्रियान्वयन का विषय चतुर्वेदी के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

69 टिप्पणी

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