पाइका विद्रोह के दो सौ साल

जादी के आंदोलन की एक लंबी शृंखला है। 1757 के प्लासी युद्ध और 1947 के बीच देश में अनगिनत संघर्ष हुए। ओडिशा का पाइका विद्रोह उन्हीं में से एक है जो दो सौ साल बाद इतिहास के पन्नों से निकलकर चर्चा के केंद्र में है।  

केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने जब पाइका विद्रोह की 200वीं वर्षगांठ मनाने का निर्णय किया तो अकादमिक जगत में हलचल मच गई। उन लोगों की चिंता तब और बढ़ गई जब भुवनेश्वर में मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने इसे पाठ्यक्रम में शामिल करने की घोषणा की।  

केरल के कुछ इतिहासकारों ने केन्द्र सरकार के फैसले पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि इस विद्रोह से पहले भी दक्षिणी राज्य में विदेशी ताकतों के खिलाफ अनेक विद्रोह हो चुके हैं लेकिन उन्हें कभी उचित सम्मान नहीं मिला।  

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पाइका विद्रोह से जुड़े 16 परिवारों के सदस्यों को सम्मानित करते हुए विद्रोह में हिस्सा लेने वाले आदिवासियों की वीरता की सराहना की। प्रधानमंत्री ने कहा,”आजादी के आंदोलन की एक लंबी शृंखला रही है और उन सभी सामयिक घटनाओं का स्मरण करने और उससे युवा पीढ़ी को अवगत कराए जाने की आवश्यकता है।”  

देश को परतंत्रता की बेड़ी से मुक्त कराने के लिए अनगिनत संघर्ष हुए और हजारों लोगों ने बलिदान दिया। तब जाकर 1947 में देश आजाद हुआ। 23 जून 1757 को प्लासी के युद्ध में बंगाल के नवाब की हार के बाद भारतीय उप महाद्वीप में एक नई राजनीतिक शक्ति का उदय हुआ।

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी अब भारत में व्यापार के साथ ही राजनीतिक दखलंदाजी भी करने लगी। प्लासी के युद्ध से ही भारत की दासता की कहानी शुरू होती है।1757 से 1947 के बीच ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ अनगिनत संघर्ष हुए।  

कुछ संघर्षों को इतिहास में सम्मानजनक स्थान मिला तो कुछ आज भी गुमनाम हैं। 1817 में हुए ओडिशा का पाइका विद्रोह कुछ ऐसा ही है। 1857 का स्वाधीनता संग्राम जिसे सामान्य तौर पर भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम माना जाता है। उससे भी पहले ओडिशा में हुए पाइका विद्रोह(1817) ने पूर्वी भारत में कुछ समय के लिये ब्रिटिश राज की जड़े हिला दी थी।  

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने पाइका विद्रोह के 200 वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में कहा, ”औपनिवेशिक आकाओं द्वारा लिखित इतिहास को लोक और प्रेरक इतिहासकारों की तुलना में अधिक विश्वसनीय समझा जाता है और शिक्षाविदों को स्वदेशी स्रोतों पर ध्यान देने की जरूरत है।  

ओडिशा में वर्ष 1817 में आम लोगों ने ब्रिटिश शासन के उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाई थी।” प्रणब मुखर्जी ने कहा, ”हम अपने इतिहास को याद नहीं करते हैं। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि हम राष्ट्रीय और क्षेत्रीय घटनाओं के बारे में औपनिवेशिक इतिहासकारों की विवेचना को ध्यान से पढ़ते हैं और अपने लोक इतिहासकारों को पूरी तरह नजरंदाज कर देते हैं। शिक्षाविदों को स्वदेशी स्रोतों पर भी विश्वास करना चाहिए।”  

मूल रूप से पाइका ओडिशा के उन गजपति शासकों के किसानों का असंगठित सैन्य दल था जो युद्ध के समय राजा को सैन्य सेवाएं मुहैया कराते थे और शांतिकाल में खेती करते थे। इन लोगों ने 1817 में बक्शी जगबंधु बिद्याधर के नेतृत्व में ब्रिटिश राज के विरुद्ध बगावत का झण्डा उठा लिया।

खुर्दा के शासक परंपरागत रूप से जगन्नाथ मंदिर के संरक्षक थे और धरती पर उनके प्रतिनिधि के तौर पर शासन करते थे। वे ओडिशा के लोगों की राजनीतिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता का प्रतीक मानते थे।  

ब्रिटिश राज ने ओडिशा के उत्तर में स्थित बंगाल प्रांत और दक्षिण में स्थित मद्रास प्रांत पर अधिकार करने के बाद 1803 में ओडिशा को भी अपने अधिकार में कर लिया था। उस समय ओडिशा के गजपति राजा मुकुंददेव द्वितीय अवयस्क थे और उनके संरक्षक जय राजगुरु द्वारा किये गये शुरुआती प्रतिरोध का क्रूरता पूर्वक दमन किया गया। जयगुरु के शरीर के जिंदा रहते हुये ही टुकड़े कर दिये गये।  

कुछ वर्षों के बाद गजपति राजाओं के असंगठित सैन्य दल के वंशानुगत मुखिया बक्शी जगबंधु के नेतृत्व में पाइका विद्रोहियों ने आदिवासियों और समाज के अन्य वर्गों का सहयोग लेकर बगावत कर दी।  

यह विद्रोह बहुत ही तेजी से दूसरे भागों में फैल गया। हालांकि ब्रिटिश राज के विरुद्ध विद्रोह में पाइका लोगों ने अहम भूमिका निभायी थी लेकिन किसी भी मायने में यह विद्रोह एक वर्ग विशेष के लोगों के छोटे समूह का विद्रोह भर नहीं था।

घुमसुर जो कि वर्तमान में गंजम और कंधमाल जिले का हिस्सा हैवहां के आदिवासियों और अन्य वर्गों ने इस विद्रोह में सक्रिय भूमिका निभायी।

वास्तव में पाइका विद्रोह के विस्तार का सही अवसर तब आया जब घुमसुर के 400 आदिवासियों ने ब्रिटिश राज के खिलाफ बगावत करते हुये खुर्दा में प्रवेश किया।  

खुर्दाजहां से अंग्रेज भाग गये थेवहां से कूच करते हुये पाइका विद्रोहियों ने ब्रिटिश राज के प्रतीकों पर हमला करते हुये पुलिस थानोंप्रशासकीय कार्यालयों एवं राजकोष में आग लगा दी। पाइका विद्रोहियों को कनिकाकुजंगनयागढ़ और घुमसुर के राजाओंजमींदारों और आम किसानों का समर्थन प्राप्त था।  

यह विद्रोह बहुत तेजी से प्रांत के अन्य इलाकों जैसे पुर्लपीपली और कटक में फैल गया। विद्रोह से पहले तो अंग्रेज चकित रह गये। उन्हें अपना आधिपत्य बनाये रखने के लिए विद्रोहियों के कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा।  

बाद में हुई कई लड़ाइयों में विद्रोहियों को विजय मिली लेकिन तीन महीनों के अंदर ही अंग्रेज अंततउन्हें पराजित करने में सफल रहे।  

इसके बाद दमन का व्यापक दौर चला जिसमें कइयों को जेल में डाला गया और कइयों को अपनी जान गंवानी पड़ी। बहुत बड़ी संख्या में लोगों को अत्याचारों का सामना करना पड़ा।  

कई विद्रोहियों ने 1819 तक गुरिल्ला युद्ध लड़ा लेकिन अंत में उन्हें पकड़ कर मार दिया गया। बक्शी जगबंधु को अंतत: 1825 में गिरफ्तार कर लिया गया और कैद में रहते हुये ही 1829 में उनकी मृत्यु हो गयी। पाइका विद्रोह से भले ही देश अनजान है लेकिन ओडिशा में उसे बहुत उच्च दर्जा प्राप्त है।  

हम अपने इतिहास को याद नहीं करते हैं। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि हम राष्ट्रीय और क्षेत्रीय घटनाओं के बारे में औपनिवेशिक इतिहासकारों की विवेचना को ध्यान से पढ़ते हैं और अपने लोक इतिहासकारों को पूरी तरह नजरअंदाज कर देते हैं।  

पाइका विद्रोह के नेतृत्वकर्ता जगबंधु बिद्याधर महापात्र भ्रमरबर राय थे। उन्हें ‘बक्शी जगबंधु‘ और ‘पाइक बक्शी‘ के नाम से भी जाना जाता है। वह खुर्दा के महाराजा के वंशानुगत सेनापति (बक्शीथे। 

पाइका विद्रोह1817 ओडिशा में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के विरुद्ध एक सशस्त्र विद्रोह था। पाइका लोगों ने भगवान जगन्नाथ को उडि़या एकता का प्रतीक मानकर बक्शी जगबंधु  के नेतृत्व में यह विद्रोह किया था। 

शीघ्र ही यह आन्दोलन राज्य के दूसरे क्षेत्रों में फैल गया किन्तु अंग्रेजों ने निर्दयतापूर्वक इस आन्दोलन को दबा दिया। बहुत से वीरों को पकड़ कर दूसरे द्वीपों पर भेज कर कारावास का दण्ड दे दिया गया। 

बहुत दिनों तक वन में छिपकर बक्शी जगबंधु ने संघर्ष किया किन्तु बाद में आत्मसमर्पण कर दिया। कुछ इतिसकार इसे ‘भारत का प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम‘ की संज्ञा देते हैं। 

केरल के कुछ इतिहासकारों ने ओडिशा के 1817 पाइका विद्रोह पर केन्द्र सरकार के फैसले पर प्रश्न उठाया है। उनका कहना है  कि इस विद्रोह से पहले भी दक्षिणी राज्य में विदेशी ताकतों के खिलाफ अनेक विद्रोह हो चुके हैंलेकिन उन्हें कभी उचित सम्मान नहीं मिला। 

1857 के संग्राम  से पहले भी इस तटीय राज्य में विदेशी ताकतों के खिलाफ अनेक छोटेबड़े विद्रोह हो चुके हैं। कुछ इतिहासकारों का मनना है कि ‘अत्तिगल विद्रोह‘ को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का दर्जा दिया जाना चाहिए। 

अत्तिगल विद्रोह 1721 में तत्कालीन वेनादी रियासत में ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ हुआ था। इसमें ईस्ट इंडिया कंपनी के कम से कम 133 सैनिक मारे गए थे। राज्य के इतिहासकारों का मानना है कि यह देश में विदेशी ताकतों के खिलाफ पहला सुनियोजित विद्रोह था। 

इसके साथ ही  मालाबार के शासक वर्मा पझासी राजा का अंग्रेजों के साथ 1795-1805 का संघर्ष, 1804 में त्रावणकोर में नायर ब्रिगेड का विद्रोह और त्रावणकोर के दीवान वेलु थंपी दलावा की अगुवाई में 1809 में विद्रोह हुआ। 

जाने माने इतिहासकार एवं इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टॉरिकल रिसर्च के पूर्व अध्यक्ष एमजीएस नारायणन ने कहा कि ओडिशा के पाइका विद्रोह को पहले संग्राम का दर्जा देने के पहले तथ्यों की अच्छी तरह जांच की जानी चाहिए। 

इतिहासकार के एन गणेश ने ऐतिहासिक आंदोलनों और संघर्षों की प्रमुखता और मूल्य के बारे में निर्णय लेने के सरकार के अधिकार पर ही प्रश्न खड़ा कर दिया। 

उन्होंने कहा, ‘मैं पाइका विद्रोह के महत्व पर प्रश्न नहीं उठा रहा हूं। लेकिन कैसे कोई सरकार इतिहास के विद्रोहसंघर्ष और आंदोलन के गुण और महत्व के बारे में निर्णय ले सकती है।‘ उन्होंने कहा कि इस पर निर्णय शिक्षाविदों को और इतिहास शोघ परिषद जैसी संस्थाओं को लेना चाहिए।

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राजनीतिक और सामाजिक गतिविधियों पर इनकी पैनी नजर रहती है। पिछले एक दशक से प्रदीप सिंह पत्रकारिता कर रहे हैं। इस दौरान कई पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से लिखा। वे संडे-पोस्ट और डीएलए से भी जुड़े रहे हैं। इन दिनों ‘यथावत’ से प्रमुख संवाददाता के तौर पर जुड़े हैं।

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